Google AI overviews: क्या आपने कभी सोचा है कि जिस गूगल सर्च के AI ओवरव्यू या सजेशन पर हम आंख मूंदकर भरोसा करते हैं, अगर किसी बिजनेस को ‘स्कैम’ बताने लगे, तो क्या होगा? जर्मनी में कुछ ऐसा ही हुआ, जहां दो सही पब्लिशर्स को AI ओवरव्यू, गलत बता रहा था. दोनों से इस सिचुएशन को अदालत में चुनौती दी. AI ओवरव्यू (AI Overviews) फीचर को लेकर कोर्ट ने ना सिर्फ गूगल को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है, बल्कि गूगल की उन दलीलों को भी सिरे से खारिज कर दिया जो वह खुद को बचाने के लिए दे रहा था..
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ये मामला तब शुरू हुआ जब म्यूनिख (Munich) के दो बड़े पब्लिशर्स ने गूगल के खिलाफ मुकदमा दायर किया. दोनों ने सर्च इंजन के नीचे बने AI ओवरव्यू में अपने खिलाफ गलत जानकारी देने का दावा किया. शिकायत के अनुसार, असल में, जब कोई यूजर गूगल पर इन पब्लिशर्स के बारे में सर्च कर रहा था, तो गूगल का नया AI टूल (AI Overviews) सर्च रिजल्ट के सबसे ऊपर खुद से एक समरी बनाकर दिखा रहा था.
इस समरी में AI ने लिखा, कि हां, ये कंपनी अपनी संदिग्ध व्यावसायिक गतिविधियों और स्कैम के लिए जानी जाती है. इसमें सबसे डराने वाली बात ये थी कि जिन वेबसाइटों को गूगल के AI ने सोर्स के रूप में लिंक किया था, उनमें से किसी भी वेबसाइट पर ऐसा कुछ नहीं लिखा था, यानी गूगल के AI मॉडल ने खुद से ही इसे ईजाद किया था, जिसे तकनीकी भाषा में एआई का मतिभ्रम (AI Hallucination) कहते है.
म्यूनिख की रिजनल कोर्ट ने इस मामले में गूगल को सीधे तौर पर दोषी माना. अंतरिम आदेश में AI ओवरव्यू को चेंज करने का आदेश दिया. वहीं, गूगल को पब्लिशर्स के 80% मुकदमे का खर्च देने को कहा है. कोर्ट ने इस मामले में तीन अहम टिप्पणी की,
आमतौर पर इंटरनेट कंपनियां सेफ हार्बर (Safe Harbour) नियमों के तहत बच जाती हैं. उनका तर्क होता है कि वे सिर्फ दूसरों की वेबसाइटों के लिंक दिखाते हैं, कंटेंट उनका नहीं होता. लेकिन कोर्ट ने कहा कि AI ओवरव्यू, सर्च इंजन की तरह काम नहीं करता. ये अलग-अलग वेबसाइटों से जानकारी उठाकर एक नया, स्वतंत्र और मौलिक वक्तव्य तैयार करता है. इसलिए, यह कंटेंट गूगल का अपना माना जाएगा और इसके लिए गूगल ही सीधे तौर पर उत्तरदायी है.
सुनवाई के दौरान गूगल ने कहा कि यूजर्स को पता होना चाहिए कि AI हमेशा सही नहीं होता, इसलिए उन्हें नीचे दिए लिंक्स पर क्लिक करके खुद वेरिफाई करनी चाहिए. अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि अगर यूजर को खुद ही हर लिंक पर जाकर क्रॉस-चेक करना है, तो फिर इस AI फीचर का मतलब ही क्या रह जाता है? फिर तो यह पूरा फीचर ही बेकार है.
अदालत ने ध्यान दिलाया कि अगर गूगल को इस गलती के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता, तो पीड़ित लोग न्याय के लिए कहां जाएंगे? क्योंकि जिन सोर्स वेबसाइटों का लिंक दिया गया था, उन्होंने तो कोई झूठ लिखा ही नहीं था, इसलिए उन पर मुकदमा नहीं हो सकता. ऐसे में गूगल को जिम्मेदारी लेनी ही होगी.
ये बहस सिर्फ जर्मनी तक सीमित नहीं है. भारत में भी इस साल की शुरुआत में एलन मस्क की कंपनी xAI (पूर्व में SpaceXAI) के Grok AI चैटबॉट को लेकर ऐसा ही विवाद खड़ा हुआ था. AI मॉडल असल में इंसानों द्वारा तैयार किए गए डेटा पर ही ट्रेन होते हैं और वे सिर्फ अगले शब्द या वाक्य का अनुमान लगाते हैं, लेकिन जब वे बड़ी गलती करते हैं, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या उस यूजर की जिसने सवाल पूछा? क्या उस प्लेटफॉर्म की जो इसे होस्ट कर रहा है? या उस कंपनी की जिसने इसे बनाया? जर्मन कोर्ट का यह फैसला साफ तौर पर इशारा करता है कि गलती का ठीकरा अब AI बनाने वाली कंपनियों के सिर ही फूटेगा.
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सत्यम, बिहार से हैं. उन्होंने LS College, मुजफ्फरपुर, बिहार से जर्नलिज्म की पढ़ाई की है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से MA In Media Governance में मास्टर्स किया है. मास्टर्स के साथ … और पढ़ें
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