पेट्रोल बचाने, सोना नहीं खरीदने की अपील के बाद प्रधानमंत्री मोदी पर उठ रहे हैं ये सवाल – BBC

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 10 मई की अपील के बाद देश में राजनीतिक गलियारे से लेकर कारोबारियों, किसान संगठनों, अर्थशास्त्रियों और सोशल मीडिया तक में बहस छिड़ गई है.
प्रधानमंत्री ने लोगों से पेट्रोल और डीज़ल की खपत कम करने, पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने, अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने, एक साल तक सोना न ख़रीदने, घर से काम करने और किसानों से रासायनिक खाद का इस्तेमाल 50 फ़ीसदी तक कम करने की अपील की है.
सरकार इसे मध्य-पूर्व में संकट के बीच "सामूहिक ज़िम्मेदारी" और "लॉन्ग टर्म एनर्जी सिक्योरिटी" की दिशा में क़दम बता रही है. लेकिन आलोचक इसे आर्थिक दबाव के संकेत और आम लोगों पर बोझ डालने की कोशिश मान रहे हैं.
11 मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रियों के समूह की बैठक में सरकार ने कहा कि देश में किसी तरह की कमी नहीं है.
सरकार के मुताबिक़, भारत के पास 60 दिनों का कच्चा तेल, 60 दिनों का प्राकृतिक गैस और 45 दिनों का एलपीजी स्टॉक है और विदेशी मुद्रा भंडार 703 अरब डॉलर है.
सरकार ने यह भी कहा कि तेल कंपनियां रोज़ करीब 1,000 करोड़ रुपये का नुक़सान झेल रही हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों का पूरा बोझ देश के नागरिकों पर न पड़े.
वहीं विपक्ष ने पीएम मोदी की अपील की टाइमिंग पर सवाल उठाए हैं. विपक्षी नेताओं का सवाल है कि अगर मध्य-पूर्व संकट फ़रवरी से जारी था तो सरकार चुनाव ख़त्म होने तक का इंतज़ार क्यों कर रही थी?
दूसरी ओर कारोबारी संगठनों ने रोज़गार और मांग घटने की आशंका जताई है. किसान संगठनों ने खाद के इस्तेमाल में कमी की अपील पर चिंता जताई है.
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सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने सवाल उठाए कि आम नागरिकों से ईंधन बचाने की अपील करने वाले नेताओं के ख़ुद के बड़े काफिले और रोड शो कैसे जारी हैं.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बाद विपक्ष का सबसे बड़ा सवाल इसकी टाइमिंग को लेकर है.
विपक्षी नेताओं का कहना है कि अगर मध्य-पूर्व में युद्ध और वैश्विक आर्थिक संकट फ़रवरी से जारी था, तो सरकार ने चुनाव ख़त्म होने के बाद ही लोगों से बचत और संयम की अपील क्यों की.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर लिखा, "28 फ़रवरी को पश्चिम एशिया में जंग शुरू हुई लेकिन प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार में व्यस्त रहे.'
उन्होंने सवाल किया कि जब सरकार पहले "स्थिति काबू में है" कह रही थी, तो अब अचानक लोगों से "ये मत करिये, वो मत ख़रीदें" जैसी अपीलें क्यों की जा रही हैं.
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सवाल उठाया कि अगर ईंधन बचत इतनी ज़रूरी थी तो चुनाव प्रचार के दौरान "हज़ारों चार्टर हवाई यात्राएं" क्यों हुईं. उन्होंने कहा कि ऐसी अपीलों से बाज़ार में "डर, घबराहट और निराशा" फैल सकती है.
विपक्ष का आरोप है कि सरकार आर्थिक दबाव का बोझ आम लोगों पर डाल रही है जबकि ख़ुद राजनीतिक वर्ग उसी तरह के सार्वजनिक संयम का पालन करता नहीं दिख रहा.
हालांकि बीजेपी नेताओं ने इन आरोपों को ख़ारिज किया है.
बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने एक्स पर कहा कि पूरी दुनिया इस समय "अभूतपूर्व वैश्विक संकट" से गुज़र रही है और ऐसे समय में विदेशी मुद्रा और ऊर्जा संसाधनों के "समझदारी से इस्तेमाल" की अपील ज़िम्मेदार सरकार का कर्तव्य है.
उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में ईंधन की क़ीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है और भारत तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में है. बीजेपी का कहना है कि सरकार का उद्देश्य लोगों में घबराहट नहीं बल्कि सतर्कता पैदा करना है.
गृह मंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री की अपील को "दूरदर्शी" बताते हुए कहा, "पेट्रोल-डीज़ल के उपयोग में संयम, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा और केमिकल फर्टिलाइजर को छोड़ नेचुरल फ़ार्मिंग को अपनाने का उनका यह आह्वान भारत को आत्मनिर्भर और एनर्जी सिक्योर राष्ट्र बनाने का स्पष्ट रोडमैप है."
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अर्थशास्त्री और इंस्टीट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष वेद जैन इसे सिर्फ़ एक सामान्य अपील नहीं मानते.
उनके मुताबिक, "प्रधानमंत्री के संदेश का सार यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर इस समय एक बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है, जिसे 'कोविड जैसी' स्थिति के रूप में देखा जाना चाहिए."
वेद जैन का कहना है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है और इसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है. उनका मानना है कि तेल, सोना और विदेश यात्रा कम करने की अपील विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करने की कोशिश है.
हालांकि वे चेतावनी भी देते हैं, "अगर संकट लंबा चला तो सरकार को आगे चलकर पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें बढ़ाने, सोने के आयात पर नियंत्रण और कुछ चीज़ों पर राशनिंग जैसे क़दम उठाने पड़ सकते हैं."
सरकार का कहना है कि मौजूदा संरक्षण अभियान किसी तत्काल संकट की वजह से नहीं बल्कि लंबी अवधि की तैयारी के लिए है.
सरकार के मुताबिक़, भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक है और घरेलू मांग पूरी की जा रही है. सरकार ने यह भी कहा है कि अभी घबराने की जरूरत नहीं है.
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इस अपील से सबसे अधिक बेचैनी उन सेक्टरों में दिख रही है जिनकी रोज़ी-रोटी सीधे उपभोग पर निर्भर है.
इंदौर सराफा व्यापारी एसोसिएशन के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर अजय लाहौटी ने प्रधानमंत्री के 10 मई के भाषण पर विरोध जताते हुए कहा, "देश के लिए हम खड़े हैं लेकिन इस चक्कर में अगर हमारे परिवार या हमारे कर्मचारियों के परिवार भूखे रह जाएंगे तो कैसे काम चलेगा?''
''ऐसी कोई भी अपील करने से पहले एक बार और सोचना चाहिए. प्रधानमंत्री जी ने समय-समय पर देशवासियों को बहुत सारी बातें कही हैं और हम सब उनकी बातों को मानते हैं लेकिन सोना न ख़रीदने वाली अपील से हमारा बहुत नुक़सान होगा"
रायपुर के सोना व्यापारी धरम भंसाली कहते हैं, "मिडिल क्लास पर इस अपील का सबसे बुरा असर पड़ने वाला है. हमारे यहां किसी भी समस्या में सोना ही तुरंत पैसे उपलब्ध कराने वाली वस्तु है. इसलिए छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा आदमी सोना ख़रीदकर कर रखना चाहता है. अब अगर ऐसे में साल भर सोना न ख़रीदने की अपील मान ली जाए तो न जाने कितनी शादियां नहीं होंगी, इस पेशे से जुड़े कितने लोग बेघर हो जाएंगे. राष्ट्रहित में पीएम मोदी की यह अपील अच्छी है लेकिन नागरिक हित में नहीं."
कारोबारियों का कहना है कि सोना सिर्फ़ एक लग्ज़री वस्तु नहीं बल्कि बचत, शादी और संकट के समय नक़दी जुटाने का ज़रिया भी है. ऐसे में सोना न ख़रीदने की अपील का असर सिर्फ़ कारोबार पर नहीं बल्कि सामाजिक और घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है.
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कृषि क्षेत्र में भी इस अपील को लेकर चिंता दिखाई दे रही है.
आरएसएस समर्थित भारतीय किसान संघ के मध्य प्रदेश अध्यक्ष कमल सिंह आंजना कहते हैं, "प्रधानमंत्री की अपील का देश की कृषि पर ख़तरनाक असर पड़ सकता है. देश में खाद की खपत बढ़ी है, क्योंकि सिंचाई का रकबा बढ़ा है. अब ऐसे में अगर किसान को यूरिया और डीएपी नहीं मिलेगी तो वो तो कंगाल हो जाएगा."
उन्होंने पीएम मोदी की इस अपील की टाइमिंग पर भी सवाल उठाते हुए कहा, "यह समय ऐसा है, जब खाद की ज़रूरत बढ़ने वाली है. मध्य भारत के राज्यों में तो खाद के संकट पहले से मंडरा रहे हैं ऐसे में खाद का कम उपयोग करने की बात बाज़ार में उथल-पुथल पैदा करेगी."
उन्होंने कहा, "अगर सरकार को लग रहा है तो वो खाद की क़ीमत बढ़ा दे क्योंकि वैसे ही किसान को कालाबाज़ारी के चलते खाद महंगी ही मिल रही है. लेकिन खाद की आपूर्ति बहुत महत्वपूर्ण हैं, वरना देश के खाद्यान्न भंडार के लिए बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाएगी."
हालांकि सरकार का कहना है कि खाद का स्टॉक पर्याप्त है. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 11 मई तक देश में कुल खाद भंडार 199.65 लाख टन था, जो पिछले साल की तुलना में अधिक है. सरकार ने कहा है कि यह खरीफ सीजन की ज़रूरत का 51 फ़ीसदी से ज़्यादा है.
सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के कटौती और बचत के बयान पर तीखा विमर्श हो रहा है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, "मोदी जी ने कल जनता से त्याग मांगे – सोना मत ख़रीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो. ये उपदेश नहीं – ये नाकामी के सबूत हैं."
उन्होंने आगे लिखा, "12 साल में देश को इस मुकाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है – क्या ख़रीदें, क्या न ख़रीदें, कहाँ जाएं, कहां न जाएँ. हर बार ज़िम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि ख़ुद जवाबदेही से बच निकलें."
लेकिन सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया सिर्फ़ राजनीतिक व्यक्तियों तक सीमित नहीं है. बड़ी संख्या में लोग इस अपील को अपने रोज़मर्रा के आर्थिक संघर्षों के साथ जोड़कर देख रहे हैं.
प्रधानमंत्री के आधिकारिक हैंडल से पोस्ट किए गए इसी भाषण के वीडियो के नीचे कई लोगों ने सवाल किया कि जब आम नागरिकों से पेट्रोल और डीज़ल बचाने की अपील की जा रही है, तब उसी दिन बड़े राजनीतिक रोड शो और लंबी वीआईपी गाड़ियों के काफिले क्यों दिखाई दे रहे हैं.
एक एक्स यूज़र ने लिखा, "नागरिकों से त्याग करने को कहा जा रहा है, लेकिन सरकार की जवाबदेही कहाँ है?"
दूसरे यूज़र ने लिखा, "मोदी जी, यही बात सभी सांसदों, वीआईपी, नेताओं, नौकरशाहों और अधिकारियों से भी कहकर देखिए. सारे नियम सिर्फ़ आम नागरिकों के लिए ही क्यों हैं?"
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री के भाषण के कुछ घंटे बाद हुए रोड शो की तस्वीरें और वीडियो साझा करते हुए सवाल उठाए कि ईंधन बचत की अपील और बड़े राजनीतिक काफिलों के बीच विरोधाभास क्यों दिखाई देता है.
हालांकि कुछ प्रतिक्रियाएं सरकार के पक्ष में भी थीं. कुछ यूज़र्स ने वर्क फ्रॉम होम, सार्वजनिक परिवहन और ऊर्जा बचत को व्यावहारिक कदम बताया. कुछ लोगों ने इसे पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से ज़रूरी कहा.
लेकिन इस पूरी बहस के बीच एक बड़ा सवाल लगातार उभरता दिख रहा है.
क्या यह सिर्फ वैश्विक संकट के बीच एहतियाती अपील है, या फिर सरकार लोगों को आने वाले कठिन आर्थिक समय के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रही है?
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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