दादा की संपत्ति पर पोते-पोतियों का अधिकार है या नहीं? कर्नाटक हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला – Jagran

कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता की संपत्ति पर बेटी का जन्मसिद्ध अधिकार तभी है, जब वह पैतृक हो।
कर्नाटक हाई कोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेटी की संपत्ति याचिका खारिज की।
पैतृक संपत्ति में बेटी का जन्मसिद्ध अधिकार होता है।
पिता की स्व-अर्जित संपत्ति पर जीते-जी हक नहीं।
डिजिटल डेस्क, बेंगलुरु। क्या पिता की संपत्ति पर बेटी का जन्मसिद्ध अधिकारी होता है? अक्सर यह सवाल उठता है, लोगो के बीच पूछे भी जाते हैं। हालांकि कई मायनों में इस सवाल का साफ और स्पष्ट जवाब होने के बाद भी असमंजस हमेशा रहा है।
अब इसी बीच हाल ही में कर्नाटक हाईकोर्ट का एक ऐसा फैसला सामने आया है, जिसने इस उलझन को बहुत हद तक साफ कर दिया है। हाईकोर्ट ने एक अमेरिकी निवासी बेटी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने पिता की तरफ से बेची गई संपत्ति में हिस्से की मांग की थी।
हाई कोर्ट की तरफ से इस याचिका को खारिज करने के बाद सवाल नए सवाल नए हो गए हैं। अब सवाल यह है कि जब कानूनी रूप से बेटी का पिता के संपत्ति में अधिकार है, तो कोर्ट ने याचिका खारिज क्यों किया? कानून क्या कहता है? आइए जानते हैं।  
बता दें कि अमरीका में रहने वाली एक महिला ने अपने माता-पिता और बहन के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। उसका दावा था कि उसके पिता ने जो संपत्ति बेची है और जो अन्य संपत्तियां परिवार के पास हैं, वे सभी ‘पैतृक’ या संयुक्त परिवार की संपत्तियां हैं।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 2005 के संशोधन का हवाला देते हुए महिला का तर्क था कि एक बेटी होने के नाते उसका जन्म से ही इन संपत्तियों पर बेटों के बराबर अधिकार है। उसने सोने के गहने, बैंक डिपॉजिट और अन्य अचल संपत्तियों में भी बराबर हिस्सा मांगा था। ट्रायल कोर्ट के बाद मामला कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने बेटी की याचिका को खारिज कर दिया।
इस बात को ऐसे समझिए कि कोर्ट में पेश किए गए सबूतों और खुद महिला के गवाह उसके चाचा के बयानों से यह साबित हुआ कि विवादित संपत्तियां Schedule A, C और D उसके दादाजी ने खुद की कमाई से खरीदी थीं, यानी वे उनकी ‘स्वर्जित’ संपत्तियां थीं।
दूसरी ओर सबसे जरूरी बात यह है कि जब दादाजी ने अपनी खुद की कमाई से खरीदी गई संपत्ति का बंटवारा अपने बच्चों के बीच किया, तो वह उनके बच्चों के लिए अलग/व्यक्तिगत संपत्ति बन गई।
ऐसे में जब मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तब कोर्ट ने साफ किया कि 2005 के संशोधन के तहत बेटियों को पैतृक या संयुक्त परिवार की संपत्ति में जन्म से अधिकार मिलता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि माता-पिता की हर एक निजी या व्यक्तिगत संपत्ति पर बेटी जन्म से ही दावा ठोक दे।
गौरतलब है कि कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला एक बहुत बड़ी गलतफहमी को दूर करता है। कोर्ट ने साफ किया कि लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि जो संपत्ति दादा या परदादा के समय से चली आ रही है, वह अपने आप ही ‘पैतृक संपत्ति’ बन जाती है। लेकिन अगर वह संपत्ति उनके दादाजी ने खुद अपने पैसों से खरीदी थी, तो वह उनके बच्चों की व्यक्तिगत संपत्ति बन जाती है।
इसके अलावा यदि कोई संपत्ति पिता की खुद की कमाई की है या उन्हें आपसी पारिवारिक बंटवारे में मिली है, तो पिता को उसे बेचने या अपने हिसाब से इस्तेमाल करने का पूरा अधिकार होता है। इस पर बच्चे बेटा या बेटी जीते-जी जन्मसिद्ध अधिकार का दावा नहीं कर सकते।
सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात यह है कि यह मामला जीवित पिता की संपत्ति के बंटवारे से जुड़ा था। यदि पिता की मृत्यु वसीयत बनाए बिना हो जाती है, तो उनके उत्तराधिकारियों जिसमें बेटियां भी शामिल हैं, दोनों को कानून के अनुसार बराबर हिस्सा मिलता है।

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News