भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि आधुनिक शिक्षा और विज्ञान को दिशा देने वाला आधार भी है। आर्यभट्ट से लेकर चरक संहिता तक भारतीय ज्ञान की परंपरा ने विश्व को नई राह दिखाई है। यह बात लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जेपी सैनी ने विद्या
कॉलेज के समाजशास्त्र विभाग और उत्तर प्रदेश स्टेट काउंसिल ऑफ हायर एजुकेशन के सहयोग में बुधवार को ‘भारतीय ज्ञान परंपरा पर सामाजिक विमर्श एवं समकालीन शिक्षा’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. जेपी सैनी ने कहा कि ग्रहों की गति के अध्ययन से लेकर खगोल विज्ञान तक भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्राचीन भारतीय ज्ञान आज भी वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक है और विज्ञान के क्षेत्र में नए विचारों को प्रेरित कर रहा है।
दुनिया में हो रहा भारतीय ग्रंथों का अनुवाद
विशिष्ट अतिथि राज्य सूचना आयुक्त डॉ . दिलीप अग्निहोत्री ने कहा कि भारतीय ग्रंथों का विभिन्न देशों में अनुवाद हो रहा है। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा का वैश्विक विस्तार हो रहा है। मुख्य वक्ता प्रो. आरके सिन्हा ने बीज वक्तव्य में भारतीय ज्ञान परंपरा के सामाजिक पहलुओं और समकालीन शिक्षा में इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा की।
कार्यक्रम में प्राचार्य प्रो. धर्म कौर ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन प्रो. बृजेन्द्र पाण्डेय और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. भूपेंद्र सचान ने किया। संगोष्ठी में संयोजक प्रो. ध्रुव त्रिपाठी, समन्वयक प्रो. अंबरीश त्रिपाठी, सहसंयोजक डॉ. भूपेंद्र सचान और डॉ. प्रीती सिंह सहित प्रो. अमित वर्धन, प्रो. श्रवण कुमार, प्रो. नरेंद्र सिंह, प्रो. आलोक भारद्वाज, प्रो. राजीव शुक्ल और प्रो. बृजेश श्रीवास्तव शामिल रहे।
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