यूसुफ पठान, अबु ताहेर, खलिउर्रहमान… BJP को इनडायरेक्ट सपोर्ट का क्यों चल रहे दांव? – AajTak

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पश्चिम बंगाल की सियासत में एक बार फिर से खेला होने जा रहा है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) से बगावत कर नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया (NCPI) का दामन थामने वाले 20 सांसदों का गुट दो हिस्सों में बंट गया है. टीएमसी छोड़ने वालों में शामिल रहे सांसद जगदीश चंद्र वर्मा बासुनिया ने दावा किया है कि दुर्गा पूजा के बाद 20 में से 17 सांसद बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं और बाकी तीन मुस्लिम सांसद NCPI में रहते हुए एनडीए (NDA) को समर्थन करेंगे.
टीएमसी से बगावत कर NCPI का दामन थामने वाले 20 सांसदों में तीन मुस्लिम सांसद भी हैं. इसमें बहरामपुर के सांसद यूसुफ पठान, मुर्शिदाबाद के सांसद अबु ताहेर खान और जंगीपुर के सांसद खलीलुर रहमान हैं. अबु ताहेर खान ने बासुनिया के दावों पर कहा, ‘हम बीजेपी में नहीं जाएंगे और न ही एनडीए में शामिल होंगे. साथ ही उन्होंने खलीलुर रहमान और यूसुफ पठान को लेकर भी यही दावा किया. उन्होंने कहा है कि तीनों बाहर से एनडीए को समर्थन देंगे.
अबु ताहेर खान ने एक बात साफ कर दी है कि यूसुफ पठान और खलीलुर रहमान सहित वे बीजेपी में नहीं जाएंगे, लेकिन एनडीए को समर्थन करेंगे. इस तरह तीनों सांसद बीजेपी में सीधे (डायरेक्ट) शामिल न होकर, एनडीए को बाहर से यानी इनडायरेक्ट सपोर्ट देने का रास्ता चुन रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि तीनों मुस्लिम सांसद बीजेपी में क्यों शामिल नहीं हो रहे हैं?
सीटों का डेमोग्राफिक और धार्मिक समीकरण
यूसुफ पठान, अबु ताहेर खान और खलीलुर रहमान 2024 में टीएमसी के टिकट पर जीतकर सांसद बने हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद तीनों ही सांसद पाला बदलकर NCPI में शामिल हो गए हैं. ममता बनर्जी का साथ भले ही छोड़ दिया हो, लेकिन बीजेपी में जाना उनके लिए सियासी तौर पर आसान नहीं है. इसकी वजह यह है कि बहरामपुर, मुर्शिदाबाद और जंगीपुर तीनों ही लोकसभा क्षेत्र मुर्शिदाबाद और मालदा बेल्ट में आते हैं, जहां पर मुस्लिम वोटर्स काफी अहम हैं.
यूसुफ पठान, अबु ताहेर खान और खलीलुर रहमान की जीत मुस्लिम मतदाताओं के दम पर हुई थी. ऐसे में तीनों मुस्लिम लोकसभा सांसद अगर औपचारिक रूप से बीजेपी का दामन थाम लेते हैं, तो इसे उनके पारंपरिक मतदाता आधार के साथ सीधे ‘विश्वासघात’ के रूप में देखा जाएगा. ऐसे में उनके लिए आगे की सियासी राह काफी मुश्किलों भरी हो जाएगी, क्योंकि मुस्लिम समुदाय बीजेपी से अभी भी दूरी बनाए हुए हैं.
बीजेपी के साथ उन्हें अपनी राजनीति को आगे बढ़ाना मुश्किल हो जाएगा. ये सांसद औपचारिक रूप से बीजेपी की सदस्यता ले लेते हैं, तो इन्हें अपने गृह क्षेत्रों और निर्वाचन क्षेत्रों में जनता के सीधे विरोध का सामना करना पड़ सकता है. स्थानीय स्तर पर उनकी राजनीतिक साख समाप्त होने का जोखिम है, जिसके चलते ही तीनों सांसद दूरी बनाकर चल रहे हैं. इस तरह क्षेत्र के विकास के नाम पर केंद्र सरकार को समर्थन कर इनडायरेक्ट सपोर्ट देने का रास्ता अपनाया है.
बीजेपी के साथ चलना आसान नहीं है?
बीजेपी के साथ तीनों मुस्लिम सांसदों का तालमेल बैठाकर चलना आसान नहीं है. बीजेपी के नेतृत्व में हिंदुत्व के मुद्दे पर अग्रिम राजनीति हो रही है, जिसे स्थानीय मुस्लिम समुदाय अपने विपरीत मान रहा है.
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में वक्फ संशोधन अधिनियम, यूसीसी, एनआरसी के मुद्दे पर अक्सर राजनीतिक व सामाजिक संवेदनशीलता रही है. ऐसे में सीधे बीजेपी में विलय करने से उनके पारंपरिक वोट बैंक में भारी नाराजगी पैदा हो सकती है. 
एनडीए को इनडायरेक्ट सपोर्ट देकर वे केंद्र सरकार में अपने क्षेत्रों के लिए विकास कार्यों का लाभ भी उठा सकते हैं और साथ ही बीजेपी का सीधा ठप्पा लगने से भी बचने का दांव है.
बीजेपी भी स्टैंड खुलकर नहीं ले रही
टीएमसी के बागी तीन मुस्लिम सांसद ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल बीजेपी का स्थानीय कैडर भी टीएमसी के पूर्व नेताओं और खासकर अल्पसंख्यक बहुल नेताओं को अचानक पार्टी में शामिल करने को लेकर बहुत सहज नहीं है. बीजेपी का एक तबका भी अल्पसंख्यक बहुल सीटों के नेताओं को सीधे पार्टी में शामिल करने के बजाय उन्हें सहयोगी या बाहरी समर्थक के रूप में बनाए रखने को ज्यादा मुफीद मानता है, ताकि उसके अपने पारंपरिक कैडर में असंतोष न फैले.
बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य और पार्टी प्रवक्ता बागी सांसदों को सीधे पार्टी में शामिल करने के दावों से दूरी बनाए हुए हैं. समिक भट्टाचार्य पहले कह चुके हैं कि टीएमसी के बागियों को सीधे नहीं लिया जाएगा. ऐसे में दोनों ही पक्षों के लिए प्रत्यक्ष विलय के बजाय एक-दूसरे से सुरक्षित दूरी बनाए रखना रणनीतिक रूप से ज्यादा मुफीद लग रहा है.
अबु ताहेर खान ने बासुनिया के सामूहिक दावों से दूरी बनाते हुए कहा है कि किसी को उनके नाम पर बोलने का अधिकार नहीं है. उन्होंने स्पष्ट किया कि विकास कार्यों के सिलसिले में वे सरकार से संवाद रख सकते हैं, लेकिन बीजेपी में नहीं जाएंगे और न ही एनडीए की बैठकों में हिस्सा लेंगे. अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या मुख्यमंत्री क्षेत्र के विकास के लिए आमंत्रित करते हैं, तो वे केवल सरकारी बैठकों में शामिल होंगे. इस तरह से वे अपने क्षेत्रों के विकास और प्रशासनिक कार्यों के लिए केंद्र सरकार के संपर्क में रहकर लाभ तो उठाना चाहते हैं, लेकिन बीजेपी का औपचारिक ठप्पा अपने ऊपर नहीं लगने देना चाहते.
यूसुफ पठान, अबु ताहेर खान और खलीलुर रहमान का बीजेपी में सीधे शामिल न होने का फैसला ‘राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने’ का एक तरीका है. वे टीएमसी नेतृत्व से बगावत का रास्ता तो चुन चुके हैं, लेकिन अपने मुस्लिम बहुल गृह क्षेत्रों में राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ने से बचने के लिए बीजेपी का औपचारिक बैनर या झंडा थामने से लगातार परहेज कर रहे हैं.
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