शिविरार्थियों को साधना संग सिखाए जा रहे संस्कार अतिशय क्षेत्र गिरार गिरी जी में धार्मिक आयोजनों से बह रही भक्ति की बयार
परिग्रह का त्याग, परिणामों को आत्मकेंद्रित करना ही उत्तम आकिंचन्य का मर्म
मड़ावरा। श्री आदिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र गिरारगिरी में गणिनी आर्यिका 105 विन्ध्यश्री माताजी ससंघ के मंगल सान्निध्य में दशलक्षण महापर्व श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। दस दिवसीय संस्कार साधना शिविर में सैकड़ों श्रावक श्राविकाएं व्रत, उपवास, ध्यान, स्वाध्याय संग धार्मिक क्रियाओं के माध्यम से आत्मविशुद्धि की साधना कर रहे हैं।
यहां प्रतिदिन सुबह पांच से रात्रि नौ बजे तक चलने वाले शिविर में आर्यिका 105 विन्ध्यश्री माताजी के निर्देशन में ध्यान, अभिषेक, शांतिधारा, दशलक्षण धर्म पूजन, तत्त्वार्थसूत्र का स्वाध्याय, विधान, प्रवचन, महाआरती सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जा रहे हैं। पूरे क्षेत्र का वातावरण जिनवाणी, भक्ति और साधना से आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत बना हुआ है। इस मौके पर दशलक्षण महापर्व के नौवें दिन माताजी ने उत्तम आकिंचन्य धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि आकिंचन्य का भाव है ‘कुछ भी मेरा नहीं’, अर्थात परिग्रह और ममत्व का त्याग। संसार में जो कुछ दिखाई देता है अथवा जिसे हम अपना मानते हैं, वह वास्तव में स्थायी रूप से हमारा नहीं है। इस सत्य का बोध मनुष्य को वस्तुओं के प्रति आसक्ति कम करने और आवश्यकता से अधिक संग्रह से बचने की प्रेरणा देता है। आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य धन, संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा के पीछे भाग रहा है, जबकि इन सबके प्रति बढ़ती आसक्ति ही मानसिक अशांति का कारण बनती है। सांझ होते ही पक्षी एक वृक्ष पर विश्राम करते हैं और सुबह होते ही अलग-अलग दिशाओं में उड़ जाते हैं। उसी प्रकार संसार में हमारे संबंध और निवास भी अस्थायी हैं। कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी परिणामों को आत्मकेंद्रित करना ही आकिंचन्य धर्म की भावधारा है। जहां परिग्रह और ममत्व की भीड़ है, वहां आकुलता और अशांति है, जबकि ‘मेरा कुछ नहीं’ के भाव में मन हल्का और आत्मा शांत होती है। उत्तम आकिंचन्य हमें बाहरी वस्तुओं से अधिक अंतर्मन के ममत्व और आसक्ति का त्याग करना सिखाता है।
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25 सितम्बर को होगा वृहद वार्षिक प्रतिक्रमण
मड़ावरा। मीडिया प्रभारी डा. सुनील ‘संचय’ ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के अन्तिम दिन 25 सितम्बर को शाम छह बजे वृहद वार्षिक प्रतिक्रमण का आयोजन आर्यिका 105 विन्ध्यश्री माताजी के निर्देशन में होगा। इसमें वर्षभर में हुए अपराधों व भूलों के लिए आत्मावलोकन करते हुए क्षमा याचना और प्रायश्चिय किया जाएगा। इस आयोजन को सफल बनाने में गिरारगिरी ट्रस्ट समिति, प्रबंध समिति, वर्षायोग समिति एवं सकल दिगम्बर जैन क्षेत्रीय समाज का सक्रिय सहयोग रहा है। समिति के महामंत्री प्रदीप जैन ने बताया कि आर्यिका 105 विन्ध्यश्री माताजी के साथ आर्यिका 105 विद्वत्श्री माताजी, आर्यिका 105 सुनन्दन माताजी, आर्यिका सुवंदन माताजी, सुचन्दन माताजी, सुदर्शन माताजी सहित आर्यिका संघ का भी सान्निध्य प्राप्त हो रहा है।
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उत्तम आकिंचन्य में ‘मैं’ और ‘मेरेपन’ से मुक्त होने की साधना
संसार में रहते हुए भी आत्मा की एकाकी यात्रा को पहचानना जरूरी: डा. सुनील ‘संचय’
ललितपुर। दशलक्षण महापर्व के नौवें दिन उत्तम आकिंचन्य धर्म पर उत्कर्ष समूह भारत की ओर से आयोजित दस दिवसीय व्याख्यानमाला में डा. सुनील जैन ‘संचय’ ने कहा कि आकिंचन्य का मर्म केवल बाहरी वस्तुओं का त्याग नहीं, बल्कि ‘मैं’ और ‘मेरेपन’ की भावना से मुक्त होना है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवनभर धन, संपत्ति, संबंध, पद और प्रतिष्ठा को अपना मानकर संग्रह करता रहता है, जबकि जीवन की अंतिम यात्रा अकेली होती है। वस्तुओं का त्याग कर देने के बाद भी यदि मन में उनके प्रति ममत्व बना रहे तो वास्तविक परिग्रह समाप्त नहीं होता। मोह, ममता और आसक्ति का क्षय ही उत्तम आकिंचन्य की दिशा में वास्तविक कदम है। आकिंचन्य संसार से पलायन की शिक्षा नहीं देता। गृहस्थ को अपने परिवार और सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए यह बोध बनाए रखना चाहिए कि कोई भी वस्तु या संबंध स्थायी रूप से उसका नहीं है। उन्होंने पक्षियों का उदाहरण देते हुए कहा कि सांझ को पक्षी एक वृक्ष पर विश्राम करते हैं और सुबह अलग-अलग दिशाओं में उड़ जाते हैं। इसी प्रकार संसार में हमारे संबंध भी जीवन-यात्रा के पड़ाव हैं।
उन्होंने कहा कि जहां परिग्रह बढ़ता है, वहां चिंता और ममत्व बढ़ता है। जहां ‘मेरा’ कम होता है, वहां मन हल्का और आत्मा अधिक स्वतंत्र होती है। दशलक्षण महापर्व आत्मावलोकन का अवसर है कि हमने कितना संग्रह किया, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उस संग्रह के प्रति कितनी आसक्ति छोड़ी। उन्होंने कहा कि उत्तम आकिंचन्य की साधना मनुष्य को ‘मेरा’ से ‘मेरा कुछ भी नहीं’ और ‘मैं’ से ‘मैं शुद्ध आत्मा हूं’ की ओर ले जाती है। संसार में रहते हुए कर्तव्यों का पालन करें, लेकिन वस्तुओं और संबंधों को अपना स्थायी आधार न मानें-यही आकिंचन्य धर्म का सार है।
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