दिल्लीवालों को लगेगा बिजली का 'करंट', उपभोक्ताओं से वसूले जाएंगे 38000 करोड़ – AajTak

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दिल्ली में रहने वाले करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक ऐसी खबर सामने आई है, जो उनके घर के बजट को बिगाड़ सकती है. राष्ट्रीय राजधानी में बिजली के बिलों में भारी बढ़ोतरी का रास्ता साफ हो गया है. इलेक्ट्रिसिटी अपीलेट ट्रिब्यूनल (APTEL) ने अपने बेहद कड़े फैसले में दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (DERC) की तीखी आलोचना की है. 
ट्रिब्यूनल ने न केवल कमीशन की कानूनी सीमाओं को याद दिलाया है, बल्कि उसके कामकाज के तरीके पर गंभीर सवाल उठाते हुए फटकार भी लगाई है. कार्यवाहक अध्यक्ष सीमा गुप्ता और न्यायिक सदस्य वीरेंद्र भाट की खंडपीठ ने सोमवार को DERC की उस अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें वसूली प्रक्रिया शुरू करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया था. 
दरअसल, दिल्ली की तीन बिजली वितरण कंपनियों (DisComs) का करीब 38,552 करोड़ का ‘रेगुलेटरी एसेट’ (बकाया कर्ज) लंबित है. कमीशन चाहता था कि इस राशि की वसूली शुरू करने की समय सीमा बढ़ा दी जाए, लेकिन ट्रिब्यूनल ने इसे नामंजूर कर दिया. इसके साथ ही तीनों डिस्कॉम का विस्तृत CAG ऑडिट कराने की मांग को भी ठुकरा दिया गया है.
दिल्ली में बिजली के बिल बढ़ेंगे?
उपभोक्ताओं के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उनकी जेब पर बोझ बढ़ेगा? इसका जवाब है- हां. यह पूरा मामला बिजली वितरण कंपनियों के पुराने और बिना चुकाए गए बकाए से जुड़ा है. बिजली क्षेत्र में लंबित इन कर्जों को निपटाने के लिए एक व्यापक योजना तैयार की गई है. यह मामला अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों से जुड़ा है.
इसमें कोर्ट ने सभी राज्य रेगुलेटरों को आदेश दिया था कि वे अप्रैल 2024 से बकाए का निपटारा शुरू करें और इसे अप्रैल 2028 तक पूरा कर लें. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि इस रेगुलेटरी एसेट की वसूली के लिए रेगुलेटर बिजली की दरें बढ़ाने जैसा विकल्प भी चुन सकते हैं. पिछले कुछ वर्षों में DERC की नीतियों के कारण दिल्ली में बिजली की दरें कम रखी गई थीं. 
क्यों मायने रखता है यह फैसला?
इसका सीधा असर यह हुआ कि डिस्कॉम्स बिजली खरीदने और उसे सप्लाई करने की वास्तविक लागत उपभोक्ताओं से वसूल नहीं पाईं. नतीजा यह हुआ कि बिना चुकाया गया बकाया (रेगुलेटरी एसेट) पहाड़ जैसा बड़ा हो गया और अब यह 38,000 करोड़ रुपए के पार पहुंच गया है. अब इसी लंबित राशि की वसूली की जानी है, जिसका असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा.
टाटा पावर की पैरवी कर रहे वकील श्री वेंकटेश और आशुतोष श्रीवास्तव ने इंडिया टुडे से कहा कि इस संकट को सुलझाने के लिए टैरिफ बढ़ाना ही उपलब्ध विकल्प है. उन्होंने कहा, “ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिया है कि वसूली 3 हफ्तों के भीतर शुरू की जाए. पिछले दो दशकों में जमा हुआ 38,552 करोड़ का बकाया अब सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार टैरिफ के ज़रिए वसूला जाएगा.”
उपभोक्ताओं पर बढ़ेगा बोझ
APTEL ने अपने फैसले में कहा कि DERC जानबूझकर इस प्रक्रिया में देरी कर रहा है. ट्रिब्यूनल के मुताबिक, कमीशन के पास वसूली शुरू करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं थी, फिर भी समय मांगा जा रहा था. ट्रिब्यूनल ने कहा था, “कमीशन किसी न किसी बहाने से वसूली में देरी कर रहा है, जिससे ब्याज और बकाया बढ़ता जा रहा है. इसका बोझ उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा.”
ट्रिब्यूनल ने निजी डिस्कॉम्स के CAG ऑडिट की मांग पर भी अहम फैसला सुनाया. APTEL ने स्पष्ट किया कि नियमों के तहत निजी संस्थाओं का CAG ऑडिट कराने के लिए ‘जनहित’ का होना अनिवार्य है, जो इस मामले में नजर नहीं आया. ट्रिब्यूनल ने दिल्ली के उपराज्यपाल कार्यालय के रवैये पर भी सवाल उठाए. ऑडिट की मंजूरी लापरवाही से देने की बात कही गई है.
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