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आज के डिजिटल दौर में हेल्थ और फिटनेस को लेकर भी फेक न्यूज चरम पर हैं. व्यूज-फॉलोअर्स के लिए इनफ्लुएंशर्स हेल्थ और फिटनेस का कोई भी गणित समझा देते हैं. इंस्टाग्राम की एक ऐसी ही सेलिब्रिटी बेल गिब्सन पर नेट फ्लिक्स ने पूरी सीरीज भी बनाई है जिसने कैंसर मरीज बनकर 2.3 मिलियन फॉलोअर्स बनाकर करोड़ों की ठगी की. ऐसा ही एक मामला आया था जिसमें एक व्यक्ति ने गंजे सिर पर बाल उगाने का दावा किया था.
ये कुछ उदाहरण सिर्फ बानगी भर हैं. सच पूछिए तो हेल्थ और फिटनेस की जानकारी हर जगह मौजूद है. लोग इंटरनेट पर सर्च करते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट देखते हैं या दोस्तों-रिश्तेदारों से मैसेज के जरिए टिप्स लेते हैं. कई बार लोग किचन के मसालों के भरोसे दवाएं छोड़ने तक का फैसला ले लेते हैं और बाद में ये उनके लिए मुसीबत बन जाता है. ज्यादातर गलत या भ्रामक जानकारियां सिर्फ लोगों को बरगलाती हैं. फर्जी हेल्थ टिप्स न सिर्फ भरोसेमंद लगते हैं, बल्कि तेजी से वायरल भी हो जाते हैं. ऐसे में जरूरी है कि आप हेल्थ-फिटनेस को लेकर सही-गलत जानकारी का अंतर कैसे करें.
फेक इन्फॉर्मेशन क्यों लगती है सच
हेल्थ से जुड़ी गलत जानकारी कई तरह की होती है. कई बार इसमें थोड़ा-सा सच मिलाकर भ्रामक दावे किए जाते हैं तो कभी सनसनीखेज हेडलाइंस के जरिए लोगों का ध्यान खींचा जाता है. मिसाल के तौर पर, कोविड-19 के दौरान यह अफवाह फैली थी कि फलां चीज खाने या पीने से वायरस से बचाव हो सकता है. यह सच है कि ब्लीच का ही उदाहरण लें तो ये फर्श के वायरस मार सकता है, लेकिन इसे पीना जानलेवा बन सकता है.
इसी तरह, कुछ दावे इतने आकर्षक होते हैं कि लोग बिना सोचे विश्वास कर लेते हैं. जैसे चॉकलेट खाने से वजन कम होता है. यह सुनने में जादुई लगता है क्योंकि यह एक आसान और मजेदार उपाय लगता है. ऐसे दावे तेजी से फैलते हैं, क्योंकि लोग इन्हें सरप्राइजिंग और उम्मीद भरा मानते हैं.
सनसनीखेज खबरें और सोशल मीडिया का रोल
सोशल मीडिया ने फर्जी हेल्थ जानकारी को फैलाने में बड़ा रोल निभाया है. साल 2019 में एक पोस्ट वायरल हुई थी, जिसमें दावा किया गया था कि अदरक कैंसर को कीमोथेरेपी से 10,000 गुना बेहतर तरीके से खत्म करता है. इस पोस्ट को फेसबुक पर 8 लाख से ज्यादा बार शेयर किया गया. इसमें इमोशनल कहानियां, भ्रामक ग्राफ और पुरानी जानकारी को नए तरीके से पेश किया गया था, जिससे लोग बिना जांचे इसे शेयर करते चले गए. मनो चिकित्सक डॉ सत्यकांत कहते हैं कि भ्रामक पोस्ट में अक्सर भरोसेमंद संगठनों के लोगो या डॉक्टरों की तस्वीरें होती हैं, जो इन्हें सच जैसा बनाती हैं. मेंटल हेल्थ के मामलों में भी इन भ्रामक जानकारियों का बहुत ज्यादा ही इस्तेमाल होता है. इस बारे में हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि डॉक्टरों को भी ऐसी गलत जानकारी का जवाब देने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए.सरकार को समय समय पर हेल्थ फिटनेस सेक्टर में फैलने वाली फेक न्यूज के प्रति जागरूकता के अभियान चलाने चाहिए.
गलत जानकारी से होता है नुकसान
कोरोना के दौरान वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स की झूठी अफवाहों ने वैक्सीनेशन रेट घटाया जिससे खसरे जैसी बीमारियां फिर से लौट आईं. इसी तरह, दावा किया गया कि दालचीनी कैंसर का इलाज है, जिसके चलते कुछ लोग अस्पताल पहुंचे और कुछ की जान भी चली गई. गलत जानकारी की वजह से लोग कन्वेंशनल ट्रीटमेंट को नजरअंदाज करने लगते हैं.
कैसे करें सही जानकारी की पहचान?
सर्च इंजन से चेक करें: किसी भी हेल्थ टिप को एक जगह से न मानें. गूगल पर सर्च करें और भरोसेमंद स्रोत जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल (CDC) या द लैंसेट जैसे जर्नल्स देखें. इसके अलावा FactCheck.org या Snopes जैसी वेबसाइट्स भी मदद कर सकती हैं.
स्रोत की जांच करें: वेबसाइट के “About Us” पेज को चेक करें_ लेखक के बारे में जानें कि क्या उनकी कोई विश्वसनीय डिग्री या संस्थान से जुड़ाव है. .gov या .edu जैसी वेबसाइट्स आमतौर पर भरोसेमंद होती हैं.
शक हो तो शेयर न करें: अगर आपको जानकारी पर भरोसा नहीं है, तो उसे आगे न बढ़ाएं. गलत जानकारी फैलाना नुकसानदायक हो सकता है.
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