आर्थिक शोध एजेंसी जीटीआरआई ने भारत सरकार से अमेरिकी दबाव में यूपीआई पर एमडीआर या कोई शुल्क न लगाने का आग्रह किया है। …और पढ़ें
जीटीआरआई ने यूपीआई पर एमडीआर शुल्क का विरोध किया
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। आर्थिक शोध एजेंसी ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने भारत सरकार से आग्रह किया है कि वह अमेरिकी दबाव में यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) या कोई शुल्क लगाने का फैसला नहीं करे।
गुरुवार को जीटीआरआई की तरफ से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार का इस तरह का कदम सीधे तौर पर अमेरिका की वीजा व मास्टर कार्ड जैसी कंपनियों के वित्तीय हितों की रक्षा करना होगा ना कि यूपीआई की दीर्घकालिक स्थिरता बना कर रखना।
जीटीआरआई की यह रिपोर्ट जिस दिन आई उसके कुछ घंटे बाद ही गुरुवार को लोकसभा में निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए में संशोधन संबंधी विधेयक को मंजूरी दे दी गई है। यह विधेयक सरकार को डिजिटल लेनदेन की कीमत निर्धारण के तरीके को बदलने की शक्ति देता है।
अभी बैंक और भुगतान-प्रणाली प्रदाता कंपनी यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड जैसे माध्यमों के लिए उपयोगकर्ताओं से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं ले सकते हैं। विधेयक केंद्र सरकार को अधिसूचना के जरिए यह तय करने का अधिकार देता है कि कौन-कौन से इलेक्ट्रॉनिक भुगतान मोड या लेनदेन मुफ्त रहेंगे। यह सरकार को बाद में जीरो-एमडीआर ढांचे में बदलाव करने के लिए आवश्यक कानूनी अधिकार प्रदान करता है।
जीटीआरआई की रिपोर्ट में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) की तरफ से भारत की यूपीआई व रुपे फ्रेमवर्क व ब्राजील की डिजिटल भुगतान ढांचा पिक्स की आलोचना का जिक्र है। यूएसटीआर ने आरोप लगाया था कि भारत व ब्राजील की घरेलू डिजिटल भुगतान प्रणालियां अमेरिकी भुगतान प्रदाताओं को तरजीह नहीं देतीं।
इस मामले में ब्राजील ने अमेरिकी दबाव के आगे झुकने से मना कर दिया जिसके बाद ज्यादातर ब्राजीलियाई सामानों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया गया है। इलेक्ट्रोनिक्स भुगतान को भी इसमें शामिल किया गया। ब्राजील ने पिक्स में कोई बदलाव नहीं किया और इसकी सेवाएं पूरी तरह से मुफ्त है।
भारत के मामले में यूएसटीआर का कहना है कि यहां रुपे को तरजीह दिया जा रहा है। यूपीआई लांच के बाद इसके जरिए भुगतान लगातार बढ़ रहा है जिससे वीजा और मास्टरकार्ड का संभावित कारोबार प्रभावित हो रहा है। असलियत में भारत ने जब वर्ष 2012 में रुपे को लांच किया था तब इसकी वजह यहीं बताई गई थी कि यहां के बैंक वीजा व मास्टरकार्ड को काफी ज्यादा राशि का भुगतान कर रहे हैं।
असलियत में वीजा और मास्टरकार्ड का माडल बैंकों, प्रोसेसर्स और नेटवर्क को मर्चेंट लेनदेन से फीस कमाने पर आधारित है। हालांकि जीटीआरआई ने यह भी कहा है कि अमेरिकी कंपनियों का राजस्व प्रभावित हुआ है लेकिन अभी भी यूपीआइ प्लेटफार्म का इस्तेमाल में अमेरिकी कंपनियां ही हावी हैं। गूगल पे और वालमार्ट की स्वामित्व वाली फोनपे संयुक्त तौर पर 80 फीसद से ज्यादा यूपीआई लेनदेन प्रोसेस कर रही हैं।
यही नहीं अमेरिका डेटा लोकलाइजेशन नियमों (यानी ग्राहकों से जुड़े हर तरह के आंकड़ों को भारत में ही स्टोर करने की व्यवस्था) का भी विरोध करता है। ऐसे में जीटीआरआई ने कहा है कि विदेशी कंपनियों को खुश करने के लिए यूपीआई को बदलने की जरूरत नहीं है।
शुल्क संबंधी फैसला यूपीआई चलाने की लागत और उसकी दीर्घकालिक स्थिरता को केंद्र में रख कर किया जाना चाहिए। रुपे को सरकारी समर्थन जारी रहना चाहिए। रिपोर्ट में चेतावनी है कि वाशिंगटन की मांगों का कोई अंत नहीं- हर रियायत अगली मांग को आमंत्रित करती है।
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