मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर रोक नहीं – ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड – Patrika News

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Tanay Mishra

Apr 24, 2026
Supreme Court (Photo – ANI)
सबरीमला केस सहित विभिन्न धार्मिक मामलों में महिलाओं के अधिकारों पर सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान बेंच में गुरुवार को मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के अधिकार संबंधी मुद्दे पर दलीलें दी गई। सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से वरिष्ठ वकील एमआर शमशाद ने कहा कि महिलाओं को नमाज अदा करने के लिए मस्जिदों में प्रवेश करने पर कोई रोक नहीं है। याचिकाकर्ता मुस्लिम महिलाओं ने उन्हें मस्जिद में प्रवेश कर अग्रिम पंक्ति में खड़ा करने की अनुमति की मांग की थी।
इससे पहले सबरीमला मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस बीवी नागरत्ना ने टिप्पणी की कि एक हिंदू आखिरकार तो हिंदू ही है और वह किसी भी मंदिर में जा सकता है। हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए और मंदिरों को संप्रदाय की रेखाओं पर एक दूसरों को बाहर नहीं करना चाहिए। ऐसा अलगाव अंततः संप्रदाय को ही कमजोर करेगा। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर के एक लेख का हवाला दिया। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि ज्ञान और ज्ञान के स्रोतों का स्वागत है, लेकिन वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी से नहीं। सीजेआई ने भी इससे सहमति जताई।
एडवोकेट शमशाद: मस्जिद में ‘पवित्रस्थल’ की कोई अवधारणा नहीं है, तो किसी विशेष स्थान पर खड़े होने या नमाज का नेतृत्व करने पर कोई जोर नहीं दे सकता। दरगाहों में पवित्र स्थल होता है।

सीजेआई सूर्यकांत: क्या महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने की अनुमति है?

एडवोकेट शमशाद: इस्लाम के सभी संप्रदायों में इस बात पर सर्वसम्मति है कि महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है। लेकिन इस पर भी सर्वसम्मति है कि नमाज अदा करने वालों में महिलाओं का होना अनिवार्य नहीं है।

जस्टिस अमानुल्लाह: आपको यह स्पष्ट करना चाहिए कि शुरू से ही महिलाओं के मस्जिद प्रवेश पर विवाद नहीं है, यह पैगम्बर मोहम्मद से शुरू हुआ था।

एडवोकेट शमशाद: जी हां, स्वयं पैगंबर ने कहा है कि महिलाओं को मस्जिद आने से मत रोको। लेकिन महिलाओं के लिए उचित यही है कि वो घर पर रहकर प्रार्थना करें, इससे उन्हें उतना ही धार्मिक फल मिलता है।

सीजेआई सूर्यकांत: क्या इसका मतलब यह है कि वह सभा में शामिल नहीं हो सकती?

एडवोकेट शमशाद: यदि वो मस्जिद जा रही हैं तो यह जायज़ है।

जस्टिस नागरत्ना: क्या महिलाओं के लिए मस्जिद की नमाज में शामिल होना अनिवार्य नहीं है?

जस्टिस अमानुल्लाह: तो कारण यह था कि अगर घर के सभी लोग चले जाते हैं, तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा?

एडवोकेट शमशाद: महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश की मांग पर आपत्ति नहीं है लेकिन मस्जिद में प्रवेश करने के बाद वहां के आंतरिक नियमों का पालन करना अनिवार्य है। इस्लाम के संदर्भ में अनिवार्य धार्मिक प्रथा (ईआरपी) के सिद्धांत को गलत तरीके से लागू किया है। इस्माइल फारूकी मामले के अदालती फैसले में मस्जिद को इस्लाम के लिए इस आधार पर आवश्यक नहीं माना गया क्योंकि नमाज खुले में भी अदा की जा सकती है। सभी प्रथाएं मस्जिद से जुड़ी हुई हैं। फिर हम अनुच्छेद 25 का क्या करेंगे। एक सिख सेना में दाढ़ी रख सकता है तो मुसलमान इसी वजह से बर्खास्त क्यों?

सीजेआईसूर्यकांत: हम इस बहस में नहीं जाएंगे, सिख धर्म में पुरुष के लिए दाढ़ी रखना पांच अनिवार्य सिद्धांतों में शामिल है।
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Updated on:
24 Apr 2026 06:56 am
Published on:
24 Apr 2026 06:46 am
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