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Last updated on – April 23, 2026 7:14 AM IST
By Shivendra Rai
साल 2020 में जब चीन से साथ पूर्वी लद्दाख में टकराव हुआ था तब भारत ने एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया था. भारतीय सेना ने चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से सटे लद्दाख सेक्टर के अग्रिम इलाकों में K9-वज्र सेल्फ-प्रोपेल्ड होवित्जर तोपें तैनात कर दी थीं. चीन इस कदम से चौंक गया. K9 वज्र की तैनाती देख पीएलए आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर सकी. अब भारत इस खास तोप की 200 अतिरिक्त यूनिट्स खरीदने की योजना बना रहा है. आइये जानते हैं इस तोप की ताकत और खासियत. (प्रतीकात्मक AI तस्वीर)
K9 को दक्षिण कोरिया की डिफेंस कंपनी Hanwha Defense ने विकसित किया है और इसे भारत में लार्सन एंड टूब्रो बनाती है. लार्सन एंड टुब्रो (L&T) 100 K-9 वज्र का पहला बैच 2021 में ही सेना को सौंप चुकी है. 100 और यूनिट्स के लिए दूसरा कॉन्ट्रैक्ट 2024 के आखिर में पक्का हुआ था. ये सौदा 7,600 करोड़ से ज्यादा का है. इस कॉन्ट्रैक्ट में स्वदेशी पुर्जों का इस्तेमाल 60 प्रतिशत होगा. (प्रतीकात्मक AI तस्वीर)
अब अपने तोपखाने को अपग्रेड करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए भारत ने 200 और K-9 वज्र ट्रैक्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड होवित्जर खरीदने की योजना बनाई है. इस नए ऑर्डर से भारतीय सेना में K-9 वज्र बेड़े की संख्या दोगुनी होकर 400 यूनिट हो जाएगी. तीसरे चरण में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा भी बढ़ेगा और यह 70 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा. (प्रतीकात्मक AI तस्वीर)
K-9 वज्र सेल्फ-प्रोपेल्ड तोप की सामान्य रेंज 38 किलोमीटर है. लेकिन, ऊंचाई पर तैनात करने से यह दुश्मन के ठिकानों पर करीब 50 किलोमीटर की दूरी से हमला कर सकती है. ये तोपें ऊंचे पहाड़ी इलाकों में भी बेहद सक्षम हैं. किसी टैंक की तरह इन्हें आसानी से चलाकर कहीं भी ले जाया जा सकता है. (प्रतीकात्मक AI तस्वीर)
K-9 वज्र को दक्षिण कोरिया में K9 थंडर के नाम से जानते हैं. यह एक 155mm-52-कैलिबर वाला तोपखाना सिस्टम है. शुरू में इसे राजस्थान के गर्म, रेतीले रेगिस्तानों के लिए खरीदा गया था. लेकिन, 50 टन वजनी इस तोप ने पहाड़ों में भी बेहतरीन प्रदर्शन किया. पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ झड़प के बाद भारतीय सेना ने एक पूरी रेजिमेंट तैनात कर दी थी. (प्रतीकात्मक AI तस्वीर)
K-9 वज्र के नए वर्जन में लद्दाख और सिक्किम जैसे ऊंचे पहाड़ी इलाकों में होने वाली लड़ाई के लिए कई बदलाव किए गए हैं. पहाड़ों के लिए तैयार इन तोपों में खास विंटराइज़शन किट लगी हैं. आधुनिक हीटिंग सिस्टम और खास लुब्रिकेंट का प्रयोग किया गया है जो -20 डिग्री सेल्सियस पर भी जमते नहीं हैं. (प्रतीकात्मक AI तस्वीर)
रक्षा मामलों की वेबसाइट डिफेंस डॉट इन के अनुसार, 200 तोपों को खरीदने की योजना भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ रहे सैन्य सहयोग का नतीजा है. इस साझेदारी में हथियारों की तकनीक भी दी जाएगी. रिपोर्ट के अनुसार. यह साझेदारी सिर्फ तोपखाने तक ही सीमित नहीं रहेगी. दोनों देश आगे चलकर विमान-रोधी सिस्टम और अगली पीढ़ी के मिसाइल प्लेटफॉर्म का विकास भी मिलकर करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. (प्रतीकात्मक AI तस्वीर)
मई 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान K-9 वज्र ने एलओसी पर अपनी ताकत दिखाई थी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस दौरान भारतीय सेना ने K-9 वज्र का भी इस्तेमाल किया था और GPS-गाइडेड M982 एक्स कैलिबर गोले दागे थे जिससे इसकी रेंज बढ़कर 50 किलोमीटर तक हो गई थी. इस लंबी दूरी की मारक क्षमता ने भारतीय सेनाओं को दुश्मन के इलाके में बेहद अंदर तक हमला करने की ताकत दी. (प्रतीकात्मक AI तस्वीर)
K-9 वज्र की सबसे बड़ी खासियत शूट-एंड-स्कूट (दागो और भागो) क्षमता है. यह तोप एक मिनट से भी कम समय में रुकने, फायर करने और एक नई जगह पर जाने में सक्षम है. इसका इंजन 1,000-हॉर्सपावर का है. यह ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाकों में में भी आसानी से चल सकती है. भारतीय सेना अब इस तोप को केवल एक भारी बख्तरबंद होवित्जर के बजाय, एक अत्यधिक सटीक, नेटवर्क-आधारित मारक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है. (प्रतीकात्मक AI तस्वीर)
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