मुखर, कर्मठ और तेज-तर्रार… रोजमर्रा की जिंदगी से राजनीति तक, कितनी अलग हैं बंगाल की महिलाएं – AajTak

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साल था 2021, गर्मियों के दिन थे. इस दौरान तापमान ही नहीं बंगाल में चुनाव भी अपने चरम पर था. बंगाल का यह चुनाव सिर्फ राजनीतिक दांव-पेच ही नहीं बल्कि उस दौरान आई कोविड-19 की  जानलेवा सेकेंड वेव के लिए भी याद रखा जाएगा. रात के तकरीबन 10 बजे थे. हम हावड़ा के ग्रामीण इलाकों से कोलकाता की ओर लौट रहे थे. पूरा दिन चुनावी कवरेज में बीता था. अचानक मेरी तबीयत बिगड़ गई. तेज बुखार, डिहाइड्रेशन, शरीर में कुछ भी नहीं ठहर रहा था. यह हीट एग्जॉशन था या कोविड, हम नहीं जानते थे.
हम सड़क किनारे एक छोटी-सी चाय की दुकान पर रुके. एक दंपति उसे चला रहा था. उन्होंने मुझे देखते ही समझ लिया कि मैं ठीक नहीं हूं. पति तुरंत सतर्क हो गया. उस दौर में बीमारी सिर्फ चिंता नहीं, खतरे का संकेत थी. मैंने उसे अपनी पत्नी की ओर देखते हुए देखा, जैसे कह रहा हो, दूर रहो. लेकिन उसने अनसुना कर दिया.
वह आगे बढ़ी और पूछा, “क्या चाहिए?” हमने कहा, ‘बस कुछ बिस्किट.’पति ने बंगाली में तेज़ आवाज़ में उसे रोका, सावधान रहने को कहा. लेकिन उसने जैसे पहले ही फैसला कर लिया था.
उसने मेरी ओर देखकर पूछा, “आप ठीक हैं?” टूटी-फूटी हिंदी में. जवाब का इंतजार किए बिना उसने चाय दे दी. यह कोई बड़ा, नाटकीय विरोध नहीं था. बस एक शांत निर्णय. अपनी इच्छा से मदद करने का. मेरे लिए यह करुणा का सबसे सच्चा रूप था.
बाद में कार में मेरे साथ चल रहे वीडियो जर्नलिस्ट, जो मेरठ से थे, बोले, ‘अगर यह उत्तर प्रदेश होता, तो पति की बात न मानने पर उस महिला को दिक्कत होती.’ मैंने रात के अंधेरे में आगे बढ़ते हुए इस बात पर सोचा. यह बंगाल था, और उस छोटे-से चाय स्टॉल पर, बंगाल कुछ अलग-सा लगा.
2026 में, कृष्णानगर में, मैं बीएड. परीक्षा देने आई महिलाओं के एक समूह से बात कर रही थी. सवाल वही था, जो हर चुनाव में होता है, महिलाओं का वोट किस ओर जाएगा? मैंने एक महिला से बात करनी चाही, जो अपने पति के साथ बैठी थी. जवाब देने से पहले ही पति ने बीच में कहा, ‘नहीं, राजनीति नहीं.’
महिला ने तुरंत उसे रोक दिया. ‘कोई बात नहीं, बात करते हैं.’ वे दुर्गापुर से आए थे. अगले 20 मिनट तक वह महिला बेहद स्पष्टता और सहजता से अपने विचार, अपनी पसंद और अपने वोट पर बात करती रही. पति असहज होकर धीरे-धीरे फ्रेम से बाहर हो गया. बात खत्म होने के बाद मैंने उन्हें दूर से देखा. पति कुछ पूछता हुआ दिखा, सिर हिलाता हुआ. महिला ने हंसकर बात टाल दी.
यह एक छोटा-सा पल था, जो मुझे याद रह गया. किसी बड़े निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक झलक के रूप में, जहां एक महिला, जो अपनी आवाज खुद तय कर रही थी.
और ये कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं. बार-बार मैंने देखा है, पुरुषों को पीछे हटते हुए. कभी हल्के से, कभी जानबूझकर, ताकि पत्नी, साथी या सहकर्मी आगे आ सके, बोल सके, नेतृत्व कर सके. चुनावी कवरेज के शोर में, ये खामोश पीछे हटना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना जोरदार बोलना.
विंध्य के इस पार, मुझे कुछ हद तक यह टेंडेंसी गुजरात के कुछ हिस्सों में भी दिखी, लेकिन बंगाल जितनी मजबूत नहीं. जैसे-जैसे मेरा बंगाल में चुनावी कवरेज खत्म हो रहा है, एक बात कहना जरूरी है, मैंने यहां महिलाओं के स्पेस की, उनके जीने के तरीके की गहराई से सराहना की है. यहां महिलाओं को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में देखने की एक सहज, स्वीकृति है. यह उस जड़ मिसोजिनी (महिला विरोध) के बिल्कुल विपरीत है, जो उत्तर भारत के बड़े हिस्सों में अब भी मौजूद है. शायद इसकी जड़ ‘शक्ति’ की सांस्कृतिक समझ में है. एक ऐसा सशक्तिकरण, जो यहां बेहद सूक्ष्म लेकिन गहरे रूप में दिखता है.
एक महिला पत्रकार के रूप में, जब मैं रैलियां और रोडशो कवर करती हूं, तो एक तय तरीका बन गया है. मैं आगे चलती हूं, मेरे पीछे वीडियो जर्नलिस्ट. मैं ट्राइपॉड को एक तरह की ढाल की तरह पकड़ती हूं. यह तरीका भीड़ में रास्ता बनाने में मदद करता है. भारत के दूसरे राज्यों में, भीड़ सिर्फ भीड़ नहीं होती, वह जोखिम भी होती है. अनचाहे स्पर्श, जो अफरातफरी में छिप जाते हैं.
लेकिन यहां, भीड़ उतनी ही घनी है, हवा उतनी ही भारी. लेकिन हाथ… ज़्यादातर सीमाएं नहीं लांघते.
लोग रास्ता देते हैं. अगर टकराव होता भी है, तो उसमें झिझक होती है, हकदारी नहीं. यह शिष्टाचार नहीं, बल्कि बराबरी है. और बराबरी कहीं ज्यादा अर्थपूर्ण है.
राजनीति में भी महिलाएं यहां अलग तरह से दिखती हैं. आक्रामक, तेज, बेबाक. दूसरे राज्यों में जिसे ‘मर्दाना’ कहा जाता, यहां वह सामान्य है. 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान, रात 11 बजे, मैं सेरामपुर में थी. लेफ्ट उम्मीदवार दिप्सिता धर और टीएमसी के कल्याण बनर्जी के बीच कड़ी टक्कर थी.
बनर्जी की भाषा बेहद आपत्तिजनक और लैंगिक थी. मैंने एक गली में धर का इंटरव्यू किया. वह आईं, इंटरव्यू दिया और चली गईं. कोई बड़ा काफिला नहीं. पास खड़े एक बुजुर्ग दंपति से मैंने बात की. वे लंबे समय से टीएमसी समर्थक थे. लेकिन इस बार उन्होंने कहा कि वे धर को वोट देंगे. वजह थी बनर्जी की भाषा. धर चुनाव हार गईं, लेकिन उन्हें 2.3 लाख से ज्यादा वोट मिले. महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा के मुद्दे यहां गहराई से असर डालते हैं.
इस चुनाव में स्मृति ईरानी, जो बंगाली बोलती हैं, बीजेपी की प्रमुख प्रचारक हैं. उन्होंने आरजीकर केस की पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ के समर्थन में अभियान चलाया है. मैंने एक महिला को रोते हुए देखा, जो खुद को ‘दीदी’ की समर्थक बताती थी, लेकिन देबनाथ को वोट देने की बात कह रही थी. यह दिखाता है कि न्याय और सम्मान के मुद्दे राजनीतिक सीमाओं से परे जा सकते हैं.
कहा जाता है कि 2021 में प्रधानमंत्री का ‘दीदी ओ दीदी’ वाला बयान भी महिलाओं के बीच सहानुभूति की लहर लेकर आया था. बंगाल में जेंडर की समझ सिर्फ ‘महिला मुद्दों’ तक सीमित नहीं है.
मैंने सांसद सायोनी घोष के अभियान को फॉलो किया. उनका अंदाज पारंपरिक नहीं है. कभी बेहद आक्रामक, कभी सहज. लेकिन यहां यह स्वीकार्य है. सराहा जाता है. और सिर्फ वे ही नहीं. अलग-अलग दलों की कई महिलाएं इस ढांचे को तोड़ रही हैं. यहां महिला होने का मतलब सिर्फ शालीनता नहीं, बल्कि ताकत, आत्मविश्वास और नेतृत्व भी है.
एक बाहरी व्यक्ति के लिए जो चीज ‘एम्पावरमेंट’ लगती है, यहां वह सामान्य है. संभव है कि मैं कुछ हद तक इस तस्वीर को रोमांटिक बना रही हूं. यह भी सच है कि अपराध, हिंसा और असुरक्षा यहां भी मौजूद हैं. लेकिन जो मैंने देखा, महसूस किया और रिपोर्ट किया, वह यह है कि ‘यहां महिलाओं में एक सहज स्वतंत्रता है. एक आत्मविश्वास. एक इनकार—सिमटने से.’ यह कोई निष्कर्ष नहीं, एक अवलोकन है. अधूरा है और बहस के लिए खुला भी.
मैंने इस राज्य में चार चुनाव कवर किए हैं. हर बार एक नए विस्मय के साथ लौटी हूं. बंगाल अपनी ही चाल में चलता रहता है, जैसे उसे ये बात तो पता ही न हो कि उसे क्या खास बनाता है. लेकिन खास बात यह है कि सरकारें आएंगी-जाएंगी. उम्मीद बस यही है ‘महिलाओं को देखने का नजरिया’ यहां जैसा वह वैसा बना रहे.
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