अगर आप कोई एआई कंपनी चला रहे हैं और पूंजी जुटाना चाहते हैं, तो निवेशकों को यह भरोसा दिलाना आपके हित में होगा कि जो सबसे पहले ‘आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस’ (एजीआई) विकसित करेगा, दुनिया पर उसका हमेशा के लिए एकाधिकार हो जाएगा। इसी तरह, यदि आप उस देश के शासक हैं, जिसकी अर्थव्यवस्था या शेयर बाजार ऐसी ही कंपनियों पर निर्भर है, तो एआई तकनीक को एक ‘दौड़’ घोषित कर देना आपको फायदा पहुंचा सकता है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि एआई वास्तव में एक दौड़ है।
जब बताया जाता है कि पिछली सदी की परमाणु व अंतरिक्ष दौड़ ने न तो नए खिलाड़ी को आने से रोका और न ही किसी देश को निर्णायक बढ़त दिलाई, तो एआई होड़ के समर्थक कहते हैं कि इस बार मामला अलग है, क्योंकि एआई खुद से बेहतर एआई बना सकता है। और, खुद को सुधारने की यह क्षमता ही इस तकनीक को दूसरों से अलग बनाती है। यह तर्क दमदार तो है, पर इसे साबित करने के लिए कुछ शर्तों को पूरा करना होगा- एआई की क्षमता में होने वाली वृद्धि बड़े पैमाने पर होनी चाहिए; यह वृद्धि इतनी तीव्र हो कि दूसरों तक इसके पहुंचने की गति इसके बढ़ने की गति से कम रहे; और फिर आगे चलकर इसकी विकास-गति धीमी न पड़े। अभी तो प्रभावशाली उपलब्धियों को ही इस दावे का ठोस प्रमाण माना जा रहा है कि हमारे पास ऐसी एआई तकनीक हो सकती है, जो बाकी सभी एआई को खत्म कर देगी।
दरअसल, किसी भी दौड़ के लिए तीन शर्तें जरूरी हैं- पहली, लक्ष्य स्पष्ट हो; दूसरी, सबसे पहले पहुंचने पर बड़ा लाभ मिले; और तीसरी, यह लाभ दूसरा न हासिल कर सके। एआई के मामले में ये तीनों शर्तें पूरी नहीं होतीं। कुछ लोग एजीआई को अंतिम लक्ष्य मानते हैं, पर इसकी स्पष्ट परिभाषा अब तक नहीं बनी है। यह भी साफ नहीं है कि सबसे पहले विकसित करने वाली कंपनी को ही इसका पूरा लाभ मिलेगा। इसलिए संभव है कि एजीआई तक पहुंचने के बाद हमें यह एहसास हो कि यह अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि लगातार आगे खिसकता क्षितिज है।
एआई को दौड़ कहना गलत क्यों है? अगर इसमें केवल निजी निवेशकों का पैसा लगा होता, तो बात अलग थी, लेकिन दुनिया भर की सरकारें इस होड़ में शामिल होने के लिए जनता का पैसा, जमीन, पानी, ऊर्जा जैसे संसाधन खर्च कर रही हैं। जबकि, इन संसाधनों का इस्तेमाल आर्थिक विकास, राष्ट्रीय ताकत और प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए कहीं अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। एआई को दौड़ बताने से इसे सुरक्षा और भू-राजनीति से जोड़कर देखा जाने लगा है, नतीजतन ऐसी नीतियां बनने लगी हैं, जिनसे तकनीकी क्षेत्र पर भी बंदिशें, निर्यात-नियंत्रण या प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। अमेरिका में तो विमान, दवाएं, यहां तक कि पैकेटबंद खाद्य पदार्थ भी सुरक्षा प्रमाणन के बिना बाजार में नहीं उतारे जा रहे। मगर यह देखना दिलचस्प है कि एआई प्रयोगशालाएं सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण अपने अगले मॉडल की रिलीज को टाल देती हैं। उनको इस तरह की छूट ‘दौड़’ की मौजूदा अवधारणा के कारण ही मिलती है।
भारत को इस होड़ से बचना चाहिए। देश में सरकारी खर्च से एआई का विकास हो सकता है, लेकिन इसलिए नहीं कि हमें अमेरिका और चीन से मुकाबला करना है। भारत का नीतिगत जोर एआई को तेजी से अपनाने और उसे अधिक से अधिक जरूरतमंदों तक पहुंचाने पर होना चाहिए। इससे हमें वैश्विक बढ़त मिल सकती है, क्योंकि किसी भी नई तकनीक का असली लाभ तभी मिलता है, जब उसका व्यावहारिक इस्तेमाल होने लगे। बिजली को व्यापक रूप से अपनाने में दशकों लगे थे, लेकिन एआई के मामले में यह प्रक्रिया तेज हो सकती है, बशर्ते सही सरकारी नीतियां बने। भारत को ऐसा बुनियादी ढांचा बनाना होगा कि एआई का मौजूदा बुलबुला फूटने के बाद भी वह उपयोगी बना रहे।
अर्थशास्त्री विलियम नार्डहॉस के मुताबिक, रेल, विमानन और इंटरनेट जैसी पिछली तकनीकी खोजों से पैदा हुए कुल मूल्य का महज दो प्रतिशत हिस्सा ही इनको बनाने वाली कंपनियों को मिला, बाकी लाभ उपभोक्ताओं और इन तकनीकों का इस्तेमाल करने वाले कारोबारों ने उठाया। यह तथ्य हमें नहीं भूलना चाहिए।
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