राम मंदिर से क्यों अलग है भोजशाला का मामला, वकील विष्णु शंकर जैन ने बताया – Hindustan Hindi News

भोजशाला मामले पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बतात हुए वकील विष्णु शंकर जैन ने इसे राम मंदिर से अलग बताया। जैन ने कहा कि राम मंदिर टाइटल केस था जबकि भोजशाला रिट पेटीशन से जुड़ा मामला था। हमने टाइटल नहीं मांगा था। हमने पूजा-पाठ का अधिकार मांगा था। टाइटल, कब्जा, ऑनरशिप और कस्टोडियन एएसआई का ही है।
भोजशाला मामले पर वकील विष्णु शंकर जैन ने बताया कि कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष से कहा है कि यदि वे वैकल्पिक भूमि प्राप्त करना चाहते हैं तो उनकी ओर से सरकार को एक आवेदन पेश किया जा सकता है। सरकार उन्हें वैकल्पिक भूमि आवंटित करने के अनुरोध पर विचार करेगी। राम मंदिर मामले और भोजशाला मामले के बीच समानताओं पर जैन ने कहा कि राम मंदिर मामले से कुछ समानताएं हैं, लेकिन अगर कोई इसे पूरी तरह से कानूनी नजरिए से देखे तो इसमें काफी अंतर है। राम मंदिर टाइटल केस था जबकि भोजशाला रिट पेटीशन से जुड़ा मामला था।
उन्होंने कहा कि मुस्लिम पक्ष को सुप्रीम कोर्ट जाने की पूरी आजादी है। यह उनका संवैधानिक अधिकार है। हम भी वहां उनका स्वागत करेंगे। हम भी सुप्रीम कोर्ट में बेंच के सामने अपनी दलीलें पेश करने के लिए मौजूद रहेंगे। ठीक वैसे ही जैसे हमने हाई कोर्ट में किया है। हम वहां भी कानूनी तर्क और तथ्यों के आधार पर इस मामले में लड़ेंगे।
वकील ने बताया कि हाई कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय के इस स्थल पर नमाज पढ़ने के 7 अप्रैल 2003 के आदेश के विशिष्ट हिस्से को रद्द कर दिया है। इस आदेश में हिंदू पक्ष को इस स्थल पर हर मंगलवार और वसंत पंचमी पर पूजा-अर्चना करने का अधिकार और मुस्लिम पक्ष को हर शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।
वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि राम मंदिर फैसले के बाद यह किसी कोर्ट द्वारा सुनाया गया दूसरा ऐसा अंतिम फैसला है। आज यह साबित हो गया है कि पूरा भोजशाला परिसर वास्तव में राजा भोज ने ही बनवाया था। यह मां वाग्देवी (मां सरस्वती) को समर्पित एक पवित्र स्थल था। कोर्ट ने हिंदू पक्ष द्वारा पेश किए गए सभी तर्कों को स्वीकार कर लिया है। साथ ही, मां सरस्वती (मां वाग्देवी) की मूर्ति के संबंध में कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय से उसे वापस लाने के उपायों पर विचार करे। इसके अलावा, कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को यह छूट दी है कि वे सरकार को एक आवेदन देकर नमाज पढ़ने और मस्जिद के लिए वैकल्पिक जमीन का अनुरोध कर सकते हैं।
उन्होंने बताया कि यह संपत्ति 1951 में जारी एएसआई (भारतीय पुरातत्व विभाग) की अधिसूचना के दायरे में आती है। भोजशाला परिसर उस अधिसूचना की प्रविष्टि संख्या 90 के तहत सूचीबद्ध है और यह स्थल एएसआई अधिनियम, 1958 की धारा 16 के अधीन है। इसलिए इस स्थल पर एएसआई का पूर्ण आधिपत्य और नियंत्रण बना रहेगा। कोर्ट ने धारा 16 के तहत हिंदू पक्ष को इस स्थल पर पूजा-अर्चना और अनुष्ठान करने का अधिकार प्रदान किया है।
सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह ‘लाइव हिन्दुस्तान’ में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के ‘डीडी न्यूज’ से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

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