बंगाल में राहुल गांधी के दोनों हाथ में लड्डू; ममता जीतें या भाजपा, कांग्रेस के लिए गुड न्यूज – Live Hindustan

West Bengal Election Results: पश्चिम बंगाल में 15 साल से सरकार चला रहीं तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सुप्रीमो ममता बनर्जी चौथी पारी के लिए विधानसभा चुनाव जीत जाएं या फिर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) जीतकर पहली बार सरकार बनाए, दोनों ही हालात कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए गुड न्यूज हैं। इमरजेंसी के बाद 1977 में कांग्रेस की बंगाल की सत्ता से विदाई हुई थी और आज 46 सालों के बाद वह विपक्ष में भी गिनने लायक नहीं बची है। लेकिन बंगाल चुनाव में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रहने के बावजूद अगर साम-दाम-दंड-भेद के साथ लड़ी भाजपा जीत नहीं पाती है, तब कांग्रेस के लिए सुकून की बात होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और गृह मंत्री अमित शाह के चुनाव प्रबंधन के बीच से जीत का शिकार किया जा सकता है। लेकिन, अगर भाजपा विजय पताका लहरा देती है तो टीएमसी की हार से ममता बनर्जी की ताकत में आने वाली कमी से विपक्ष की राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी को मिलने वाली एक चुनौती की संभावना कमजोर होगी।
दिल्ली में भाजपा का विजय रथ रोक पाने में नाकाम कांग्रेस अब राज्यों के चुनावों में भाजपा की हार से तसल्ली हासिल करती रहती है। बंगाल में उसकी एक भी सीट ना निकले, लेकिन भाजपा सत्ता से दूर रह गई तो नैरेटिव की लड़ाई में कुछ प्वाइंट उसके पास भी आ जाएंगे। विपक्ष में राष्ट्रीय राजनीति के लिए दक्षिण भारत से राहुल गांधी को कोई चुनौती नहीं है। ले-देकर ममता बनर्जी और अखिलेश यादव ही हैं, जिनमें विपक्ष का चेहरा बनने का दम है। अखिलेश भी दस साल से सरकार से बाहर हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी रौनक लौटी है। ममता बनर्जी इकलौती विपक्ष नेता हैं, जो अब तक भाजपा को बंगाल में पटक रही हैं। उनकी जीत हुई तो 2029 की लड़ाई में इंडिया गठबंधन बचा रहा तो उसका नेतृत्व राहुल को ही मिले या ममता को, ये सवाल पैदा हो सकता है। ममता की हार सवाल को ही मार देगी। अखिलेश को ममता के स्तर तक आने के लिए पहले यूपी में वापसी करनी होगी।
कांग्रेस 1972 में बंगाल का आखिरी चुनाव जीती थी और सिद्धार्थ शंकर राय उसके मुख्यमंत्री बने थे। 21 जून 1977 को वामपंथी नेता ज्योति बसु सीएम पद पर बैठे तो 6 नवंबर 2000 तक बैठे ही रह गए। हटे भी तो सीपीएम के बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बनाए गए और वो फिर अगले 11 साल तक राज करते रहे। ममता बनर्जी बुद्धदेव के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा को हराकर ही पहली बार 2011 में सत्ता में आई थीं। तब से तीन चुनाव ममता जीत चुकी हैं। केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद बंगाल की राजनीति में भी भाजपा को लेकर बदलाव दिखा और ममता को रोकने के लिए वामपंथी दलों के समर्थक और वोटर भी भाजपा की तरफ मुखातिब हो गए। इसलिए बंगाल की राजनीति में आज ना कांग्रेस की जगह बची है और ना ही लेफ्ट की। दोनों की जगह भाजपा ने हथिया ली है।
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विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन के लिहाज से देखें तो कांग्रेस की जीत वाले आखिरी चुनाव 1972 में उसे 216 सीटें मिली थीं, लेकिन 1977 में इमरजेंसी के बाद के चुनाव में वो 20 सीट पर आ गई और 178 सीटें जीतकर सीपीएम के नेता ज्योति बसु पहली बार सीएम बने। लेफ्ट फ्रंट को चुनाव में 231 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। 1982 में कांग्रेस की हालत में थोड़ा सुधार हुआ लेकिन वो अकेले 49 और गठबंधन के दलों को लेकर भी 53 तक ही पहुंच सकी। सीपीएम 174 और वामपंथी मोर्चा के अन्य दलों के साथ 238 सीटें जीतकर सत्ता में बनी रही। 1987 में लेफ्ट फ्रंट 252 सीटों तक पहुंच गया और कांग्रेस 9 सीटों के नुकसान के साथ 40 पर पहुंच गई। 1991 में लेफ्ट 5 सीटों से नीचे 245 पर आया, लेकिन कांग्रेस 40 से 43 तक ही पहुंच पाई। ज्योति बसु बने रहे।
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1996 के चुनाव में कांग्रेस में थोड़ी ताकत दिखी जब उसे 82 सीटों पर जीत मिली, लेकिन नुकसान के बाद भी लेफ्ट फ्रंट 203 सीटें जीतकर सरकार में बना रहा। सीपीएम तब भी अकेले 153 सीटों पर जीती थी। 1998 में कांग्रेस के अंदर सोमेन मित्रा और प्रणब मुखर्जी से परेशान ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस बना ली। ज्योति बसु ने कार्यकाल पूरा करने से करीब छह महीने पहले नवंबर 2000 में पद छोड़ने का फैसला कर लिया और सीपीएम ने बुद्धदेव भट्टाचार्य की ताजपोशी कर दी। 2001 का चुनाव बुद्धदेव के नेतृत्व में लड़े वाम मोर्चा की सीटें कुछ और कम हुईं, लेकिन 199 सीटों के साथ बहुमत मिला। सीपीएम 143 सीट तक आई। कांग्रेस 56 सीट नीचे 26 पर आ गई और 60 सीटों के साथ ममता बनर्जी की टीएमसी ने राज्य की राजनीति में धमाकेदार एंट्री मार ली। मुख्य विपक्षी दल का दर्जा कांग्रेस के हाथ से टीएमसी के पास चला गया।
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2006 के चुनाव में बुद्धदेव भट्टाचार्य ने जोरदार बहुमत जुटाया और तीसरी बार सीएम बने। सीपीएम को 176 और लेफ्ट फ्रंट को 235 सीटों पर जीत मिली। ममता बनर्जी भाजपा से गठबंधन में एनडीए के साथ लड़ीं, लेकिन 30 सीटों का नुकसान उठाकर 30 पर चली गईं। भाजपा कोई सीट नहीं जीत पाई। कांग्रेस 26 से 21 पर आ गई। फिर आया 2011 का वो चुनाव, जब ममता 34 साल पुराने वाम मोर्चा सरकार को उखाड़कर सत्ता में आईं। टीएमसी ने 184 सीटें जीतकर सरकार बनाई, जबकि ममता के गठबंधन के पास 228 विधायक थे। 2011 के चुनाव में भी भाजपा कोई सीट नहीं निकाल पाई, जबकि एनडीए के बैनर तले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने 3 सीटें हासिल कीं।
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केंद्र में मोदी सरकार बन चुकी थी। बीजेपी राज्यों के चुनाव भी जीत रही थी। लेकिन बंगाल में विजय मुश्किल ही रहा। 2016 के चुनाव में ममता और टीएमसी की ताकत और बढ़ी। 211 सीटों के साथ ममता ने अकेले ही सरकार बनाई। कांग्रेस 44 सीट तक पहुंची। भाजपा बंगाल में पहली बार 3 सीटों के साथ विधानसभा में पहुंची। उसके सहयोगी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने भी 3 सीटें जीती। 2021 में भाजपा पूरी ताकत से लड़ी, लेकिन 2016 से भी 4 ज्यादा 215 सीटें जीतकर ममता बनर्जी फिर से मुख्यमंत्री बनीं। भाजपा 3 सीट से बढ़कर 74 पर पहुंच गई। इंडियन सेकुलर फ्रंट की 1 सीट छोड़ दें तो कांग्रेस, सीपीएम समेत सारे वामपंथी दल जीरो पर आउट हो गए। ममता बनर्जी और एनडीए के बीच 10 फीसदी वोट शेयर का अंतर रह गया था।
ममता बनर्जी कांग्रेस छोड़कर टीएमसी बनाने के बाद 1998 का लोकसभा चुनाव एनडीए के बैनर तले भाजपा के साथ लड़ी थीं। तब ममता 7 और भाजपा 2 सीट जीती थी। 1999 के चुनाव में ममता और भाजपा के गठबंधन को राज्य की 42 में 10 सीटें मिली थीं। टीएमसी 8 और बीजेपी 2। 2004 के चुनाव में टीएमसी सिर्फ 1 सीट जीत पाई और भाजपा जीरो पर चली गई। केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार बनी थी। 2009 के चुनाव में ममता ने कांग्रेस से गठबंधन किया और 19 सीटों पर जीत हासिल की। कांग्रेस को 6 सीट मिली। यूपीए को 42 में 26 सीट पर जीत मिली थी और लेफ्ट फ्रंट को 15 सीटें। 1 सीट भाजपा ने जीती।
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2014 के लोकसभा चुनाव में जब देश भर में नरेंद्र मोदी की लहर दिखी, तब भी बंगाल ने 42 में 34 सीट टीएमसी को दी। कांग्रेस 6 से 4 पर आ गई। बीजेपी की 1 सीट बढ़ी और वो 2 तक पहुंची। 2 सीट लेफ्ट में सीपीएम ने जीती। 2019 में बीजेपी की ताकत बढ़ी और वो 18 सीट पर पहुंची, ममता 34 से गिरकर 22 पर आ गईं। 2 सीट कांग्रेस ने भी जीती। लेफ्ट जीरो पर ही टिका रहा। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को फिर नुकसान हो गया। ममता ने 29 सीटें जीत लीं, जबकि बीजेपी 18 से 12 पर आ गई। कांग्रेस 1 सीट जीत पाई, जबकि गठबंधन में रहे लेफ्ट को कोई सीट नहीं मिली।
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