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मऊगंज का वो घर… आज भी वैसा ही है. दीवारें वही हैं, दरवाजा वही है, लेकिन घर के अंदर की हवा बदल गई है. अब वहां उम्मीद की आवाज नहीं आती… बस एक खामोशी है, जो बार-बार एक ही नाम दोहराती है- आकांक्षा चतुर्वेदी. आकांक्षा वही लड़की थी, जिसके सपनों में सफेद कोट था… डॉक्टर बनने का सपना था… और घर की तकदीर बदलने की उम्मीद थी.
लेकिन अब वही सपना एक सवाल बनकर खड़ा है- आखिर हुआ क्या? परिवार का आरोप है कि NEET परीक्षा से जुड़ा तनाव, पेपर लीक की खबरें और परीक्षा को लेकर बनी अनिश्चितता ने उनकी बेटी को भीतर से तोड़ दिया. और यही टूटन उसकी जिंदगी पर भारी पड़ गई.
आकांक्षा मध्य प्रदेश के मऊगंज की रहने वाली थी, लेकिन तैयारी के लिए नागपुर में रह रही थी. घरवालों के मुताबिक, वह पढ़ाई में मेहनती थी और परीक्षा देने के बाद भी काफी खुश थी. उसे अच्छे परिणाम की उम्मीद थी. लेकिन फिर पेपर लीक की खबरें सामने आईं. और यहीं से कहानी बदल गई.
परिवार का कहना है कि इसके बाद वह धीरे-धीरे तनाव में आने लगी. खाना-पीना कम कर दिया, चुप रहने लगी और खुद में खोई-खोई रहने लगी. घरवालों ने समझाने की कोशिश की, लेकिन हालात बदलते गए.
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पिता कृष्ण कुमार चतुर्वेदी किसान हैं. बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए उन्होंने कर्ज लिया- यह कर्ज लाखों रुपये तक पहुंच गया. घर में उम्मीद थी कि बेटी डॉक्टर बनेगी तो सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी. लेकिन अब हालात बिल्कुल उलट हैं.
बेटी नहीं है… और पिता अस्पताल में भर्ती हैं. मां नीलम चतुर्वेदी सदमे में हैं और बार-बार एक ही बात दोहरा रही हैं- पेपर तो दोबारा करा लोगे, लेकिन मेरी बेटी को लौटा पाओगे क्या?
परिवार का दावा है कि पढ़ाई और कोचिंग के लिए 15 से 20 लाख रुपये तक का कर्ज हो चुका है. मां नीलम चतुर्वेदी बताती हैं कि पति दो बार हार्ट अटैक झेल चुके हैं. लकवे के बाद भी उन्होंने बेटी के सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करना नहीं छोड़ा. उन्हें भरोसा था कि एक दिन उनकी बेटी डॉक्टर बनकर परिवार की तकदीर बदल देगी. वो कहते थे कि बेटी डॉक्टर बन जाएगी तो सारी परेशानी दूर हो जाएगी.
इस घटना ने अब राजनीति का रंग भी पकड़ लिया है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए और इसे सिस्टम की विफलता बताया. कांग्रेस का आरोप है कि NEET विवाद और परीक्षा से जुड़े तनाव के कारण कई छात्र प्रभावित हुए हैं. वहीं बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे विपक्ष का राजनीतिक एजेंडा बताया है.
और इस पूरे राजनीतिक शोर के बीच… एक घर है, जहां कोई बहस नहीं हो रही. वहां सिर्फ एक मां है, एक बिस्तर है, और एक अधूरी कहानी. असल सवाल वहीं रह जाता है- क्या मेहनत करने वाले बच्चों का सपना सिस्टम की उलझनों में ऐसे ही टूटता रहेगा? मऊगंज का वो घर जवाब नहीं देता… बस देखता रहता है.
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