यदि विकसित भारत बनना है तो आज की युवा पीढ़ी, जिसे हम जेन-जी कहते हैं, उस पर अधिक ध्यान देना पड़ेगा। वो जैसी होगी, वैसा भारत होगा। जेन-जी की अनदेखी ठीक नहीं। भारत आज प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति कर रहा है, लेकिन मनुष्य निर्माणकारी और मूल्य आधारित शिक्षा की दिशा में हमें बहुत कुछ करने की जरूरत है। आज चरित्र का संकट है, अंतरआत्मा का संकट है, विश्वसनीयता का संकट भी है। इन समस्याओं का समाधान शिक्षा से करते हुए आगे जाने की आवश्यकता है। सीसीएसयू और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (पश्चिमी उप्र) के संयुक्त तत्वाधान में दो दिवसीय ज्ञानसभा मेरठ-2026 के उद्घाटन सत्र में विकसित भारत हेतु शिक्षा का स्वरूप विषय पर उक्त बात आरएसएस के सह-सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर ने कहीं।
उन्होंने कहा कि किसी भी देश को आगे बढ़ाने के लिए उसके नागरिकों के मन में अतीत के गौरव का बोध, वर्तमान की चुनौतियों की पीड़ा और भविष्य के सपने होने चाहिए। विकसित भारत की कल्पना स्पष्ट होनी चाहिए। भारत को केवल अमेरिका या किसी अन्य देश की नकल के रूप में विकसित करने के बजाय उसकी अपनी जीवन-दृष्टि और भारतीय मूल्यों के आधार पर विकास का मॉडल तैयार करना होगा।
रामदत्त चक्रधर ने कहा कि भारत की विकास दृष्टि भोग प्रधान नहीं, संयम प्रधान होनी चाहिए। भारत की विशेषता यह रही है कि उसने पूरी दुनिया को बाजार के रूप में नहीं बल्कि परिवार के रूप में देखा है। भारत ने संकट में सदैव मानवता को प्राथमिकता दी। इसलिए विकसित भारत का लक्ष्य ऐसा राष्ट्र बनाना होना चाहिए जो अपनी शक्ति का उपयोग मानवता के कल्याण के लिए करे।
रामदत्त चक्रधर ने कहा कि विकसित भारत के निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम शिक्षा है। यहां वैज्ञानिक, इंजीनियर, चिकित्सक एवं विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ तो तैयार हो रहे हैं, लेकिन क्या हम अच्छे और चरित्रवान नागरिक तैयार कर पा रहे हैं। संस्कार केवल किताब-पाठ्यक्रमों से नहीं बल्कि शिक्षक के जीवन के उदाहरण से आते हैं। शिक्षक जैसा स्वयं आचरण करता है, विद्यार्थी उसी से सीखता है। इसलिए शिक्षकों को अपने जीवन में ईमानदारी, अनुशासन, संवेदनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। प्रत्येक विवि-कॉलेज को ऐसा मॉडल प्रस्तुत करना चाहिए जिसमें विद्यार्थी ज्ञान एवं कौशल के साथ समाज, राष्ट्र, मानवता के प्रति अपने दायित्व को समझें।
न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ.अतुल कोठारी ने कहा कि केवल भौतिक प्रगति को ही विकास मान लेना पर्याप्त नहीं है। यदि आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण संकट, नैतिक मूल्यों में गिरावट, चरित्र संकट और सामाजिक समस्याएं बढ़ रही हैं तो विकास की दिशा पर भी चिंतन जरूरी है। भारतीय दृष्टि में धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रहा बल्कि वह कर्तव्य एवं सामाजिक दायित्व की भावना से जुड़ा रहा है। भारतीय परंपरा में अर्जित संपत्ति को केवल व्यक्तिगत उपभोग का साधन नहीं माना गया बल्कि समाज के हित में उसके उपयोग की भावना रही है।
कुलपति प्रो.संगीता शुक्ला ने कहा कि भारत का भविष्य भावी पीढ़ियों के निर्माण से जुड़ा है और इसका माध्यम शिक्षा है। शिक्षा में कौशल के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ कर्तव्यबोध और ज्ञान के साथ जिम्मेदारी की भावना विकसित करनी होगी। कहा कि मातृभाषा केवल संचार का माध्यम नहीं बल्कि संस्कृति, पहचान और चिंतन प्रक्रिया की वाहक है। भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान को शोध-नवाचार की आधुनिक पद्धतियों के साथ जोड़ते हुए ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी जो विद्यार्थियों को राष्ट्रीय और वैश्विक अवसरों से जोड़े।
यह रहे मौजूद पूर्व कुलपति प्रो.एनके तनेजा, प्रो.पीके शर्मा प्रो.कृष्णकांत शर्मा, सहारनपुर विवि की कुलपति प्रो.वाई विमला, प्रो.अनिल मलिक, प्रो.शिवराज पुंडीर, प्रो.इंचार्ज मीडिया सेल प्रो.मुकेश कुमार शर्मा सहित विभिन्न विवि के कुलपति, शिक्षाविद एवं स्कॉलर मौजूद रहे।
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