साफ हवा के लिए सख्ती का समय आया – Hindustan

हर साल अक्तूबर से फरवरी के बीच, उत्तर भारत की भौगोलिक परिस्थिति और मौसमी दशा वायु प्रदूषण को बदतर बना देती हैं। हवा की गुणवत्ता इतनी खराब हो जाती है कि सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। पंजाब से लेकर पश्चिम बंगाल तक फैले सिंधु-गंगा के पूरे मैदानी इलाके में जैसे-जैसे तापमान गिरता है और मानसूनी हवाएं लौटती हैं, वैसे-वैसे भारी हवा प्रदूषण को धरती के पास रोकने लगती है। इससे धुआं और हानिकारक उत्सर्जन वायुमंडल में नीचे ही जमा होने लगते हैं और हवा दमघोंटू बन जाती है। नतीजतन, ग्रैप जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। इसी बुधवार से दिल्ली-एनसीआर में ग्रैप-1 की शुरुआत हो गई है।

शहर-दर-शहर वायु गुणवत्ता अब चिंता बढ़ाने लगी है। 20 अक्तूबर को दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 179, यानी मध्यम श्रेणी में था। बुधवार को यह 244 पर पहुंच गया। हवा की गति कम होने पर अगले 10 से 15 दिनों में प्रदूषण और बढ़ सकता है। फिलहाल आसमान साफ होने, हवा में प्रदूषकों के फैलाव के लिए पर्याप्त ऊंचाई होने और अनुकूल वायु प्रवाह के कारण स्थिति नियंत्रण में है, पर अगले कुछ दिनों तक हवा की गुणवत्ता ‘खराब’ श्रेणी में ही रहने का अनुमान है।

दिल्ली में पीएम 2.5 का सालाना औसत स्तर लगातार खराब बना हुआ है और यह अभी करीब 100 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है, जो भारत के 40 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर के सुरक्षित मानक से काफी अधिक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देशों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर इसकी सुरक्षित सीमा महज पांच माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है। इससे समझा जा सकता है कि प्रदूषण पर काबू पाने में हम कितने पीछे हैं। बेशक, 2021 से 2025 के बीच पीएम 2.5 का वार्षिक औसत स्तर 105 से घटकर 97 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रहा, पर यह अब भी खतरनाक रूप से ऊंचा है।

मुश्किल यह है कि हमारा तंत्र वायु प्रदूषण से निपटने के लिए तभी तत्पर होता है, जब प्रदूषण-स्तर खतरनाक सीमा को पार करने लगता है, जबकि पूर्वानुमान के आधार पर पहले से कार्रवाई की जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि दिल्ली-एनसीआर के तमाम शहरों-उप-नगरों के बीच बेहतर तालमेल हो।

सवाल है कि गंगा के मैदानी इलाकों में वायु प्रदूषण से कैसे निपटा जाए? चूंकि यह भौगोलिक रूप से एक घिरा हुआ क्षेत्र है, इसलिए यहां प्रदूषण से पार पाने के लिए वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर नीतियां बनानी होंगी। मसलन, अमेरिका के लॉस एंजिल्स ने, जो पहाड़ों से घिरा हुआ क्षेत्र है, उत्सर्जन की निगरानी करके, स्वच्छ ईंधन अपनाकर और तकनीक आधारित क्षेत्रीय नियामक बनाकर धुंध पर काबू पाया। इतिहास गवाह है कि भारी औद्योगिकीकरण के दौर में भी अधिकारियों को कड़े कानून बनाने पड़े थे। जैसे, 1950 के दशक में लंदन में ‘पी-सूप’ (बहुत घना धुंघ) देखा गया था। इससे निपटने के लिए स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा दिया गया और शहरों में कोयले के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई। एशिया में बीजिंग एक बड़ा उदाहरण है, जहां के उद्योगों पर सख्त नियम लागू किए गए और समग्र प्रयासों से वहां की वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार लाया गया।

ऐसा नहीं है कि भारत ने प्रयास नहीं किए हैं। दिल्ली-एनसीआर और पूरे देश में प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों के लिए मानक लगातार सख्त किए गए हैं। गाड़ियों के मामले में भी 2017 से 2020 के दरम्यान बीएस-चार से बीएस-छह मानक अपनाए गए। स्वच्छ ईंधन के नियम भी लागू हुए, पर उनके पालन में सख्ती हर जगह एक जैसी नहीं रही। इसी तरह, बिजली संयंत्रों, उद्योगों, कचरा दहन गृहों, घरों में स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल, छोटे औद्योगिक प्रतिष्ठानों और पुरानी गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण की समस्या अब भी बनी हुई है। इनसे निपटने के लिए राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठोस कार्ययोजना जरूरी है। हमारे पास ऐसे मानक भी होने चाहिए, जिनसे यह पता चल सके कि उत्सर्जन में कितनी कमी आई है, हवा की गुणवत्ता कितनी बेहतर हुई है और स्वास्थ्य पर किस हद तक प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है?

जरूरी यह भी है कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) का लक्ष्य केवल उन शहरों तक सीमित नहीं रहे, जहां प्रदूषण तय मानक से अधिक है। इसमें सभी शहरों को शामिल करना चाहिए। इसी तरह, हमें केवल उन कारणों पर ध्यान नहीं केंद्रित करना चाहिए, जो आसानी से दिखाई देते हैं, जैसे- पराली जलाना। इसके बजाय प्रदूषण के सभी स्रोतों पर काम करना जरूरी है। अध्ययनों के अनुसार, सर्दियों में पीएम 2.5 प्रदूषण का बड़ा कारण ईंधन का जलना व रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बनने वाले सूक्ष्म कण हैं। ठहरी हुई हवा एवं हवा की कम गति के कारण धूल का योगदान करीब 15 प्रतिशत रहता है। दिल्ली में प्रदूषण का लगभग एक-तिहाई हिस्सा शहर के अंदर ही पैदा होता है, एक-तिहाई हिस्सा आसपास के जिलों से और बाकी गंगा के मैदानी क्षेत्रों से आता है। इसीलिए, कार्रवाई दिल्ली तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पूरे क्षेत्र में होनी चाहिए। पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने से उठता धुआं इसका ज्वलंत उदाहरण है, जिससे सर्दियों में हर साल दिल्ली-एनसीआर का दम घुटता है।

यहां अक्सर ‘एंटी स्मॉग गन’ और पानी के छिड़काव पर जोर दिया जाता है, लेकिन इनसे हवा में नमी तो बढ़ती है, पर ये प्रदूषण पैदा करने वाले सूक्ष्म कणों को खत्म नहीं कर पाते। टूटे हुए डिवाइडर या रास्तों पर मशीनों से सफाई करने पर अक्सर धूल फिर से हवा में उड़ने लगती है, इसलिए सड़कों की मरम्मत, किनारे पर हरियाली और सर्दियों से पहले डामर का काम करना फायदेमंद होगा।

रही बात गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण की, तो इसे रोकने के लिए गंगा के पूरे मैदानी क्षेत्र में सख्ती बरतनी होगी। पुराने डीजल ट्रक एक से दूसरे शहर में पहुंच जाते हैं और वहां प्रदूषण फैलाते हैं, इसलिए प्रदूषण जांच केंद्रों की व्यवस्था में सुधार आवश्यक है। दिल्ली के साथ एक अच्छी बात यह है कि यहां मेट्रो का बड़ा जाल है। इसका विस्तार और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को अंतिम छोर तक बढ़ाना प्रदूषण के खिलाफ काफी कारगर प्रयास होगा।

जाहिर है, तात्कालिक प्रयास करने के बजाय हमें पूरे साल चलने वाले कदम उठाने होंगे। भौगोलिक रूप से घिरे होना हमारी प्राकृतिक स्थिति है, लेकिन पराली जलाने की घटनाएं घटने और सालाना औसत में मामूली सुधार के बावजूद दमघोंटू हवा में जीना नीतिगत विफलता ही मानी जाएगी।

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