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अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में भारतीय राजनीति के तीन दिग्गज जब एक मंच पर आए, तो तीखी बहस होना तो तय था. मौका था स्टैनफोर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस का, जहां कांग्रेस सांसद शशि थरूर, बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या और बीजेपी नेता के अन्नामलाई के बीच जबरदस्त नोकझोंक देखने को मिली. इस दौरान शशि थरूर ने कहा कि अगर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश हुई, तो दक्षिण भारत के लोग, खासकर तमिलनाडु में इसका कड़ा विरोध होगा. थरूर का यह बयान और उत्तर-दक्षिण भारत के बीच की राजनीतिक खींचतान इस पूरी चर्चा का केंद्र बन गई.
न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, शशि थरूर ने उत्तर भारत के राज्यों की बढ़ती आबादी का मुद्दा उठाते हुए एक गंभीर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि उत्तर भारत में जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ी है, जिससे वहां का हर सांसद दक्षिण भारत के सांसद के मुकाबले कहीं ज्यादा आबादी का प्रतिनिधित्व कर रहा है. थरूर को डर है कि जब नई जनगणना के आधार पर सीटों का दोबारा बंटवारा (परिसीमन) होगा, तो उत्तर भारत की सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी. उनके मुताबिक, तब नॉर्थ के राज्यों के पास संसद में दो-तिहाई बहुमत होगा और वे अपनी मर्जी दक्षिण भारत पर थोप पाएंगे. थरूर ने चेतावनी देते हुए कहा कि हर साल कोई न कोई हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव लाएगा और तमिल लोग तुरंत इसके खिलाफ मोर्चा खोल देंगे.
इतना ही नहीं, थरूर ने उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के प्रशासन पर भी सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि क्या 28 करोड़ की आबादी वाले यूपी को एक ही राज्य रखना सही है? उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के उस पुराने प्रस्ताव का जिक्र किया, जिसमें यूपी को चार हिस्सों में बांटने की मांग की गई थी. थरूर का मानना है कि राज्यों के पुनर्गठन आयोग को अब इस पर दोबारा और गंभीरता से सोचना चाहिए.
अन्नामलाई और सूर्या का करारा पलटवार
शशि थरूर की इन बातों पर बीजेपी नेता अन्नामलाई ने उन्हें आंकड़ों के साथ घेरा. अन्नामलाई ने नए परिसीमन मॉडल का बचाव करते हुए कहा कि जनगणना के हिसाब से उत्तर भारतीय राज्यों को ज्यादा सीटें मिलना स्वाभाविक है. उन्होंने कांग्रेस पर सवाल उठाया कि वे इस बदलाव का विरोध क्यों कर रहे हैं? अन्नामलाई ने बताया कि अगर 2011 की जनगणना के हिसाब से चलें तो तमिलनाडु को 50 सीटें मिलेंगी, लेकिन नए मॉडल में उसे 59 सीटें मिल रही हैं. उन्होंने कहा कि यह सभी राज्यों के लिए एक साथ आकर सहमति बनाने का मौका है.
वहीं, तेजस्वी सूर्या ने वैचारिक बदलाव पर बात की. उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद की जन्मस्थली बंगाल में उनके सिद्धांतों को फिर से स्थापित करने में पिछले 12 सालों की कड़ी मेहनत लगी है. सूर्या के मुताबिक, बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद अब वहां उन मूलभूत सिद्धांतों का पुनरुत्थान देखने को मिल रहा है.
बहस के दौरान थरूर ने SIR के जरिए वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने का मुद्दा भी छेड़ा. उन्होंने दावा किया कि बंगाल में 91 लाख नाम हटा दिए गए, जिनमें से 34 लाख लोगों ने खुद को असली मतदाता बताते हुए अपील की. थरूर ने सवाल उठाया कि जब जीत का अंतर 30 लाख वोटों का हो और लाखों लोग वोट न दे पाएं, तो क्या इसे पूरी तरह लोकतांत्रिक माना जाएगा? हालांकि, उन्होंने मजाकिया लहजे में यह भी जोड़ा कि केरल में शायद इसका फायदा कांग्रेस को मिला, क्योंकि वहां वामपंथी दल (CPIM) एक ही व्यक्ति के कई बार नाम दर्ज कराने के खेल में माहिर थे.
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