‘हाथ में पड़े ये निशान बताते हैं मेरी सच्चाई…’, बिट्टू तबाही, रील की दुनिया और अजनार नदी की ये कहानी है सबसे अलग – livehindustan.com

बिटटू ने तो नदी के लिए ज्यादा काम नहीं किया फिर भी फेमस हो गया। हम लोगों ने भी काम किया था और नदी तो बाढ़ के पानी की वजह से ज्यादा साफ हुई….? इस सवाल के जवाब में बिट्टू ने अपने हाथ दिखाए। हाथ पर जगह-जगह कुछ निशान दिख रहे थे। उन निशान को दिखाते हुए 20 साल के उस लड़के ने कहा, “मैं झूठ बोल सकता हूं पर मेरे हाथ पर दिख रहे निशान नहीं। गंदे पानी में ज्यादा देर रहने की वजह से मेरे हाथ में इन्फेक्शन हो गया था। और कभी-कभी तो मेरे पैरे के पास से सांप निकल जाता था।”

इस कहानी में एक नदी है जो कचरे से भरी है, लोग वहां से गुजरते हैं और उसमें कचरा भी फैलाते हैं। लेकिन किसी को नदी में ना कचरा फैलाना अजीब लगता है और ना ही उसे गंदगी से भरा देखकर किसी का मन घबराता है। नदी में पानी की जगह चारों तरह बस प्लास्टिक ही प्लास्टिक दिखती है। तभी इस कहानी में एंट्री होती है एक 20 साल के हीरो की। पहले तो लोग इस बात पर यकीन नहीं करते पर धीरे-धीरे ही सही नदी साफ होती है। उसके बाद पूरी दुनिया में उस 20 साल के लड़के बिट्टू तबाही बात भी होने लगती है। वहीं इस कहानी की सच्चाई जानने के लिए मैं, दिल्ली से करीब 700 किलोमीटर दूर मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे ब्यावरा पहुंचे और बिट्टू तबाही से मुलाकात की। इसके बाद मुझे जो कहानी पता चली उसे आपको जरूर जनना चाहिए।

‘काफिले की चाहत उन्हें होती है जिन्हें डर होता है। हम तो अकेले ही पूरा लश्कर हैं …. इस लाइन के सहारे ही मैं दिल्ली से मध्यप्रदेश पहुंचा। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 112 किलोमीटर दूर है ब्यावरा। इस छोटे से शहर मे एक नदी बहती है, जिसका नाम अजनार है। मध्यप्रदेश का एक छोटा सा कस्बा ब्यावरा, शायद ही कभी सुर्खियों में रहा हो पर अभी इस शहर की चर्चा भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर में है। इस शहर को अचानक लोगों के सामने देश के नक्शे पर उभारने की जिम्मेदारी दो पर जाती है पहली यहां बहने वाली नदी अजनार की तो दूसरी यहां रहने वाले बिट्टू यानी सुरेंद्र सिंह चौधरी की है।

बिट्टू के शहर ब्यावरा पहुंचते ही मैं सबसे पहले उस नदी के पास पहुंचा जिसकी वजह से इस शहर को पूरी दुनिया में लोग जान गए हैं। नदी के बगल में एक मंदिर था, जहां से वो काफी साफ दिख रही थी। पहली नजर से देखने पर इस बात का अंदाजा बिल्कुल भी नहीं होता कि कुछ महीनों पहले नदी में पानी की जगह बस कचरा था।

नदी के पास ही मेरी मुलाकात सबसे पहले ब्यावरा के रहने वाले एडवोकेट तरुण सिंह से होती है। तरुण भी ब्यावरा को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए एक मुहिम चलाते हैं। अजनार नदी और बिट्टू का नाम लेते ही उन्होंने कहा, आज भले ही लोग बिट्टू को लेकर कुछ भी कह लें पर वो ही सबसे पहले इस गंदे पानी में उतरा और एक शुरुआत की। बाद में लोगों और प्रसाशन की भी मदद उससे मिली पर जिम्मा सबसे पहले उसने ही उठाया।

मंदिर के पास ही मुझे श्रीनाथ दांगी मिले। श्रीकांत भी ब्वायरा के रहने वाले हैं और भजपा मंडल अध्यक्ष हैं। नदी की सफाई को लेकर पूछे गए सवाल में उन्होंने कहा कि, ‘सबसे बड़ी समस्या लोगों के साथ है, वो नदी या किसी भी खुली जगह अपना कूड़ादान ही समझते हैं। शासन और प्रशासन हर एक शख्स के पीछे नहीं लग सकता है। ये बात ब्यावरा की ही नहीं बल्कि देश के हर उस शहर की है, जहां से नदियां गुजरती हैं। नदियों को उनके असली रूप में देखना है तो सबसे पहले लोगों को अपनी आदतें सुधारनी होगी।’

नदी के पास ही एक छोटी से पुलिया थी। ये वही पुलिया थी जो बिट्टू के वीडियो में अक्सर दिखती है। इस पुलिया पर पहुंचने के बाद मैंने वहां से गुजर रहे दो छात्रों से बात की। बिट्टू का नाम लेते ही एक छात्र मनोज नागर के चहेरे पर मुस्कान छा जाती है। कैमरा ऑन होते ही वो पहले इंग्लिश में अपना परिचय देता है। उसके बाद बिट्टू और अजनार नदी के बारे में बताता है कि, ‘पहले इन पुलिया से गुजरने पर लोग अपना हाथ नाक पर रख लेते थे क्योंकि गंदगी के वजह से यहां इतनी बदबू आती थी। बिट्टू तो काफी साधारण परिवार से हैं और उन्होंने काफी मेहनत की। आज ये जो कुछ भी दिख रहा है वो बिट्टू भइया के बदौलत ही है।’

वहीं पर मौजूद दूसरे छात्र के चहरे के भाव बदलता देख, मैंने उससे भी सवाल किया। थोड़ी तेज आवाज में पहले उसने अपना नाम राघव कोरे बताया और फिर कहा कि, मैं तो बिट्टू को बचपन से जानता हूं और इस नदी को को भी तभी से देखा है। बिट्टू का जितना नाम हुआ है उसने इतना भी काम नहीं किया है। नदी तो आधी साफ बाढ़ के पानी से हुई है। इतने कहने के बाद वो आगे चला गया।

ब्यावरा के लोगों से मुलाकात करने के बाद अब बारी थी बिट्टू यानी सुरेंद्र सिंह चौधरी से बात करने की। अपनी काम की वजह से वायरल होने के बाद बिट्टू को काफी लोगों के फोन कॉल्स आने लगे हैं। काफी लोग बिट्टू को मिलने के लिए भी बुला रहे हैं। अभी हाल ही में उन्होंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव से भी मुलाकात की। बिट्टू जब तक मैं मिलने ब्यावरा पहुंचा तब तक वो दिल्ली आ चुके थे। उसी रात ब्यावरा से दिल्ली वापस लौटने के बाद मैंने सबसे पहले नोएडा में बिट्टू से मुलाकात की।

इस बातचीत के दौरान जब मैंने बिट्टू से ये सवाल किया कि, ब्यावरा के कुछ लोग अपके काम पर सवाल उठा रहे हैं और कह रहे हैं कि, नदी को बाढ़ के पानी ने साफ किया। इस सवाल के जवाब में बिट्टू ने अपने हाथ दिखाए। हाथ पर जगह-जगह कुछ निशान दिख रहे थे। उन निशान को दिखाते हुए 20 साल के उस लड़के ने बताया कि, मैं झूठ बोल सकता हूं पर मेरे हाथ पर दिख रहे निशान नहीं। गंदे पानी में ज्यादा देर रहने की वजह से मेरे हाथ में इन्फेक्शन हो गया था। कभी-कभी तो मेरे पैरों के पास से सांप तक निकल जाता था। यहां तक कि मैंने अपने घरवालों को भी पहले इस काम के बारे में नहीं बताया था।

इस नदी को साफ करने में कितना समय और पैसा लगा होगा? इस सवाल के जवाब पर बिट्टू कहते हैं कि, “26 जनवरी 2026 से मैंने नदी को साफ करने का काम शुरू किया था और अब जाके ये पूरा हुआ है। इसे साफ करने में करीब आठ महीनों को समय लगा। वहीं पैसों की बात करें तो ग्लव्स , डस्टबीन , जूते ये सब खरीदने में 30 से 35 हजार लगे। ये सब मैंने जेब से खर्च हुए।” प्रशासन का कितना सहयोग के सवाल पर बिट्टू ने बताया कि, उन्होंने भी काफी मदद की हमारी। कुछ जीचें ऐसी थी जो हम हाथ से नहीं हटा सकते थे उसको उन्होंने जेसीबी से साफ कराया और हमे पूरा सहयोग दिया।

सफाई के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद बिट्टू के काम को पहचान मिली. ‘द ओशन क्लीनअप’ के फाउंडर और CEO बोयन स्लेट की नजर X पर पड़ी। वहां उन्होंने बिट्टू के काम से जुड़ी एक पोस्ट देखी। बिट्टू की काम से प्रभावित होकर स्लेट ने न्योता देते हुए कहा, “हमारे साथ काम करो”। इस पूरे बात पर बिट्टू ने बताया कि, मेरी सोशल मीडिया पर मैसेज के जरिए उनसे बात हुई। इस बातची में मैने कहा कि, उनसे मैं सीखना चाहती हूं और मौका मिलेगा तो उनके साथ काम भी करूंगा।

बिट्टू से बातचीत के बीच ही वहां एक डिलिवरी बॉय पहुंचता है और बिट्टू के साथ फोटो लेने की बात करता है। बिट्टू के साथ फोटो लेने का बाद वो उनका और उनके काम की काफी तारीफ करता है। इसी दौरान मेरे सामने अजनार नदी के उस पुलिया की एक तस्वीर याद आ जाती है। पुलिया के नीचे से नदी बह रही थी और उसके उपर लगे पाइप पर कुछ प्लास्टिक फंसे हुए थे, जिन्हें हाल ही फिलहाल में किसी ने डाला था। वहीं पुलिया के गुजरती है एक माल ढोने वाली गाड़ी में दो लोग चाय पीते नजर आए। चाय पीने के बाद उन्होंने वो कप नदी में फेंक कर गाड़ी आगे बढ़ा ली।

रजत कुमार बीते आठ सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। मैंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की और भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया है।

अपने आठ साल के पत्रकारिता करियर में मैंने प्रभात खबर, इंडिया टुडे और मनीकंट्रोल जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ काम किया है। फिलहाल मैं लाइव हिंदुस्तान के साथ अपने पत्रकारिता के सफर को आगे बढ़ा रहा हूं। अपने करियर में मुझे दो लोकसभा चुनाव और पांच से अधिक विधानसभा चुनाव कवर करने का अनुभव मिला है। चुनावी रिपोर्टिंग के साथ-साथ जनसरोकार से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाना और उनके पीछे की वास्तविक तस्वीर को सामने लाना मेरी पत्रकारिता का अहम हिस्सा रहा है।

ग्राउंड पर जाकर आम लोगों की कहानियों, उनकी समस्याओं और संघर्षों को करीब से समझना और उनकी आवाज को सामने लाना मेरे लिए सबसे पसंदीदा काम है। राजनीति, क्रिकेट, सिनेमा और इतिहास की अनोखी कहानियों को ढूंढकर सबके सामने लाना काफी पसंद है। इन सभी विषयों पर लिखना- पढ़ना जारी है।
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