Science News: टोक्यो यूनिवर्सिटी के मरीन बायोलॉजिस्ट लियो उएसाका का मकसद कुछ और था. वे यह समझना चाहते थे कि समुद्री पक्षी यानी सीबर्ड्स पानी से उड़ान भरने के लिए अपने पैरों का इस्तेमाल कैसे करते हैं. इसके लिए उन्होंने 15 स्ट्रीक्ड शियरवाटर (Calonectris leucomelas) पक्षियों पर छोटी-सी कैमरा डिवाइस लगाई. कैमरे की दिशा पंखों और पैरों की मूवमेंट रिकॉर्ड करने के लिए थी. लेकिन फुटेज में कुछ और ही कैद हो गया. रिसर्चर्स ने देखा कि ये पक्षी उड़ते-उड़ते ही टॉयलेट कर रहे थे. पहले तो यह मजाकिया सा लगा. लेकिन जब डेटा को गहराई से देखा गया, तो मामला वैज्ञानिकों को भी चौंकाने वाला लगा. करीब 200 बार पक्षियों के टॉयलेट करने के वीडियो मिले. इनमें से सिर्फ एक बार ही पक्षी पानी पर बैठे-बैठे ऐसा करता दिखा. बाकी लगभग सभी घटनाएं उड़ान भरने के दौरान हुईं. कई बार तो पक्षी सिर्फ कुछ सेकंड के लिए उड़ते, टॉयलेट करते और तुरंत पानी पर लौट आते. यानी उड़ान का मकसद सिर्फ यही था.
एक घंटे में पांच बार से ज्यादा टॉयलेट
स्टडी में पता चला कि ये सीबर्ड्स हर घंटे पांच से ज्यादा बार टॉयलेट करते हैं. सोचिए, हर चार से दस मिनट पर इंसान को दौड़ना पड़े और उसी वक्त टॉयलेट करना पड़े. इतना मेहनत वाला काम ये पक्षी रोज, हर घंटे करते हैं. रिसर्चर्स का मानना है कि ये व्यवहार किसी बड़े कारण से जुड़ा है.
वजन कम, उड़ान आसान
वैज्ञानिकों का अंदाजा है कि उड़ान भरने से पहले शरीर हल्का करना पक्षियों के लिए फायदेमंद है. एक पक्षी हर घंटे अपने वजन का करीब 5% हिस्सा टॉयलेट से बाहर निकाल देता है. इतना बोझ कम होने पर पंखों की फड़फड़ाहट और टेकऑफ आसान हो जाता है.
समुद्र के लिए उर्वरक
सीबर्ड्स का टॉयलेट सिर्फ उनके लिए ही फायदेमंद नहीं, बल्कि समुद्री पारिस्थितिकी के लिए भी जरूरी है. रिसर्चर्स का कहना है कि इनका मल प्राकृतिक उर्वरक है. समुद्र और तटीय इलाकों में पोषक तत्वों की आपूर्ति का बड़ा स्रोत यही है. पहले जितना अनुमान था, उससे कहीं ज्यादा मात्रा में ये पक्षी पोषक तत्व समुद्र तक पहुंचा रहे हैं.
पानी में क्यों नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि ये पक्षी पानी पर रहते हुए टॉयलेट क्यों नहीं करते. इसके पीछे कई थ्योरी हैं. एक तो यह हो सकता है कि गंदगी वहीं न छोड़ें जहां वे खाना तलाशते हैं. इससे इंफेक्शन का खतरा घटेगा. दूसरा कारण शिकारी हो सकते हैं. ताजा मल समुद्र में शिकारी सील या शार्क को आकर्षित कर सकता है. तीसरा, खारे पानी के संपर्क में संवेदनशील अंगों का आना पक्षियों के लिए तकलीफदेह हो सकता है.
अब आगे क्या?
यह स्टडी 18 अगस्त को करंट बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुई है. उएसाका और उनकी टीम अब और प्रजातियों पर शोध करना चाहते हैं. खासकर अल्बाट्रॉस जैसे बड़े पक्षियों पर, ताकि पता चल सके कि यह पैटर्न सिर्फ शियरवाटर तक सीमित है या बाकी सीबर्ड्स में भी है.