राजस्थान की विरासत पर संकट! क्या सिर्फ ऊंची चोटियाँ ही कहलाएंगी अरावली? आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई – Hindustan

भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला, अरावली को बचाने की जंग आज देश की सबसे बड़ी अदालत की दहलीज पर है। अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और इसके संरक्षण को लेकर छिड़े विवाद के बीच आज का दिन निर्णायक साबित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट की विशेष वैकेशन बेंच इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई कर रही है, जिस पर न केवल पर्यावरणविदों बल्कि राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के करोड़ों लोगों की नजरें टिकी हैं।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली वैकेशन बेंच इस मामले की गंभीरता को देखते हुए आज सुनवाई करेगी। इस पीठ में जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल हैं। यह मामला सीजेआई की कोर्ट में पांचवें नंबर पर लिस्टेड है, जिससे साफ है कि अदालत इस पर विस्तार से चर्चा कर सकती है। कानूनी जानकारों का मानना है कि आज की सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों के लिए कड़े और नए दिशा-निर्देश जारी हो सकते हैं।
अरावली को लेकर विवाद तब गहराया जब 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति की सिफारिश को स्वीकार किया था। इस सिफारिश के तहत अरावली की एक नई परिभाषा तय की गई, जिसके अनुसार केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही ‘अरावली रेंज’ का हिस्सा माना जाएगा।
इस फैसले के बाद से ही राजस्थान और हरियाणा में विरोध की लहर दौड़ गई है। पर्यावरणविदों का तर्क है कि:
खनन को बढ़ावा: 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली छोटी पहाड़ियों को अरावली की श्रेणी से बाहर करने का सीधा मतलब है कि वहां खनन माफियाओं के लिए रास्ता साफ हो जाएगा।
पारिस्थितिकी को खतरा: छोटी पहाड़ियाँ रेगिस्तान के विस्तार को रोकने और भूजल स्तर बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। इन्हें संरक्षण से बाहर करना प्राकृतिक आपदा को न्योता देना है।
ऐतिहासिक संदर्भ: यह मामला 1985 से चल रहा है। गोदावर्मन और एम.सी. मेहता जैसे ऐतिहासिक मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को व्यापक सुरक्षा कवच दिया था, जिसे नई परिभाषा कमजोर कर सकती है।
नई परिभाषा को न केवल सामाजिक स्तर पर, बल्कि कानूनी तौर पर भी कड़ी चुनौती मिली है। हरियाणा वन विभाग के पूर्व अधिकारी आर.पी. बलवान ने इस मामले में याचिका दायर कर केंद्र, राजस्थान और हरियाणा सरकार को पक्षकार बनाया है। उनका कहना है कि पहाड़ियों को ऊंचाई के पैमाने पर बांटना वैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टि से गलत है। कोर्ट ने इस पर पहले ही नोटिस जारी किए थे, जिस पर आज विस्तृत जिरह संभव है।
विवाद के बीच केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि अरावली का संरक्षण उनकी प्राथमिकता है। सरकार का कहना है कि नई परिभाषा को लेकर गलतफहमी पैदा की जा रही है और संरक्षण के प्रयास जारी रहेंगे। इसी दबाव के बीच, पर्यावरण मंत्रालय ने 24 दिसंबर को एक बड़ा कदम उठाते हुए अरावली क्षेत्र में सभी नए खनन पट्टों (Mining Leases) पर रोक लगा दी है। मंत्रालय ने राज्यों को सख्त निर्देश दिए हैं कि अनियमित खनन को रोकने के लिए पूर्ण प्रतिबंध लागू किया जाए।
अरावली सिर्फ एक पहाड़ नहीं, बल्कि उत्तर भारत का ‘फेफड़ा’ है। अगर छोटी पहाड़ियों को संरक्षण से हटाया जाता है, तो:
रेगिस्तान का विस्तार: राजस्थान का थार मरुस्थल तेजी से हरियाणा और दिल्ली की ओर बढ़ेगा।
वन्यजीवों का पलायन: तेंदुए और अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाएंगे।
प्रदूषण: अरावली धूल भरी हवाओं को रोकने का काम करती है; इसके बिना दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर जानलेवा हो सकता है।
आज की सुनवाई में सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या सुप्रीम कोर्ट 100 मीटर वाली अपनी पिछली टिप्पणी पर दोबारा विचार करेगा? क्या ‘अरावली’ की कोई ऐसी सर्वमान्य परिभाषा तय होगी जो इसके अस्तित्व को बचा सके?
अरावली का भविष्य अब कानून की व्याख्या और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच संतुलन पर टिका है। कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्राचीन पर्वतमाला की तस्वीर तय करेगा।
लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।
आरएसएसविज्ञापन र॓टहमार॓ साथ काम करेंहमारे बारे मेंसंपर्क करेंगोपनीयतासाइट जानकारी
Advertise with usAbout usCareers Privacy Contact usSitemapCode Of Ethics
Partner sites: Hindustan TimesMintHT TechShineHT TeluguHT BanglaHT TamilHT MarathiHT AutoHealthshotsHT SmartcastFAB Play

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News