गुरुग्राम, गौरव चौधरी। बुजुर्ग को डरा-धमकाकर ठगी करने वाला डिजिटल अरेस्ट खेल एक संगठित साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क का हिस्सा है, जिसमें गिरोह के अलग-अलग सदस्य भिन्न-भिन्न भूमिकाएं निभाते हैं। गुरुग्राम की एक अदालत ने 65 वर्षीय बुजुर्ग से 23 लाख रुपये की ठगी के मामले में यह अहम टिप्पणी करते हुए दिल्ली निवासी अभियुक्त क्षितिज माहरा की जमानत याचिका खारिज कर दी है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुदीप गोयल की अदालत ने मामले की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा कि जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ रही है, साइबर अपराधों में लगातार इजाफा हो रहा है। अदालत ने चेतावनी दी कि ऐसे संवेदनशील और संगठित अपराधों से सख्त हाथों से निपटा जाना चाहिए और अभियुक्तों के प्रति कोई नरमी नहीं दिखाई जानी चाहिए। अदालत ने मामले की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि क्षितिज माहरा और अन्य सह-आरोपियों के बीच हुई टेलीफोनिक बातचीत से घटनाक्रम की एक पूरी श्रृंखला स्थापित होती है, जो इस साजिश में उसकी कथित भूमिका को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
साइबर थाना पश्चिम में 25 अगस्त 2025 को एफआईआर दर्ज हुई थी। सेक्टर 102 निवासी 65 वर्षीय शिकायतकर्ता वीरेंद्र सिंह रावत को 29 जुलाई 2025 को एक अज्ञात व्हाट्सऐप कॉल आई थी। फोन करने वाले ने खुद को सीबीआई का वरिष्ठ अधिकारी बताया और आरोप लगाया कि वीरेंद्र सिंह रावत के पहचान दस्तावेजों का दुरुपयोग करके एक अवैध बैंक खाता खोला गया है, जिसका इस्तेमाल धन शोधन में हो रहा है।
पीड़ित को डराते हुए कथित सीबीआई अधिकारी ने उन्हें डिजिटल अरेस्ट के तहत रखने का नाटक किया और मामले से बचने के लिए तुरंत बताई गई बैंक खातों की श्रेणियों में पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश दिए। कानूनी कार्रवाई के डर से वीरेंद्र सिंह रावत और उनकी पत्नी ने दो किश्तों में कुल 23 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए। इसमें रावत ने 15 लाख रुपये और उनकी पत्नी ने आठ लाख रुपये साइबर अपराधियों द्वारा बताए गए खातों में भेजे थे।
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने सबसे पहले आरोपी अनस शेख को गिरफ्तार किया था। अनस शेख के इकबालिया बयान और आगे की तफ्तीश के आधार पर पुलिस ने क्षितिज माहरा और एक अन्य सह-आरोपी एल. मेइकिंगकपा मैतेई उर्फ क्लोज की संलिप्तता का पता लगाया। इसके बाद पुलिस ने 27 अगस्त 2026 को क्षितिज माहरा को गिरफ्तार कर लिया।
जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान अभियुक्त क्षितिज माहरा के वकील संयम भारद्वाज ने अदालत में तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को केवल एक सह-आरोपी के बयान के आधार पर झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने दावा किया कि क्षितिज को ठगी की कोई राशि प्राप्त नहीं हुई है और न ही अन्य मुख्य आरोपियों के साथ उसका कोई सीधा कॉल-डिटेल या वित्तीय संबंध पाया गया है। इसके अलावा वकील ने मानवीय आधार का हवाला देते हुए कहा कि अभियुक्त की मां स्टेज-चार कैंसर से पीड़ित हैं और हाल ही में उसके घर बच्चे का जन्म हुआ है, इसलिए उसे जमानत दी जानी चाहिए। दूसरी ओर लोक अभियोजक जगबीर सहरावत ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह एक वरिष्ठ नागरिक के साथ केंद्रीय एजेंसियों का फर्जी अधिकारी बनकर की गई गंभीर साइबर धोखाधड़ी है। उन्होंने तर्क किया कि क्षितिज माहरा इस पूरी आपराधिक साजिश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और यदि उसे रिहा किया जाता है, तो वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है, सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि आरोप की गंभीरता, अभियुक्त की संदिग्ध भूमिका और अपराध के संगठित स्वरूप को देखते हुए पारिवारिक परिस्थितियां जमानत का आधार नहीं बन सकतीं। कोर्ट ने यह भी आशंका जताई कि आरोपी के बाहर आने पर गवाहों पर दबाव बनाया जा सकता है। इन तमाम तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने जमानत याचिका खारिज कर दी।
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