पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की राजनीति में लंबे समय से लगभग अज्ञात रही नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है। चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड इस छोटे राजनीतिक दल का नाम तब सुर्खियों में आया जब तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने इसी पार्टी में विलय का रास्ता चुना। राजनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम को पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी का चुनावी इतिहास बेहद सीमित रहा है, लेकिन उसका चुनाव आयोग में पंजीकृत होना ही उसकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ।
नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया चुनाव आयोग के साथ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत पंजीकृत है। इसका दर्जा पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का है। इसका अर्थ है कि पार्टी कानूनी रूप से मान्य राजनीतिक संगठन है, लेकिन वह राज्य या राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए आवश्यक वोट प्रतिशत या सीटों की शर्तें पूरी नहीं कर पाई है। यही कानूनी मान्यता हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में अहम बन गई, क्योंकि किसी मान्य रजिस्टर्ड दल में विलय होने से बागी सांसदों को दलबदल कानून से जुड़ी जटिलताओं से बचने का आधार मिल सकता है।
चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल क्षेत्र में स्थित है। हालांकि इसके संगठनात्मक और चुनावी गतिविधियों का केंद्र मुख्य रूप से त्रिपुरा रहा है। पार्टी ने समय-समय पर त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार उतारे हैं। वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भी एनसीपीआई ने 2 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। हालांकि पार्टी को कोई सीट नहीं मिली और उसके उम्मीदवारों का प्रदर्शन सीमित रहा। इसके अलावा असम के कुछ क्षेत्रों में भी पार्टी ने बंगाली भाषी समुदायों के मुद्दों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास किया है।
एनसीपीआई की एक और खास बात यह है कि उसके पास कोई स्थायी चुनाव चिह्न नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के कमल और कांग्रेस के हाथ जैसे आरक्षित चुनाव चिह्न केवल मान्यता प्राप्त दलों को मिलते हैं। चूंकि एनसीपीआई एक गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है, इसलिए उसे हर चुनाव में चुनाव आयोग की ओर से उपलब्ध कराए जाने वाले फ्री सिंबल में से चयन करना पड़ता है। हालांकि चुनाव आयोग के नियमों के तहत वह किसी विशेष चुनाव के लिए एक साझा चुनाव चिह्न आवंटित कराने का आवेदन कर सकती है, लेकिन यह सुविधा स्थायी नहीं होती।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पार्टी का वास्तविक महत्व उसके चुनावी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि उसके कानूनी अस्तित्व में छिपा है। वर्षों तक बेहद सीमित गतिविधियों वाली यह पार्टी अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में तब आई जब पश्चिम बंगाल में टीएमसी के बागी सांसदों ने इसे अपने नए राजनीतिक मंच के रूप में चुना। इससे पार्टी का स्वरूप और नेतृत्व भी बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। माना जा रहा है कि इस घटनाक्रम के बाद पार्टी में शामिल वरिष्ठ नेताओं की भूमिका पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली होगी।
चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार किसी राजनीतिक दल को मान्यता प्राप्त करने के लिए राज्य में कम से कम 6 प्रतिशत वैध मत हासिल करने या निर्धारित संख्या में विधानसभा या लोकसभा सीटें जीतने जैसी शर्तें पूरी करनी होती हैं। एनसीपीआई अभी तक इन मानकों को हासिल नहीं कर पाई है, इसलिए उसका दर्जा पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल का बना हुआ है। इसके बावजूद, हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने यह दिखा दिया है कि भारतीय राजनीति में कभी-कभी छोटे और लगभग अनजान दल भी बड़े राजनीतिक समीकरणों का केंद्र बन सकते हैं।
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