अलीगढ़, वरिष्ठ संवाददाता। न्याय की कछुआ चाल आम आदमी के सब्र की परीक्षा ले रही है। तारीख-पर-तारीख का जो सिलसिला सालों पहले शुरू हुआ था, वह डिजिटल दौर में भी बदस्तूर जारी है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के आंकड़ों और न्यायिक सर्वेक्षणों के विश्लेषण ने अलीगढ़ और प्रदेश की न्याय व्यवस्था की तस्वीर बयां की है। सामान्य तौर पर यदि अलीगढ़ या उत्तर प्रदेश के किसी अन्य जिले में मारपीट का एक छोटा सा मुकदमा भी दर्ज होता है, तो उसे निचली अदालत से निस्तारित होने में औसतन दो से तीन साल का समय लग जाता है। यदि मामला थोड़ा गंभीर (गंभीर चोट) हो, तो यह समय बढ़कर तीन से पांच साल तक खिंच जाता है। समन, तामील होने में देरी, गवाहों का समय पर न आना और बार-बार मिलने वाली तारीखें इसके मुख्य कारण हैं।
नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के लाइव आंकड़ों के अनुसार 4.98 करोड़ मुकदमे देश की अदालतों में लंबित हैं। इनमें वर्तमान में अलीगढ़ न्यायालय में 1.52 लाख से अधिक मुकदमे विचाराधीन हैं। कुल लंबित मामलों में से सबसे बड़ा हिस्सा फौजदारी का है, जिनकी संख्या 1.37 लाख से अधिक है। वहीं, संपत्ति और अन्य दीवानी विवादों के 14 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। अगर सबसे पुराने लंबित मुकदमों की बात करें तो वो भूमि विवाद या बंटवारे से संबंधित हैं, जो पिछले 50 वर्षों से भी अधिक समय से लंबित चल रहे हैं। कई पीढ़ियां बदल चुकी हैं, लेकिन मालिकाना हक की कानूनी लड़ाई आज भी कोर्ट के कमरा नंबरों के चक्कर काट रही है। जमीन की पैमाइश, दाखिल-खारिज और अवैध कब्जों से जुड़े राजस्व के मुकदमों की स्थिति भी उदासीन है। राजस्व संबंधी एक साधारण मुकदमे को नायब तहसीलदार, तहसीलदार से लेकर एसडीएम और कमिश्नरी कोर्ट तक निस्तारित होने में अपीलों के कारण कई साल लग जाते हैं। जिले की विभिन्न तहसीलों के राजस्व न्यायालयों में वर्तमान में हजारों राजस्व के मामले विचाराधीन हैं।
सबसे अधिक मारपीट व बलवा के मुकदमे :
अलीगढ़ जिला पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक संवेदनशील और घनी आबादी वाला क्षेत्र है। यहां पुलिस और स्थानीय न्यायालयों के रिकॉर्ड के अनुसार पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा मुकदमे मारपीट, झगड़ा और बलवा के दर्ज हुए हैं। इसके बाद बाइक चोरी, घरों में चोरी और मोबाइल छिनैती के मामले दूसरे नंबर पर हैं। फिर दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, छेड़खानी और पॉक्सो एक्ट के मामले शामिल हैं। इसके बाद राजस्व व धोखाधड़ी और फिर शराब तस्करी और आर्म्स एक्ट के मुकदमे शामिल हैं। वहीं, पिछले 5 वर्षों में ऑनलाइन धोखाधड़ी, डिजिटल अरेस्ट और वित्तीय साइबर फ्रॉड के मुकदमों में भी तेजी आई है।
बुनियादी ढांचे की कमी बड़ा कारण : महासचिव :
दि अलीगढ़ बार एसोसिएशन के महासचिव अनिल कुमार शर्मा कहते हैं कि जजों के खाली पद, बुनियादी ढांचे की कमी और गवाहों के समय पर पेश न होने के कारण यह न्याय में देरी हो रही है। हालांकि, केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए नए कानूनों (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिताओं) के तहत अब आपराधिक मामलों को तय समय सीमा में निपटाने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे आने वाले समय में त्वरित व सुलभ न्याय मिलने की उम्मीद जगी है। हालांकि आपराधिक मामलों में पूर्व के मुकाबले स्थिति सुधरी है। लेकिन, सिविल प्रकरणों में हर एप्लीकेशन का निस्तारण करना होता है, इसलिए देरी होती है। हालात ये हैं कि अगर कोई व्यक्ति केस लड़ता है तो उसका निस्तारण उसकी दूसरी पीढ़ी तक पहुंच जाता है। इसके लिए न्यायालयों को सख्ती दिखानी होगी।
500 लोगों के नाम से हटा हिस्ट्रीशीटर का ‘दंश’ :
लगातार अपराध में संलिप्त रहने वाले सक्रिय अपराधियों की पुलिस की ओर से हिस्ट्रीशीट खोली जाती है। इसके बाद उन्हें थाने में हाजिरी लगानी पड़ती है। जिले में करीब ढाई हजार हिस्ट्रीशीटर हैं। एसएसपी नीरज कुमार जादौन ने बताया कि हिस्ट्रीशीटरों की समीक्षा की गई, जिसमें पाया गया कि करीब 500 ऐसे हिस्ट्रीशीटर हैं, जिनकी उम्र 70 साल से अधिक है। कुछ लोग 90 साल से ऊपर हैं, जिन्होंने 40-50 साल से कोई अपराध नहीं किया। सत्यापन के बाद ऐसे लोगों की हिस्ट्रीशीट खत्म करते हुए निगरानी बंद कर दी गई है। इनको समाज की मुख्यधारा में लौटने का मौका दिया गया है। साथ ही इन्होंने भरोसा दिलाया गया कि भविष्य में कोई अपराध नहीं करेंगे। वहीं हाल के दिनों में करीब 400 नए अपराधियों की हिस्ट्रीशीट भी खोली गई है।
केस : 1- जुलाई 1994 में मथुरा के रिफाइनरी थाना क्षेत्र में टैंकर लूट में इगलास क्षेत्र के गांव गुरसैना निवासी धर्मवीर सिंह का नाम सामने आया। बाद में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। लेकिन, इगलास पुलिस ने 15 जुलाई 1995 को उसी मुकदमे को आधार बनाकर धर्मवीर सिंह की हिस्ट्रीशीट खोल दी। अब जाकर 31 साल बाद 60 वर्षीय धर्मवीर के नाम से हिस्ट्रीशीटर का दाग हट सका।
केस :2 – टप्पल क्षेत्र में एक झगड़े व मारपीट के मामूली से मामले में मीठू सिंह की हिस्ट्रीशीट 1970 के दशक में खोली गई। उस वक्त उनकी उम्र महज 30 से 35 वर्ष के आसपास थी। इसके चलते मीठू सिंह को पिछले 55 सालों से हर महीने टप्पल थाने जाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती थी। 40-50 वर्षों से किसी भी आपराधिक गतिविधि से कोई वास्ता न होने पर अब उनका नाम निगरानी सूची से हटाया गया है।
केस :3 – क्वार्सी क्षेत्र के सुजान अली की उम्र 92 साल है। आखिरी मुकदमा साल 1960 में लिखा गया था। उसी समय हिस्ट्रीशीट खुली, जिसके बाद हर माह थाने में हाजिरी लगानी पड़ती या अक्सर पुलिस घर भी आ जाती थी। एसएसपी के आदेश के बाद उनकी हिस्ट्रीशीट फाइल बंद की गई। इस पर वे बोले कि अब पुलिस ने मुझे ‘आजाद’ कर दिया। अच्छे से बुढ़ापा कट जाएगा।
वर्जन
ऑपरेशन कन्विक्शन के तहत मुकदमों के निस्तारण में तेजी आई है। नए कानून में प्रदेश की पहली सजा भी अलीगढ़ में कराई गई थी। जो मुकदमे लंबे समय से लंबित हैं, उन्हें चिह्नित करके निस्तारण कराया गया है। कुछ और मुकदमे चिह्नित किए गए हैं, जिनमें पुलिस से समन्वय स्थापित करके मजबूत पैरवी की जा रही है।
संतोष कुमार उपाध्याय, संयुक्त निदेशक, अभियोजन
ऑपरेशन कन्विक्शन के तहत अपराधियों को सजा दिलाने के लिए मजबूती से प्रयास किए जा रहे हैं। दिसंबर 2025 में जिला प्रदेश में टॉप-10 में शामिल रहा था। सभी थाना प्रभारियों को निर्देश दिए गए हैं कि अभियोजन के साथ समन्वय स्थापित करते हुए समय से गवाही कराएं, ताकि जल्द से जल्द केस का निस्तारण हो सके।
नीरज जादौन, एसएसपी
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