लखनऊ, विधि संवाददाता। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच महानिदेशक, चिकित्सा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण को आदेश दिया है कि वह सरकारी डॉक्टरों के निजी प्रैक्टिस पर रोक के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश सरकारी डॉक्टर (एलोपैथिक) निजी प्रैक्टिस पर प्रतिबंध नियमावली, 1983 के नियम-3 के अनुपालन की निगरानी एक सतत प्रक्रिया की तरह होनी चाहिए।
इसके साथ ही न्यायालय ने बलरामपुर जनपद के तुलसीपुर सीएचसी में पुलिस हिरासत में ले जाए गए एक व्यक्ति की मौत के मामले में जांच के आदेश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 21 दिसंबर को होगी। न्यायमूर्ति राजन रॉय व न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने अंकुर मिश्रा की जनहित याचिका पर ये आदेश दिए। याचिका की पोषणीयता पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की ओर से पेश अधिवक्ता ने आपत्ति उठायी लेकिन कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि एनएचएम को तकनीकी आपत्ति उठाने के बजाय पहले यह देखना चाहिए था कि क्या वास्तव में ऐसी अनियमितता हो रही है और यदि हो रही है तो उसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी है। वहीं राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि साल 2025 में कुछ डॉक्टरों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी और कुछ को निलंबित भी किया गया था। कोर्ट ने ऐसी कार्यवाहियों के परिणाम को भी रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
सुनवाई के दौरान दाखिल पूरक शपथ पत्र में बलरामपुर निवासी रंजीत सैनी की पुलिस हिरासत के दौरान तबीयत बिगड़ने और बाद में मौत होने का मामला भी उठाया गया। याचिका में आरोप लगाया गया कि तबीयत बिगड़ने पर उसे उचित व तत्काल चिकित्सा सुविधा देने के बजाय सीएचएसी के एक कमरे में बंद कर दिया गया। बार-बार मदद की गुहार लगाने के बावजूद उसे चिकित्सा सहायता नहीं मिली और कुछ ही घंटों में उसकी मौत हो गई। कहा गया कि घटना के संबंध में पुलिसकर्मी रमेश और देवाशीष मिश्रा को निलंबित किया गया, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की ओर से अस्पताल के कर्मचारियों और अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई या जांच नहीं की गई। इस पर न्यायालय ने महानिदेशक को जांच कर अगली सुनवाई तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
इससे पहले जमानत पर रिहा करने के आदेश के बाद भी एक व्यक्ति को करीब डेढ महीने तक अवैध हिरासत में रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आड़े हाथ लिया। शीर्ष अदालत ने इसे गंभीरता से लेते हुए यूपी सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया और यह बताने को कहा कि व्यक्ति को डेढ़ महीने तक लगातार अवैध हिरासत में रखने के लिए मुआवजा क्यों न दिया जाए?’ सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी युवक को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
पवन कुमार शर्मा पिछले चार वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान से जुड़े हैं। डिजिटल मीडिया में काम करते हुए वह उत्तर प्रदेश की राजनीति, क्राइम, सरकारी योजनाओं और टूरिज्म से जुड़े मुद्दों पर नियमित रूप से लिखते हैं। इससे पहले पवन एबीपी न्यूज के साथ बतौर फ्रीलांसर काम कर चुके हैं। पवन ने नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से रेडियो एवं टेलीविजन पत्रकारिता की पढ़ाई की है। इससे पहले क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर से राजनीति विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। ग्राउंड रिपोर्टिंग और अकादमिक समझ के साथ पवन तथ्यात्मक, संतुलित और पाठक-केंद्रित समाचार लेखन करते हैं।
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