फ़ॉर्म-6 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद फिर घिरे ज्ञानेश कुमार, विपक्ष ने पूछा- किसके आदेश पर हुआ बदलाव – BBC

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 5 अक्तूबर को वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फ़ॉर्म-6 को लेकर अहम टिप्पणी की.
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा कि फ़ॉर्म-6 में किया गया बदलाव सुप्रीम कोर्ट ने मंज़ूर नहीं किया था.
संशोधित फ़ॉर्म-6 में नए वोटर के तौर पर रजिस्ट्रेशन कराने वालों से पूछा गया था कि उनका या उनके माता-पिता का नाम पिछली एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न) के बाद तैयार की गई वोटर लिस्ट में था या नहीं.
सीजेआई की यह टिप्पणी चुनाव आयोग के 26 सितंबर के एक प्रेस नोट में किए गए दावे से अलग है.
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर के इस प्रेस नोट में कहा था, "एसआईआर के लिए फ़ॉर्म-6 के साथ लगाए गए डिक्लेरेशन को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है."
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की जिसमें चुनाव आयोग के भीतर, "अभूतपूर्व संवैधानिक दरार और ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों" का आरोप लगाया गया है.
अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड सामने आने के बाद वह देखना चाहती है कि फ़ॉर्म में बदलाव किसने किया.
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सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ दो याचिकाओं पर सुनवाई हुई. इनमें आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़े कई फ़ैसले चुनाव आयोग की ओर से एकतरफ़ा लिए.
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दोनों याचिकाएं मुख्य रूप से 23 सितंबर को 'द इंडियन एक्सप्रेस' में प्रकाशित उन पड़तालों पर आधारित हैं, जिनमें दावा किया गया था कि पिछले साल अक्तूबर से इस साल अगस्त के बीच कम से कम 14 मौक़ों पर दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआईआर से जुड़े चुनाव आयोग के फ़ैसलों पर रिकॉर्ड में आपत्ति दर्ज की थी.
पहली याचिका बिहार के 58 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता और ख़ुद को व्हिसलब्लोअर बताने वाले राकेश कुमार सिंह ने दायर की है.
उन्होंने चुनाव आयोग के अंदरूनी रिकॉर्ड, जिसमें बैठकों की कार्यवाही और आईटी लॉग शामिल हैं, अदालत के सामने पेश करने की मांग की है.
इसका मक़सद यह पता लगाना है कि क्या ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग के 'सिंगल-मेम्बर अथॉरिटी' के तौर पर एकतरफ़ा फ़ैसले लिए.
याचिका में यह भी मांग की गई है कि अगर यह पाया जाता है कि एसआईआर और उसके तहत लिए गए फ़ैसलों के लिए ज़रूरी क़ानूनी अधिकार नहीं था, तो एसआईआर और उसके तहत की गई कार्रवाई को रद्द घोषित किया जाए.
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दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर की है. इसमें ज्ञानेश कुमार की ओर से लिए गए कथित एकतरफ़ा फ़ैसलों को असंवैधानिक और ग़ैर-क़ानूनी घोषित करने की मांग की गई है.
इसके अलावा एसआईआर से पहले चुनाव आयोग की ओर से बदले गए मूल फ़ॉर्म-6 को तुरंत बहाल करने और ग़लत तरीक़े से हटाए गए मतदाताओं के नाम फिर जोड़ने की मांग की गई है.
याचिका में देशभर की मतदाता सूचियों से 13 करोड़ नाम हटाए जाने की हाई-लेवल न्यायिक जांच की भी मांग की गई है. साथ ही ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के दूसरे अधिकारियों के ख़िलाफ़ "जानबूझकर आधिकारिक कर्तव्य का उल्लंघन" करने के आरोप में मुक़दमा चलाने की मांग की गई है.
सुनवाई के दौरान राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने अंतरिम आदेश की मांग की.
उन्होंने कहा कि मामले की सुनवाई पूरी होने तक ज्ञानेश कुमार को निलंबित किया जाए और तीसरे सदस्य की नियुक्ति तक बाकी दो चुनाव आयुक्तों के साथ चुनाव आयोग को चलाया जाए.
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने ऐसा कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत तभी कार्रवाई करेगी जब उसके सामने कुछ प्रमाणित जानकारी होगी. उन्होंने कहा कि अदालत केवल अख़बारों में छपी रिपोर्टों के आधार पर कार्रवाई नहीं कर सकती.
जस्टिस बागची ने भी कहा कि अदालत यह मानकर नहीं चल सकती कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने एकतरफ़ा फ़ैसले लिए हैं. पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया जाना चाहिए.
अदालत ने दोनों याचिकाओं पर चुनाव आयोग समेत संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है.
अब चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू, विवेक जोशी और चुनाव आयोग के दो अन्य अधिकारी-डिप्टी सीनियर इलेक्शन कमिश्नर और डायरेक्टर जनरल (इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी), सुप्रीम कोर्ट में इन याचिकाओं पर जवाब देंगे.
अदालत का आदेश अभी प्रकाशित नहीं हुआ है.
फ़ॉर्म-6 को लेकर सीजेआई की टिप्पणी और चुनाव आयोग के 26 सितंबर के बयान के बीच अंतर के कारण अब इस बात पर भी सवाल उठ रहे हैं कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले फ़ैसले की व्याख्या किस आधार पर की थी.
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने सवाल उठाए हैं.
लोकसभा में नेता, प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि अब यह "साबित" हो गया है कि ज्ञानेश कुमार ने फ़ॉर्म-6 में "ग़ैर-क़ानूनी और एकतरफ़ा" बदलाव किया.
उन्होंने चुनाव आयोग के 26 सितंबर के उस प्रेस नोट को भी साझा किया, जिसमें आयोग ने कहा था कि एसआईआर के लिए फ़ॉर्म-6 के साथ लगाए गए डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है.
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी कहा कि फ़ॉर्म-6 में किया गया बदलाव "दुर्भावनापूर्ण" था और ज्ञानेश कुमार ने इस मामले में "झूठ" बोला, क़ानून का उल्लंघन किया और संविधान के साथ विश्वासघात किया.
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी सवाल उठाया कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने फ़ॉर्म-6 में बदलाव को मंज़ूरी नहीं दी थी, तो इसे किसने मंज़ूरी दी और किसके आदेश पर बदला गया.
सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास और राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए.
वहीं भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से चुनाव आयोग और केंद्र को नोटिस दिया जाना इस बात का सबूत है कि देश की संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम कर रही हैं. उन्होंने कहा कि देश "बहुत लोकतांत्रिक तरीक़े" से आगे बढ़ रहा है और सभी प्रक्रियाओं का पालन हो रहा है.
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