'भारत की तरक्की दुनिया के लिए बहुत मायने रखती है', बोले वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अध्यक्ष बोर्गे ब्रेंडे – Aaj Tak

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वर्ल्ड वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अध्यक्ष बोर्गे ब्रेंडे ने आजतक से बात करते हुए महत्वपूर्ण वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बात की. इस दौरान उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप युग की व्यापार नीतियों के प्रभाव, उभरते हुए अमेरिकी-चीन आर्थिक संबंध और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत के बढ़ते प्रभाव जैसे विषयों का भी जिक्र किया.
इंडिया टुडे टीवी के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल के साथ एक विशेष साक्षात्कार में, ब्रेंडे ने आर्टिफिशिएल इंटेलीजेंस की परिवर्तनकारी क्षमता, रूस-यूक्रेन युद्ध और इजरायल-ईरान तनाव जैसे चल रहे भू-राजनीतिक संघर्षों के नतीजों पर भी विस्तार से चर्चा की, और बताया कि कैसे ये घटनाक्रम वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय करते हैं.
ट्रंप के आने से व्यापार पर प्रभाव
ब्रेंडे ने कहा, ‘मुझे लगता है कि राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में हम अधिक नजदीकी और मैत्रीपूर्ण तटीय क्षेत्रों में बदलाव देख रहे हैं. वह टैरिफ के बारे में गंभीर हैं, लेकिन मुझे लगता है कि वह इसे सौदेबाजी तक ले आएंगे. वह एक डीलमेकर हैं. इसलिए जब वह कहते हैं कि वह मेक्सिको के साथ पहले से मौजूद टैरिफ के अलावा 25% टैरिफ और लगाएंगे तो साथ में ये भी कहते है कि अगर मैक्सिको अवैध आव्रजन को रोकने में तथा ड्रग तस्करी के निर्यात पर रोक लगाने में योगदान देता है, तो वे ऐसा नहीं करेंगे.’
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भारत का जिक्र करते हुए ब्रेंडे ने कहा, ‘अगर आप भारत को देखें, तो मुझे लगता है कि भारत बहुत अच्छी स्थिति में है. भारत और अमेरिका के बीच अच्छे संबंध हैं. प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच भी पारंपरिक रूप से बेहतर संबंध हैं. भारत के लिए, अमेरिका सबसे बड़ा निर्यात बाजार है. अमेरिका के साथ संबंध बहुत अहम हैं. आप यह भी सोच सकते हैं कि हम अमेरिका के बारे में इतना क्यों बोल रहे हैं. संक्षिप्त उत्तर यह है कि अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था में 27% का योगदान देता है और वैश्विक आबादी का केवल 5% है. दुनिया की अधिकांश बड़ी कंपनियाँ वहां पर हैं. इसलिए अमेरिका के साथ संबंध  बहुत मायने रखते हैं.’
अमेरिका-चीन आर्थिक संबंध पर
ब्रेंडे ने कहा कि यह सच है कि चीन के लिए अमेरिकी बाजार अभी भी बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन अब उनके निर्यात का केवल 13 से 14% ही अमेरिका जाता है. पहले यह बहुत अधिक था. लेकिन यह अमेरिकियों के लिए एक बड़ा व्यापार घाटा भी है और ट्रम्प भी व्यापार घाटे पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. कुल मिलाकर, अमेरिका-चीन सहयोग बहुत जटिल और चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इसमें बहुत प्रतिस्पर्धा भी है. हम इसे G2 कहते हैं. वे दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और वे प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं.
एआई का जिक्र करते हुए ब्रेंडे ने कहा, ‘मुझे लगता है कि यह समय नई तकनीकों का है और एआई यहां टॉप पर है. एआई क्वांटम कंप्यूटिंग के शीर्ष पर काबिज होने जा रहा है. मुझे लगता है कि वो (अमेरिका) खुद दैनिक आधार पर इस प्रतिस्पर्धा को महसूस कर रहा होगा. ट्रम्प, शायद, पहले से मौजूद सभी टैरिफ के ऊपर 10% टैरिफ पेश करेंगे. हमने यह भी देखा है कि चीन ने तब कहा था- ठीक है, फिर हम जवाबी कार्रवाई करेंगे. हम दुर्लभ खनिजों के सबसे बड़े निर्यातक हैं. हम बैटरी निर्यात पर भी गौर करेंगे (जहां वे बहुत, बहुत आगे हैं). यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्थाएं आपस में सघन तरीके से जुड़ी हुई हैं. इसलिए इसे अलग करना आसान नहीं है.’
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चीन अभी भी मैन्युफैक्चरिंग पावर
बदलते ट्रेड डायनामिक्स से भारत को कैसे लाभ हो सकता है? इस सवाल का जवाब देते हुए ब्रेंडे ने कहा,  ‘यह सच है कि चीन से काफी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स अब वियतनाम, भारत, अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तरफ शिफ्ट हो गई हैं. चीन अभी भी दुनिया में निर्मित सभी वस्तुओं का 30 प्रतिशत उत्पादन कर रहा है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन द्वारा निर्मित उत्पादों का हिस्सा 18 प्रतिशत हैं. इसलिए अभी भी एक मैन्युफैक्चरिंग पावर बना हुआ है.’
भारत पारंपरिक रूप से दुनिया का ग्रेट मैन्युफैक्चरर नहीं रहा है. यह सेवाओं के मामले में समृद्ध है. यह डिजिटल व्यापार के मामले में मजबूत है. लेकिन हम एक अंतर देख रहे हैं. हम देख रहे हैं कि मैन्युफैक्चरर यहां भारत में आ रहे हैं, जिसे ‘मेक इन इंडिया’ कहा जाता है.
भारत को लेकर हम बहुत आशावादी- ब्रेंडे
Apple का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा,  ‘कुछ साल पहले तक Apple भारत में कोई आईफोन नहीं बनाता है. और इस साल, हम उम्मीद कर रहे हैं कि भारत में 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर के आईफोन बनाए जाएंगे. मुझे लगता है कि कंपनियों को पता चल गया है कि भारत में सिर्फ़ बैक ऑफिस और सेवाओं से काम नहीं चलेगा, इसलिए अब औद्योगिक संयंत्र भी यहां देखने को मिल रहे हैं. इसलिए यहां उत्पादन भी संभव है, जैसा कि हमने देखा है. उदाहरण के लिए, भारत लंबे समय से फार्मास्युटिकल उद्योग में अपनी पकड़ बनाके रखा हुआ है.
उन्होंने आगे कहा, ‘मध्यम और दीर्घ अवधि में हम अभी भी भारत पर बहुत आशावादी हैं. यह दुनिया की 13वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है और जल्द ही यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी. इसीलिए मैंने आपके साथ एक साक्षात्कार में इसे ‘G3′ नाम दिया था.’
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भारतीय जीडीपी का दुनिया पर भी पड़ता है प्रभाव
भारत की जीडीपी की रफ्तार से संबंधित सवाल पर ब्रेंडे ने कहा,  ‘अगर सरकार बुनियादी ढांचे में सुधार जारी रखेगी, लालफीताशाही कम करेगी, भारत में व्यापार के अनुकूल नीतियों को जारी रखेगी, और शिक्षा और अनुसंधान एवं विकास में निवेश करेगी, तो मुझे लगता है कि भारत मजबूती से आगे बढ़ेगा. यह दुनिया के लिए भी बहुत मायने रखता है, क्योंकि जब भारत 6-7% की दर से बढ़ रहा था, तो यह वैश्विक विकास का 20% हिस्सा इस देश से आ रहा था. इसलिए इसका बाकी दुनिया पर भी बहुत बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.’
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