राज्यपाल बिलों को सालों तक रोके रख सकते हैं? प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट में जारी रहेगी बहस – AajTak

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उस प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुनवाई फिर से शुरू की, जिसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या राष्ट्रपति और राज्यपालों के पास लंबित बिलों पर निर्णय लेने के लिए कोई समय सीमा तय की जा सकती है. सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी दलीलें पेश कीं, जबकि बेंच ने अहम मौकों पर हस्तक्षेप किया.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि किसी राज्य सरकार को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दाखिल करने का अधिकार ही नहीं है. उनके अनुसार अनुच्छेद 32 केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए है, जबकि कोई राज्य सरकार संवैधानिक इकाई के रूप में मौलिक अधिकारों की हकदार नहीं है. उन्होंने उदाहरण दिया कि पहले कर्नाटक ने जल विवाद में अनुच्छेद 32 का सहारा लिया था, लेकिन असफल रहा. ऐसे विवादों का हल अनुच्छेद 131 में है.
मेहता ने कहा, “अगर कोई संवैधानिक अंग वर्षों तक निर्णय नहीं लेता, तो इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरा संवैधानिक अंग उसका अधिकार ले ले. कोर्ट राज्यपाल को आदेश (मैंडमस) जारी नहीं कर सकती.”
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने काल्पनिक उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी राज्य में कानून-व्यवस्था बिगड़ जाए और स्थानीय पुलिस असफल हो जाए, तो क्या केंद्र सरकार अनुच्छेद 32 के तहत पैरामिलिट्री बल भेजने की मांग कर सकती है? जवाब है नहीं.
मेहता ने इस बात पर भी जोर दिया कि राज्यपाल भारत के राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करते हैं, न कि केंद्र सरकार का. इस पर मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने टिप्पणी की कि संविधान निर्माताओं ने भी राज्यपाल को केंद्र और राज्य के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बताया था.
तमिलनाडु सरकार की ओर से दलीलें
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तमिलनाडु सरकार की ओर से तर्क देते हुए कहा कि राज्यपाल हर संवैधानिक निर्णय में मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे होते हैं. उन्होंने कहा, “राज्यपाल विधायी प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन वे खुद विधायिका नहीं हैं. यदि उन्हें व्यापक विवेकाधिकार दिया गया तो यह अराजकता पैदा करेगा.”
सिंघवी ने कहा कि यदि मंत्रिपरिषद किसी बिल पर सहमति देती है, तो राज्यपाल संवैधानिक आधार पर उसे रोक नहीं सकते. कोई कानून असंवैधानिक है या दोषपूर्ण, यह तय करना अदालत का काम है, न कि राज्यपाल का.
उन्होंने बिना समय सीमा के बिलों को रोके रखने की कड़ी आलोचना की और कहा, “बिल को लौटाए बिना रोके रखना एक चौथे विकल्प जैसा है, जिसे संविधान ने कभी सोचा ही नहीं था. यह तो ‘अनंतकालीन विकल्प’ हो गया है.”
सिंघवी ने उदाहरण देते हुए कहा कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कई बिल राज्यपाल द्वारा लंबित रखे गए हैं. उन्होंने कहा, “ऐसा विवेकाधिकार डॉ. अंबेडकर के सपनों से भी परे है.”
बेंच की टिप्पणियां
मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा कि पहले के फैसलों में कोई समयसीमा तय नहीं की गई थी, क्योंकि अदालत ने कभी यह अनुमान नहीं लगाया था कि बिलों को सालों तक अलमारी में रख दिया जाएगा.
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने कहा कि जब विधानमंडल कार्रवाई नहीं करता तो बिल आम तौर पर निष्प्रभावी हो जाता है. वहीं, सिंघवी ने जोर दिया कि एक बार बिल राज्यपाल को भेज दिया जाए, तो उसे ऐसे ही खत्म नहीं किया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट आने वाली सुनवाई में इस मुद्दे की और गहराई से पड़ताल करेगा.

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