रेटिंग: 3.5/5 ड्यूरेशन: लगभग 2 घंटे 20 मिनट।
‘धुरंधर’ के बाद अब भारत, पाकिस्तान और जासूसी की दुनिया पर एक और फिल्म आई है, लेकिन इस बार मामला गंभीर नहीं, मजेदार है। उड़ता तीर में एक पाकिस्तानी जासूस को देशभक्ति तो याद रहती है, बस यह भूल जाता है कि उसे किस देश के लिए देशभक्ति दिखानी है।
इसके बाद शुरू होती है गलतियों की ऐसी कॉमेडी कि पूरा मिशन गड़बड़ा जाता है और दर्शकों के लिए हंसी रोकना मुश्किल हो जाता है। यहां दिमाग लगाने से ज्यादा पेट पकड़कर हंसने की गुंजाइश है।
कहानी: भारत को बर्बाद करने आया जासूस, अपने ही मिशन का दुश्मन बन गया
बिलाल अहमद (आयुष्मान खुराना) और उसका दोस्त अशफाक (सुहैल नैय्यर) पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ऑपरेटिव हैं। दोनों भारत के खिलाफ साजिश रचने और देश को नुकसान पहुंचाने के मिशन पर यहां आते हैं। इसके लिए वे भारतीय काउंटर टेररिज्म स्क्वॉड यानी CTS में घुसपैठ कर लेते हैं। बिलाल ऑफिसर विक्रांत बनता है, जबकि अशफाक ध्रुव की पहचान के साथ यूनिट में जगह बना लेता है।
अपने मिशन को आगे बढ़ाने के लिए बिलाल डिफेंस मिनिस्ट्री में काम करने वाली यामिनी (सारा अली खान) को अपने प्यार के जाल में फंसाता है, ताकि अपने मकसद के लिए उसका इस्तेमाल कर सके। लेकिन एक हादसे के बाद बिलाल कोमा में चला जाता है और उसकी याददाश्त चली जाती है। अब उसे याद ही नहीं रहता कि वह पाकिस्तानी जासूस है। वह खुद को भारतीय अफसर विक्रांत समझने लगता है और उसके ऊपर देशभक्ति का ऐसा जुनून सवार होता है कि वह भारत में सक्रिय पाकिस्तानी आतंकियों को एक के बाद एक पकड़वाने लगता है।
अब अशफाक की मुश्किल समझिए। उसे पता है कि बिलाल कौन है और दोनों किस मिशन पर भारत आए थे। वह अपने पाकिस्तानी आकाओं को हालात समझाने की कोशिश करता है, लेकिन बिलाल की हरकतों के सामने उसका कोई जोर नहीं चलता। बिलाल को लगता है कि वह देश की सेवा कर रहा है, जबकि अशफाक को अपने ही दोस्त की वजह से मिशन फेल होने का डर सता रहा है। वह न बिलाल को आसानी से रोक सकता है, न अपने आकाओं को संतुष्ट कर पा रहा है। इसी उधेड़बुन से फिल्म में कई मजेदार सिचुएशन पैदा होती हैं।
एक्टिंग: आयुष्मान की कॉमिक टाइमिंग, राहुल बोस के एक्सप्रेशंस मजेदार
आयुष्मान खुराना फिल्म की जान हैं। एक पाकिस्तानी जासूस का अपनी असली पहचान भूलकर भारतीय अफसर बन जाना कहानी का सबसे बड़ा कॉमिक पॉइंट है। आयुष्मान अपनी कॉमिक टाइमिंग, चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज से इस कन्फ्यूजन को मजेदार बनाते हैं। वह पूरे आत्मविश्वास से देश की सुरक्षा में जुटे रहते हैं, जबकि उन्हें पता ही नहीं कि असल में उनका मिशन क्या था। इस विरोधाभास से कई अच्छे सीन बनते हैं।
सुहैल नैय्यर ने अशफाक के रूप में अच्छा साथ दिया है। उन्हें पता है कि बिलाल क्या कर रहा है, लेकिन वह उसे रोकने में नाकाम हैं। ऊपर से पाकिस्तानी आकाओं के सवालों का जवाब भी देना है। दोस्त की देशभक्ति और अपनी मजबूरी के बीच फंसे अशफाक के सीन कई बार हंसाते हैं।
राहुल बोस CTS चीफ बर्मन के किरदार में खास तौर पर प्रभावित करते हैं। उनके पास ज्यादा डायलॉग नहीं हैं, लेकिन आंखों की हरकत, चेहरे के भाव और हालात पर उनके रिएक्शन कई बार जोरदार हंसी दिलाते हैं। कुछ सीन में उनका बिना कुछ बोले रिएक्ट करना ही काफी है।
दिवंगत मुकुल देव आतंकियों के सरगना अजहर मकसूद के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं। राम कपूर पाकिस्तानी आर्मी के लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी और गुलशन ग्रोवर मीर के किरदार में नजर आते हैं। दोनों अपने हिस्से का काम ठीक करते हैं।
सारा अली खान की यामिनी कहानी के मिशन में अहम है, लेकिन उनके किरदार को और मजबूत स्पेस मिल सकता था। वहीं, रघुबीर यादव जैसे अनुभवी कलाकार का मौलाना के किरदार में और बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता था।
डायरेक्शन: ‘धुरंधर’ से अलग, जासूसी की दुनिया में कॉमेडी
आकाश कौशिक ने फिल्म की कहानी लिखने के साथ निर्देशन भी किया है। आतंकवाद और जासूसी जैसे गंभीर विषय को कॉमेडी में बदलना आसान नहीं है। फिल्म का आइडिया दिलचस्प है। भारत को नुकसान पहुंचाने आया पाकिस्तानी ऑपरेटिव अपनी याददाश्त खोने के बाद भारत की सुरक्षा में जुट जाता है और अपने ही मिशन को नाकाम करने लगता है।
जहां धुरंधर जैसी फिल्में जासूसी और आतंकवाद की दुनिया को गंभीर और तनावपूर्ण अंदाज में दिखाती हैं, वहीं उड़ता तीर उसी दुनिया को कॉमेडी के नजरिए से पेश करती है। पहले हाफ में यह आइडिया अच्छा काम करता है। बिलाल की देशभक्ति और अशफाक की मजबूरी से कई मजेदार सीन बनते हैं।
हालांकि, दूसरे हाफ में फिल्म थ्रिल और ट्विस्ट की तरफ बढ़ती है। कुछ मोड़ पहले ही समझ आने लगते हैं और गंभीरता बढ़ने के साथ कॉमेडी की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। फिल्म अगर आखिर तक पहले हाफ वाली मस्ती बनाए रखती, तो इसका असर और बेहतर हो सकता था।
म्यूजिक: ‘चन्न’ है सुकून देने वाला
सचिन जिगर का संगीत कुल मिलाकर अच्छा है। अरिजीत सिंह की आवाज में ‘चन्न’ रोमांटिक और सुकून देने वाला गाना है, जिसे फिल्म से अलग भी सुना जा सकता है। ‘जय हिंद’ ठीक है और आखिर के करीब आने वाला ‘चूज़े’ भी माहौल बनाता है। बाकी गाने भी अच्छे हैं, हालांकि एक दो जगह म्यूजिक कहानी की रफ्तार रोकता है। धर्मा के हिट गानों और खलनायक के बैकग्राउंड स्कोर का इस्तेमाल भी दिलचस्प है।
फाइनल वर्डिक्ट: दिमाग नहीं, हंसी चलाइए!
उड़ता तीर का पहला हाफ ज्यादा दमदार है। आयुष्मान की कॉमिक टाइमिंग, सुहैल की बेबसी और राहुल बोस के एक्सप्रेशंस कई जगह हंसाते हंसाते लोटपोट कर देते हैं। दूसरे हाफ में कहानी थोड़ी धीमी पड़ती है और ट्विस्ट बहुत चौंकाते नहीं, लेकिन फिल्म का कॉन्सेप्ट और कॉमेडी कई जगह मजा देते हैं।
आकाश कौशिक की यह कोशिश आतंकवाद और जासूसी जैसे गंभीर विषय को हल्के फुल्के अंदाज में पेश करती है। धुरंधर की गंभीर स्पाई थ्रिलर वाली दुनिया से उलट, यहां पाकिस्तानी जासूस अपने ही मिशन का बंटाधार कर रहा है और उसका दोस्त अपने आकाओं को जवाब देते देते परेशान है। यही फिल्म का सबसे मजेदार पहलू है।
कुल मिलाकर, लॉजिक को थोड़ी छुट्टी दीजिए और कॉमेडी का मजा लीजिए। आखिर जिस जासूस को यह याद न हो कि उसे किस देश के लिए देशभक्ति दिखानी है, उससे मिशन की उम्मीद करना ही सबसे बड़ा मजाक है।
फिल्म उड़ता तीर गूगल पर ट्रेंड कर रही है…
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