इमेज स्रोत, Sanchit Khanna/Hindustan Times via Getty Images
तमिलनाडु विधानसभा का रिज़ल्ट 4 मई को आ चुका है जिसमें एक्टर विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है.
लेकिन अब तक राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उनको सरकार बनाने का न्योता नहीं भेजा है. उनके इस फ़ैसले ने अर्लेकर को सवालों के घेरे में ला दिया है.
234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटों की ज़रूरत होती है. इस हिसाब से विजय की पार्टी के पास अकेले दम पर बहुमत नहीं है.
राज्यपाल ने विधानसभा भंग तो कर दी है लेकिन राजभवन की ओर जारी बयान में भी कहा गया है कि टीवीके अब तक विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त विधायकों का समर्थन नहीं जुटा सकी है.
लेकिन आम तौर पर परिपाटी रही है कि चुनाव में सबसे ज़्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी को राज्यपाल सरकार बनाने का न्योता देते हैं.
विजय ने भी सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है. उसके बावजूद उनको सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं करने के राज्यपाल के फ़ैसले पर सवाल उठ रहे हैं.
इमेज स्रोत, Lok Bhavan
जब विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया में राज्यपाल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.
अतीत में ऐसी परिस्थितियों में राज्यपालों ने अलग-अलग तरीक़े अपनाए हैं.
समाप्त
मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.
एपिसोड
समाप्त
कई बार सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाया गया, जबकि कुछ मामलों में बहुमत साबित करने वाले गठबंधन को प्राथमिकता दी गई.
इसी वजह से कई बार विवाद भी पैदा हुए. कांग्रेस, लेफ़्ट पार्टियों समेत कई नेताओं ने विजय को सरकार बनाने के लिए ना बुलाने के गवर्नर के फ़ैसले की आलोचना की है.
कांग्रेस नेता और पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने लिखा, "अगर किसी राजनीतिक गठबंधन या राजनीतिक दल को विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो राज्यपाल का कर्तव्य क्या होता है? सबसे बड़े दल के नेता को, विधानसभा सदस्यों की संख्या के आधार पर, सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए. यही राजनीतिक परंपरा है. यही संसदीय मर्यादा है. जिस मंच पर उस दल के नेता को यह साबित करना होता है कि उनके पास बहुमत का समर्थन है, वह विधानसभा है, न कि राजभवन. यही सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला है. मैं तमिलनाडु के राजनीतिक दलों की सराहना करता हूँ कि उन्होंने इस नियम को स्पष्ट रूप से सामने रखा और उस पर ज़ोर दिया."
इससे पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की तमिलनाडु यूनिट ने भी विजय को बिना किसी देरी के सरकार बनाने का न्योता देने की मांग की है.
एक्स पर पोस्ट करते हुए सीपीआई (एम) ने लिखा, "हाल ही में हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जनता ने ऐसा जनादेश नहीं दिया है, जिससे कोई एक पार्टी या गठबंधन पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना सके."
"ऐसी स्थिति में 108 विधायकों के साथ टीवीके सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. इसके अनुसार, केवल टीवीके नेता विजय ने ही सरकार बनाने का दावा पेश किया है."
"बीजेपी संविधान के ख़िलाफ़ राज्यपाल के माध्यम से काम करने और उन्हें अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करने का रवैया अपनाती रही है. इसी क्रम में तमिलनाडु के राज्यपाल उन्हें पदभार ग्रहण करने के लिए आमंत्रित करने में देरी कर रहे हैं और इनकार कर रहे हैं. यह अस्वीकार्य है."
समाप्त
बीबीसी तमिल के मुताबिक़ सेवानिवृत्त न्यायाधीश हरिपरंथमन कहते हैं, "राज्यपाल यह नहीं कह सकते कि वह केवल तभी शपथ ग्रहण की अनुमति देंगे, जब पूरी संख्या दिखाई जाए."
उन्होंने बीबीसी तमिल से बातचीत में कहा, "सरकार गठन के लिए आमंत्रित करने का अधिकार राज्यपाल के पास होता है. जब किसी (पार्टी) के पास स्पष्ट बहुमत न हो, तब दावेदार पार्टी से संख्या साबित करने के लिए कहना ग़लत नहीं है."
उन्होंने आगे कहा, "लेकिन साथ ही यह नहीं कहा जा सकता कि पूरी ताक़त दिखाने पर ही शपथ ग्रहण की अनुमति दी जाएगी. बहुमत साबित करने की सही जगह विधानसभा होती है."
सुप्रीम कोर्ट के वकील करपका विनायगम का कहना है, "अगर राज्यपाल को दावेदार पार्टी पर भरोसा है, तो वह सरकार बनाने के लिए न्योता देंगे."
उन्होंने बीबीसी तमिल से बातचीत में कहा, "राज्यपाल को सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टी को जवाब देना चाहिए. इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती, लेकिन साथ ही वह बहुत ज़्यादा समय भी नहीं ले सकते."
उन्होंने कहा, "विधानसभा भंग होने के बाद उसे लंबे समय तक ख़ाली नहीं रखा जा सकता, इसलिए राज्यपाल को इस मामले में जल्दी फ़ैसला लेना चाहिए."
सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टी को राज्यपाल की अनुमति मिलने के बाद शपथ ग्रहण समारोह होगा. राज्यपाल मुख्यमंत्री और मंत्रियों को पद की शपथ दिलाएँगे.
जून 1983 में केंद्र सरकार ने राज्य और केंद्र सरकारों के संबंधों की समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति आरएस सरकारिया आयोग का गठन किया था.
राज्यपाल की भूमिका पर विचार करते हुए आयोग ने सुझाव दिया था कि मुख्यमंत्री चुनते समय राज्यपाल को कुछ सिद्धांतों का पालन करना चाहिए:
विधानसभा में जिस पार्टी या दलों के गठबंधन को सबसे व्यापक समर्थन प्राप्त हो, उसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए.
राज्यपाल का काम यह सुनिश्चित करना है कि सरकार बने- न कि ऐसी सरकार बनाने की कोशिश करना जो उनकी पसंद की नीतियों को आगे बढ़ाए.
अगर किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता, तो राज्यपाल को इस क्रम में आमंत्रित करना चाहिए:
राज्यपाल के इस रुख़ को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के एसआर बोम्मई केस के फ़ैसले के विपरीत माना जा रहा है.
उस फ़ैसले में कहा गया था कि सरकार के बहुमत की परीक्षा केवल विधानसभा के पटल पर हो सकती है, राजभवन में नहीं.
इस ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद से राज्यपाल आम तौर पर सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते रहे हैं और सदन में विश्वास मत के लिए तारीख़ तय करते हैं.
एसआर बोम्मई केस के मुताबिक़ सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का सबसे शुरुआती इस्तेमाल साल 1996 और 1998 में हुआ था, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी.
बीबीसी संवाददाता उमंग पोद्दार ने संवैधानिक मामलों के जानकार आलोक प्रसन्ना कुमार से बात की.
उन्होंने भी 1994 के एसआर बोम्मई केस का ज़िक्र करते हुए कहा, "चुनाव के बाद अगर किसी एक दल को या चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत नहीं मिलता तो सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना चाहिए."
"और अगर बाद में सबसे बड़ा दल (सिंगल लार्जेस्ट पार्टी) भी कहे कि उनके पास बहुमत नहीं है तो पोस्ट पोल अलायंस को बुलाना चाहिए."
हालांकि आलोक प्रसन्ना कुमार ने ये भी कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि यही करना है. गवर्नर कई बार अपने विवेक का इस्तेमाल करके स्थिति को देखते हुए फ़ैसला कर सकता है.
आलोक प्रसन्ना कुमार कहते हैं कि सरकार के शपथ ग्रहण करने के बाद सामान्य तौर पर बहुमत साबित करने के लिए 48 घंटों का समय दिया जाता है. ऐसा इसलिए होता है ताकि सरकार बनाने वाले दल को दूसरी पार्टी के विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त का मौक़ा ना मिल पाए.
आलोक प्रसन्ना कुमार के मुताबिक़, "तमिलनाडु के केस में जब विजय ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया तो गवर्नर को चाहिए था कि उनको सरकार की शपथ दिलाते. फिर 48 घंटे के अंदर कहते कि चलो बहुमत साबित करो. फिर ये विजय का काम होता कि वो विधानसभा के फ़्लोर पर बहुमत साबित करें. तो इस हिसाब से यहाँ राज्यपाल ने बिल्कुल ग़लत किया."
इमेज स्रोत, Satish BABU / AFP via Getty Images
जब किसी विधानसभा चुनाव में कोई भी राजनीतिक पार्टी या गठबंधन बहुमत हासिल नहीं कर पाता, तो उसे "हंग असेंबली या त्रिशंकु विधानसभा" कहा जाता है.
ऐसे में तमिलनाडु की सियासत में कई सवाल उछल रहे हैं कि क्या राज्यपाल जानबूझकर सबसे बड़ी पार्टी टीवीके को सरकार बनाने का न्योता नहीं दे रहे हैं.
या फिर क्या परंपरागत रूप से प्रतिद्वंद्वी रहीं डीएमके और एआईएडीएमके की गठबंधन सरकार की संभावना भी बन सकती है.
टीवीके के नेतृत्व वाली सरकार बनाने के लिए कुछ विकल्प हो सकते हैं.
इनमें से एक है दूसरी पार्टियों का समर्थन जुटाना, और इसके लिए केवल कांग्रेस के पाँच विधायकों का समर्थन पर्याप्त नहीं होगा.
ऐसे में दो-दो सीटों वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और सीपीआई ने भी टीवीके को समर्थन देने के संकेत दिए हैं.
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने भी दो सीटें हासिल की हैं और उसने भी संकेत दिया है कि वह अगली सरकार को 'रचनात्मक और आलोचनात्मक' समर्थन दे सकती है.
इस तरह टीवीके प्लस की कुल संख्या 119 तक पहुँच सकती है, जो बहुमत के आँकड़े से आगे है.
दूसरा विकल्प अल्पमत सरकार बनाने का है.
सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते राज्यपाल टीवीके को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं, और फिर टीवीके राज्य की सियासी पार्टियों को अपना सहयोगी बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकती है.
हालाँकि डीएमके या एआईएडीएमके की तरफ़ से इस दिशा में अभी किसी तरह के संकेत नहीं मिले हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
© 2026 BBC. बाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है. बाहरी साइटों का लिंक देने की हमारी नीति के बारे में पढ़ें.