प्रिलिम्स के लिये: स्वीडन, भारत-नॉर्डिक संवाद, बौद्धिक संपदा अधिकार, स्वीडन-भारत प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता गलियारा, LeadIT, उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो)
मेन्स के लिये: यूरोप में भारत की रणनीतिक साझेदारियाँ और उनका भू-राजनीतिक महत्त्व, भारत-स्वीडन सहयोग
स्रोत: पीआईबी
भारत के प्रधानमंत्री ने स्वीडन का दौरा किया, जहाँ भारत–स्वीडन संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया गया तथा इस उन्नत ढाँचे को लागू करने के लिये संयुक्त कार्य योजना 2026–2030 को अपनाया गया।
स्तंभ 1: स्थिरता और सुरक्षा के लिये रणनीतिक संवाद
स्तंभ 2: अगली पीढ़ी की आर्थिक साझेदारी
स्तंभ 3: उभरती प्रौद्योगिकियाँ और विश्वसनीय कनेक्टिविटी
स्तंभ 4: मिलकर कल को आकार देना (लोग, ग्रह और अनुकूलन क्षमता)
भारत-स्वीडन रणनीतिक साझेदारी स्वीडिश नवाचार को भारत के पैमाने और विनिर्माण शक्ति के साथ जोड़ते हुए, एक भविष्य-उन्मुख डीप-टेक गठबंधन की ओर एक बदलाव को दर्शाती है। हरित प्रौद्योगिकी, आपूर्ति शृंखलाओं और सह-विकास में सहयोग के माध्यम से, संयुक्त कार्य योजना 2026–2030 नॉर्डिक-बाल्टिक क्षेत्र के साथ भारत के जुड़ाव के लिये एक मॉडल बन सकता है।
दृष्टि मेन्स प्रश्न:
प्रश्न. भारत की व्यापक यूरोपीय कूटनीति में भारत-स्वीडन रणनीतिक साझेदारी के महत्त्व का परीक्षण कीजिये।
1. भारत-स्वीडन संयुक्त कार्य योजना 2026–2030 का मुख्य लक्ष्य क्या है?
इसका उद्देश्य सुरक्षा, व्यापार, प्रौद्योगिकी, हरित संक्रमण और जन-से-जन संबंधों में सहयोग के माध्यम से रणनीतिक साझेदारी को संचालित करना है।
2. प्रौद्योगिकी में भारत-स्वीडन साझेदारी क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह AI, 6G, क्वांटम कंप्यूटिंग, सुरक्षित डिजिटल बुनियादी ढाँचा और एक प्रस्तावित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र पर केंद्रित है, जो इसे एक डीप-टेक साझेदारी बनाता है।
3. भारत-स्वीडन संबंधों में मुख्य व्यापार-संबंधी चुनौतियाँ क्या हैं?
यूरोप में गैर-टैरिफ बाधाएँ (NTB), CBAM संबंधी चिंताएँ और भारत-ईयू एफटीए के माध्यम से द्विपक्षीय व्यापार को स्केल करने की कठिनाई प्रमुख बाधाएँ हैं।
4. रक्षा में भारत और स्वीडन कैसे सहयोग कर रहे हैं?
सहयोग में स्वीडिश निवेश को भारतीय रक्षा गलियारों, सह-उत्पादन और विनिर्माण जैसे हरियाणा में SAAB का संयंत्र शामिल है।
5. हरित संक्रमण इस साझेदारी के लिये प्रमुख क्यों है?
दोनों देश हरित औद्योगिक संक्रमण, स्वच्छ प्रौद्योगिकियाँ, लीडआईटी और सतत विकास पर काम कर रहे हैं, जो जलवायु लक्ष्यों को आर्थिक सहयोग से जोड़ता है।
और पढ़ें: भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन 2026
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) सभी तीन
(d) कोई भी नहीं
उत्तर: (a)
प्रश्न. अमेरिका और यूरोपीय देशों की राजनीति एवं अर्थव्यवस्था में भारतीय प्रवासियों को एक निर्णायक भूमिका निभानी है। उदाहरणों सहित टिप्पणी कीजिये। (2020)
प्रिलिम्स के लिये: संघवाद, अनुच्छेद 270, ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण, अनुच्छेद 263, राज्यसभा, GST परिषद
प्रिलिम्स के लिये: भारतीय संघवाद की प्रकृति और स्वरूप, केंद्र-राज्य विधायी संबंध
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
जनसांख्यिकीय बदलाव, बदलती राजकोषीय विकेंद्रीकरण व्यवस्था और बढ़ते केंद्रीकरण के कारण भारतीय संघवाद पर दबाव बढ़ रहा है। बढ़ती क्षेत्रीय असमानताओं के बीच सहकारी संघवाद को बनाए रखने के लिये केंद्र को सहमति-निर्माण तथा लोकतांत्रिक संयम अपनाने की आवश्यकता है।
भारत में संघवाद एक गतिशील, सतत विकसित होने वाली प्रक्रिया है। “राज्यों के संघ” की रक्षा के लिये, केंद्र को लोकतांत्रिक संयम का अभ्यास करना चाहिये। संस्थागत सुधार अकेले एक मूलभूत “लोकतांत्रिक संवेदनशीलता” के बिना सफल नहीं हो सकते – यानी परामर्श, समायोजन और समझौते की प्रतिबद्धता जो एक प्रमुख सरकार को प्रभुत्वशाली बनने से रोकती है।
दृष्टि मेन्स प्रश्न:
प्रश्न. भारतीय संविधान की संघीय भावना को बनाए रखने में आम सहमति निर्माण की भूमिका पर चर्चा कीजिये।
1. भारतीय संघवाद को अर्द्ध-संघीय क्यों कहा जाता है?
यह स्वायत्त राज्यों के साथ एक मज़बूत केंद्र का समर्थन करता है, साथ ही अवशिष्ट शक्तियाँ, आपातकालीन प्रावधान और कुछ मामलों पर केंद्रीय नियंत्रण जैसी एकात्मक विशेषताओं को भी शामिल करता है।
2. भारत में बारगेनिंग संघवाद क्या है?
यह संसाधनों, प्रतिनिधित्व और नीतिगत निर्णयों पर केंद्र तथा राज्यों के बीच सतत राजनीतिक वार्ता को संदर्भित करता है।
3. अंतर-राज्यीय परिषद क्यों महत्त्वपूर्ण है?
अनुच्छेद 263 के तहत, यह परामर्श को बढ़ावा देने और विवादों को हल करने के लिये है, लेकिन इसका कम उपयोग विधायी-पूर्व सहमति-निर्माण को कमज़ोर करता है।
4. उपकर और अधिभार राज्यों को कैसे प्रभावित करते हैं?
ये विभाज्य पूल के बाहर आते हैं, जिससे राज्यों को हस्तांतरित कर राजस्व का प्रभावी हिस्सा कम हो जाता है और राजकोषीय संघवाद कमज़ोर होता है।
5. भारतीय संघवाद के लिये सहमति-निर्माण क्यों आवश्यक है?
यह केंद्र के प्रभुत्व को रोकता है, राज्य की स्वायत्तता की रक्षा करता है और परिसीमन, राजकोषीय हस्तांतरण एवं विधायी संघर्षों जैसे संवेदनशील मुद्दों के प्रबंधन में मदद करता है।
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सी भारतीय संघवाद की विशेषता नहीं है? (2017)
(a) भारत में एक स्वतंत्र न्यायपालिका है।
(b) केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है।
(c) संघ की इकाईयों को राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व दिया गया है।
(d) यह संघ की इकाइयों के बीच एक सहमति का परिणाम है।
उत्तर: (d)
प्रश्न. स्थानीय स्व-शासन की सर्वोत्तम व्याख्या यह है कि यह एक प्रयोग है? (2017)
(a) संघवाद का
(b) लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का
(c) प्रशासनिक प्रत्यायोजन का
(d) प्रत्यक्ष लोकतंत्र का
उत्तर: (b)
प्रश्न. 101वें संविधान संशोधन अधिनियम का महत्त्व समझाइये। यह किस हद तक संघवाद के समावेशी भावना को दर्शाता है? (2023)
प्रश्न. आपके विचार मे सहयोग, स्पर्द्धा एवं संघर्ष ने किस प्रकार भारत में महासंघ को किस सीमा तक आकार दिया है? अपने उत्तर को प्रामाणित करने के लिये कुछ हालिया उदाहरण उद्धरत कीजिये। (2020)
प्रश्न. यद्यपि परिसंघीय सिद्धांत हमारे संविधान में प्रबल है और वह सिद्धांत संविधान के आधारिक अभिलक्षणों में से एक है, परंतु यह भी इतना ही सत्य है कि भारतीय संविधान के अधीन परिसंघवाद (फैडरलिज्म) सशक्त केंद्र के पक्ष में झुका हुआ है। यह एक ऐसा लक्षण है जो प्रबल परिसंघवाद की संकल्पना के विरोध में है। चर्चा कीजिये। (2014)
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