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9 मार्च 1951… रुत वसंत की थी और माहौल में रंगीनियत छाई थी. वजह थी कि उस्ताद अल्ला रक्खा कुरैशी इसी रोज अब्बा बने थे. उनकी बेगम ने जन्नत के फरिश्ते जैसे बच्चे को जन्म दिया था. जच्चा-बच्चा के रस्मो-रिवाज के बाद अगले दिन बच्चे को अब्बा की गोद में दिया गया. रिवाज के मुताबिक अब्बा को बच्चे के कान में कुछ आशीर्वाद सरीखे शब्द कहने थे. मसलन कुछ ऐसा कि ‘खूब नाम कमाओ- सेहतमंद रहो या ऐसा ही कुछ और… लेकिन उस्ताद साहब ने बच्चे के कान में बोलना शुरू किया, ‘धाति धागे नधा तिरकिट धाति धागे धिना गिना, ताति ताके नता तिरकि धाति धागे धिना गिना’.
तबले के शास्त्र में इसे ताल का कायदा कहते हैं. यह तीनताल का एक कायदा है, जिसके धुन की बोल वादक तबला बजाते हुए बोलते हैं. उस्ताद अल्ला रक्खा कुरैशी जो कि अपने जमाने के खुद भी मशहूर तबला वादक थे, उन्होंने तबले के यही बोल अपने डेढ़ दिन के बेटे के कान में कहे. उन्होंने कहा था कि मैं तबले की ही इबादत करता रहा हूं, यही एक बंदगी मैं जानता हूं और यही मेरा आशीर्वाद भी है. उस्ताद अल्ला रक्खा कुरैशी का ये बेटा जाकिर हुसैन नाम से पहचाना गया और शायद पैदाइशी के वक्त कान में जो ‘मंत्र रूपी ताल’ फूंकी गई, वही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान बन गया.
90 की दशक से ज़हन में बसे
90 की पैदाइश वाले लोगों के जेहन में दूरदर्शन की जो यादें अब तलक जिंदा है, उनमें दो बातें खास हैं, पहला तो वो अमर गीत ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ और दूसरा कई सारे यादगार विज्ञापन. उन दिनों एक चाय का विज्ञापन बहुत मशहूर रहा था. यमुना नदी का किनारा, ताजमहल का बैकग्राउंड और ‘मुहब्बत की निशानी’ के सामने बैठा एक नौजवान, जिसकी उंगलियां तो तबलों पर थिरकती ही थीं, बाल भी उसी गति से हवा से बातें करते हुए, क्या ही गजब लहराते थे. ये विज्ञापन भले ही चाय का रहा हो, लेकिन उस्ताद जाकिर हुसैन साहब इसके जरिए हर घर में मशहूर हो गए. हालांकि वैश्विक मंच पर उनकी एक अलग आभा तो पहले ही बन चुकी थी, लेकिन सरल-सहज मिडिल क्लास वाले आम परिवारों के बीच ये एक कलाकार की स्वीकार्यता थी. बाल बढ़ाए हुए बच्चे बरतन-भांडे बजाते हुए खूब झूमते हुए उस्ताद साहब की नकल करते थे.
घरवाले उन्हें मनहूस मानते थे
अब सोचिए कि जो आदमी घर-घर में इतना मशहूर हुआ, वह अपने ही घर में जन्म के बाद से ही थोड़ा अनदेखा सा रहा. अनदेखा कहना थोड़ी छोटी बात हो जाएगी, सीधे-सीधे कहें तो घरवाले उन्हें मनहूस मानते थे. लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘जाकिर हुसैन- एक संगीतमय जीवन’ में उस्ताद साहब ने खुद अपनी जिंदगी जुड़ी ये बात बड़ी साझा की थी. बकौल किताब, वो बताते हैं कि ‘मेरे पैदाइश के वक्त से ही मेरे वालिद दिल की बीमारी से परेशान रहने लगे थे और अकसर ही उनकी तबीयत खराब रहती थी. उधर, इसी दौरान हमारे घर का थोड़ा बुरा वक्त भी शुरू हो चला था. अम्मा बहुत परेशान रहने लगी थीं और ऐसे में किसी ने उनके कान में ये बात डाल दी कि ये बच्चा तो बेहद मनहूस है.’ वो कहते हैं कि ‘अम्मा ने ये बात मान भी ली और मुझे दूध नहीं पिलाया. मुझे तो पालने की जिम्मेदारी भी मेरे परिवार की एक करीबी ने उठाई. वो मेरे लिए सरोगेट मदर जैसी रहीं.’
दुश्वारियों में बीता बचपन
किताब में दर्ज है कि उनकी जिंदगी ऐसी ही गुजरती, अगर एक रोज अचानक ही वो ज्ञानी बाबा घर न आए होते. जाकिर हुसैन बताते हैं कि ‘ज्ञानी बाबा अचानक ही आए और अम्मा से कहने लगे कि इस बच्चे के लिए चार साल दुश्वारियों से भरे हैं. इसका खूब ख्याल रखो. यही तुम्हारे शौहर को बचाएगा और इसका नाम जाकिर हुसैन रखना. ज्ञानी बाबा की बात में न जाने क्या जादू था कि अम्मा ने मेरी देखभाल करनी शुरू कर दी, लेकिन मेरी असल दुश्वारियां तो अब शुरू हुई थीं. मैं हमेशा बीमार पड़ जाता. कभी टायफाइड हो जाता, कभी बदन पर फफोले पड़ जाते, एक दफा मैंने धोखे से केरोसीन पी लिया. ऐसी-ऐसी परेशानियां आती रहती थीं. मजे कि बात ये कि मैं जितना बीमार होता गया, अब्बा की हालत में सुधार होता गया. फिर चार साल बाद जैसा कि ज्ञानी बाबा ने कहा था, मैं और मेरे अब्बा दोनों ही ठीक हो गए. फिर मेरा नाम जाकिर हुसैन ही रख दिया गया. बल्कि खानदान के नाम के मुताबिक तो कुरैशी होना चाहिए था.’
खैर, ये सब तो बचपन की निजी जिंदगी की बातें रहीं. इसके बाद उस्ताद साहब जब तबले की दुनिया में रम गए तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, बल्कि उनकी खास बात ये है कि उन्हें तबले को उसके पारंपरिक शास्त्र से निकालकर उसे ग्लोबली मशहूर किया. भारतीय तबला और अमेरिकी जैज को साथ लेकर उन्होंने जो प्रयोग किया, संगीत और ताल शास्त्र की दुनिया में इसे न सिर्फ बेहद सम्मानित नजर से देखा जाता है, बल्कि अद्वितीय भी माना जाता है.
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