मंच एक, रूप दो…शांतिदूत से विनाश की धमकी तक; UN में ट्रंप के भाषण के मायने समझिए – Jagran

क्या संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप के दोतरफा तेवर वैश्विक राजनीति का नया सच बन गया है? समझना होगा कि शांति …और पढ़ें
UNGA की मंच पर डोनल्ड ट्रंप।
UNGA की मंच से ट्रंप का भाषण फिर चर्चा में।
एक तरफ, खुद को आठ युद्ध खत्म करने वाला शांतिदूत बताया।
तो दूसरी तरफ, ईरान को तबाह करने की बड़ी धमकी भी दी।
डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। अपने बेबाक बयानबाजी से दुनियाभर में चर्चा का विषय बने रहना अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को शायद अच्छा लगता है, तभी तो जहां जाते हैं कुछ ऐसी बात बोल देते हुए, जिसको लेकर वैश्विक मंच गर्म हो जाता है, फिर क्या? दुनिया उनके बयान को लेकर विमर्श करने में लग जाती है और ट्रंप किसी नए मंच और नई बयानबाजी के तलाश में।
खैर, अब एक बार फिर ट्रंप अपने बयान को लेकर चर्चा के केंद्र में है। इस बार मंच था संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का, जहां ट्रंप ने एक तरफ खुद को आठ युद्ध खत्म करने वाला शांतिदूत’ बताया, तो दूसरी तरफ ईरान को तबाह करने और नर्क में भेजने जैसी तीखी धमकियां भी दी, जिसने सभी को हैरान कर दिया। 
ऐसे में सवाल यह है कि आखिर एक मंच से शांतिदूत और विनाश की धमकी देने वाले ट्रंप के इस बयानबाजी के मायने क्या हैं, ट्रंप आखिर क्या संदेश देन चाहते हैं? 
Donald Trump (5)
इस पूरे मामले को ऐसे समझिए कि UNGA के 81वें सत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भाषण दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। कारण है कि इस भाषण में ट्रंप का दो अलग-अलग रूपों में सामने आना हर किसी को हैरान कर गया, एक तरफ वे खुद को दुनिया भर में ‘आठ युद्ध खत्म करने वाला शांतिदूत’ बता रहे थे, तो दूसरी तरफ ईरान को तबाह करने और नर्क में भेजने जैसी तीखी धमकियां भी दे रहे थे।
ऐसे तनाव के समय में अमेरिकी राष्ट्रपति का यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में किस तरह की अनिश्चित और आक्रामक कूटनीति पर चल रहे हैं। 
सबसे पहले भाषण के शुरुआती हिस्से में ट्रंप ने अपने उन दावों को दोहराया, जिन्हें वे अपनी सबसे बड़ी सफलता मानते हैं। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में दुनिया भर के आठ पुराने विवादों और युद्धों को सुलझाया है।
इनमें कंबोडिया-थाईलैंड, कोसोवो-सर्बिया, कांगो-रवांडा, आर्मेनिया-अजरबैजान, गाजा और भारत-पाकिस्तान के बीच के विवाद शामिल हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी इस सफलता का श्रेय अपने खास रिश्तों और टैरिफ के इस्तेमाल व धमकियों को दिया।
गौर करने वाली बात यह है कि ट्रंप ने एक बार फिर दावा किया कि पिछले साल उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच शांति मध्यस्थता करवाई थी। उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के हवाले से कहा कि ट्रंप ने 3 करोड़ से अधिक लोगों की जान बचाई है। 
हालांकि आपको याद दिला दें कि भारत हमेशा से इस दावे को खारिज करता रहा है। भारत का स्पष्ट कहना रहा है कि दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान दोनों देशों के सैन्य संचालन महानिदेशकों (DGMO) की सीधी बातचीत से हुआ था। 
अच्छा, अब ट्रंप के भाषण के दूसरे हिस्से पर आते हैं। जहां हवा से तेज रफ्तार में उन्होंने अपने रुख में बदलाव करते हुए शांतिदूत से सीधे विनाश की धमकी देने पर उतर गए और फिर भाषण के दूसरे हिस्से में ट्रंप का अंदाज पूरी तरह बदल गया। डीलमेकर की छवि से निकलकर वे सीधे ईरान पर हमलावर हो गए।
ट्रंप ने चेतावनी दी कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार नहीं रखने दिए जाएंगे। उन्होंने धमकी भरे लहजे में कहा कि ईरान के पास दो ही रास्ते हैं, या तो अमेरिका के साथ समझौता करे या फिर इस्लामिक गणराज्य के विनाश के लिए तैयार रहे। 
Donald Trump (4)
बात यही तक खत्म नहीं हुई….अेमरिकी राष्ट्रपति ने यहां तक कह दिया कि क्या वे ईरान को बिना किसी जीवित रहने के अवसर के सीधे नर्क में भेज दें? इसके अलावा ट्रंप ने यह भी अजीब दावा किया कि ईरान इस बात का इंतजार कर रहा है कि अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में क्या होता है। मजेदार बात यह है कि ट्रंप खुद उन चुनावों में उम्मीदवार नहीं हैं।
बेबाक ट्रंप ने अपने भाषण में अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC), यूएन के जलवायु एजेंडे और यूनेस्को की जमकर आलोचना की और फिर उन्होंने जनवरी में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ बनाने का जिक्र किया और यह संकेत भी दिए कि भविष्य में उनका यह नया संगठन संयुक्त राष्ट्र (UN) की जगह भी ले सकता है।
हालांकि, विडंबना यह रही कि इस बोर्ड के बनने के एक महीने के भीतर ही अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी थी।
ऐसे तनाव के समय में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का यह भाषण इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि वे अपनी शर्तों पर चलने वाली दुनिया चाहते हैं। एक तरफ वे खुद को वैश्विक शांति स्थापित करने वाले मसीहा के रूप में पेश करते हैं। 
तो इसके ठीक उलट, जो देश उनकी शर्तों के आगे नहीं झुकते, उनके लिए विनाश की भाषा बोलने से भी नहीं हिचकिचाते। यह विरोधाभास उनकी विदेश नीति का सबसे बड़ा और खतरनाक सच बनकर उभर रहा है और फिर लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रिया भी सामने आ रही है। 

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News