पेड़-पौधों को कैसे पता चलता है दिन है या रात? शाम होते ही बदल जाता है पूरा सिस्टम, वैज्ञानिकों ने बताया राज – India.com

Published By: Gargi Santosh | Updated: Aug 17, 2026, 4:46 PM
जैसे इंसानों के अंदर रोजाना उठने-बैठने, खाने-पीने, काम करने और सोने का एक रूटीन होता है, वैसे ही पौधों में भी एक साइकिल चलती है. दिन में पत्तियां सूरज की रोशनी और कार्बन डाइऑक्साइड से प्रकाश संश्लेषण के जरिए शुगर बनाती हैं, जबकि रात में यह प्रक्रिया धीमी या बंद हो जाती. पौधों के कई दूसरे काम भी दिन और रात के हिसाब से बदलते रहते हैं.
पेड़-पौधों में इस 24 घंटे की साइकिल को सर्केडियन घड़ी (Circadian Clock) कंट्रोल करती है. यह शरीर के मेटाबॉलिज्म, ब्लड प्रेशर, नींद और हार्मोन जैसे कई जरूरी कामों को समय के हिसाब से चलाने में मदद करती है.
वैज्ञानिकों के लिए सबसे दिलचस्प बात यह रही कि किसी पौधे को पूरी तरह अंधेरे कमरे में रख दें, तब भी उसके कई दिन-रात वाले चक्र चलते रहते हैं. यानी पौधा सिर्फ सूरज देखकर अपना टाइम-टेबल तय नहीं करता, बल्कि उसके अंदर अपनी 'इंटरनल क्लॉक' भी होती है.
सूरज से बनने वाली सुक्रोज यानी शुगर भी इस जैविक घड़ी को चलाने में मदद करती है. रिसर्च में पाया गया कि अंधेरे में पौधों की सर्केडियन रिदम बनाए रखने के लिए शुगर जरूरी है, जबकि लगातार रोशनी में शुगर इस चक्र को छोटा कर सकती है. मतलब पौधे रोशनी के साथ-साथ अपने अंदर बनने वाली शुगर से भी दिन-रात का संकेत लेते हैं.
पौधे एथिलीन नाम की गैस बनाते हैं, जिसे अक्सर एजिंग हार्मोन कहा जाता है. यह फलों को पकाने के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है, लेकिन पौधों की ग्रोथ और बीमारी या तनाव कम करने में भी इसकी भूमिका होती है. यही वजह है कि पका हुआ केला एवोकाडो के पास रखने पर एवोकाडो जल्दी पक सकता है, क्योंकि एथिलीन गैस पौधों के बीच एक तरह का केमिकल सिग्नल भी है.
Arabidopsis नाम के छोटे फूलदार पौधे पर रिसर्च करते हुए वैज्ञानिकों ने पाया कि एथिलीन सिर्फ दिन-रात के हिसाब से नहीं बनता, बल्कि पौधे की सर्केडियन घड़ी को रेगुलेट करने में भी मदद करता है. यह पौधे की घड़ी से जुड़े GIGANTEA जैसे जीन पर असर डालता है. खास बात यह है कि एथिलीन सर्केडियन चक्र को छोटा कर सकता है, लेकिन शुगर इस प्रभाव को रोक देती है.
पौधों की सर्केडियन क्लॉक जहां 24 घंटे काम करती, वहीं उनके अंदर मौसम और लंबे समय में होने वाले बदलावों से जुड़ी दूसरी जैविक टाइमिंग भी होती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन प्रक्रियाओं को बेहतर तरीके से समझकर फसलों की विकास दर, उत्पादन और फलों-सब्जियों की शेल्फ को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक, कटाई के बाद भी फल और सब्जियों की कोशिकाएं जीवित रहती हैं और उनकी जैविक लय पूरी तरह खत्म नहीं होती. केले को इसलिए हरा तोड़ा जाता है, ताकि ट्रांसपोर्ट के दौरान नुकसान कम हो और मंजिल पर पहुंचने के बाद एथिलीन की मदद से पकाया जा सके. (Photos from Magnific)
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