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By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 30, 2026 07:08 IST2026-05-30T07:08:23+5:302026-05-30T07:08:51+5:30
प्रो. राम मोहन पाठक
विख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने महात्मा गांधी के बारे में कहा था- ‘भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस का बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर चला (आया) था…..वे विजयी योद्धा थे जो हिंसा का प्रयोग किए बिना अपने उद्देश्य में कामयाब हुए.’
आइंस्टीन की इसी अवधारणा और विचार के प्रतीक अनेक व्यावहारिक उदाहरण हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में बिखरे पड़े हैं. नई पीढ़ी को शायद ही विश्वास हो सके कि त्यागी, तपस्वी और बलिदानी संपादकों के अवदान की नींव पर हिंदी पत्रकारिता विकसित हुई है. आज हिंदी के प्रथम समाचार पत्र – ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ – (प्रकाशित 30 मई 1826) – की द्विशताब्दी के अवसर पर पिछले 200 सालों के हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का अध्ययन, विवेचन करने पर स्पष्ट है कि हिंदी पत्रकारिता के तेजस्वी, समर्पित, साधक संपादकों और पत्रकारों की पूरी विस्तृत परंपरा रही है.
ऐसे संपादक-पत्रकार जो हाड़-मांस के बने, किंतु अकल्पनीय साहस और सर्वस्व समर्पण के प्रतीक पुरुष थे. एक जेब में पिस्तौल और दूसरी में अपने हस्तलिखित क्रांतिकारी पत्र ‘रणभेरी’ की प्रतियां लिए दमनकारी अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत करने और मृत्यु का वरण करने को तैयार ‘आज’, ‘संसार’, हिंदी बंगवासी जैसे पत्रों के संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर, दंगों में शांति के लिए अपनी जान गंवाने वाले ‘प्रताप’ पत्र के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी, कलकत्ता में सेठ-साहूकारों की गद्दी-गद्दी (आफिस) जा-जा कर दो पैसे में अपने समाचार पत्र को बांच (पढ़) कर सुनाने वाले संपादक बाल मुकुंद गुप्त जैसे अनेक संपादकों के त्याग और बलिदान पर नई पीढ़ी का चकित होना स्वाभाविक है.
कभी पत्रकारिता को ‘वृत्ति’ नहीं ‘व्रत’ मानकर इस ‘मिशनरी’ पत्रकारिता का जिन्होंने वरण किया था, ऐसे हिंदी पत्रकारिता के इन साधकों के ‘अविश्वसनीय किंतु सच’ – योगदान पर पत्रकारिता में आने वाली पीढ़ी क्या आसानी से विश्वास कर पाएगी?
तब तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी. पत्र निकालना व्यापार या उद्योग नहीं था. संपादक, मालिक, पत्रकार सभी भूमिकाएं एक साथ निभाने का बड़ा जोखिम लेकर समाचार पत्र निकाले गए और ऐसी जो परंपरा बनी वह कथा आदर्श के रूप में आज भी इतिहास के पन्नों में विद्यमान है. ‘उदंत मार्त्तण्ड’ भी ऐसा ही जोखिम भरा रचनात्मक प्रयास था, जो हिंदी पत्रकारिता की नींव का पत्थर है.
ऐसे ही एक, धुन के पक्के कानपुर (उत्तर प्रदेश) – सदर दीवानी अदालत में पेशे से वकील युगल किशोर सुकुल (शुक्ल) दृढ़ इच्छाशक्ति और अदम्य साहस के साथ एक समाचार पत्र के प्रकाशन का संकल्प लेकर प्रायः 700 मील (1000 किमी) दूर उस समय के प्रेस यानी छापाखाना (मुद्रण) के केंद्र कलकत्ता (अब कोलकाता) के लिए निकल पड़े. अपने पास की उपलब्ध पूंजी और उधार की छोटी धनराशि के साथ कलकत्ता, जो तब अंग्रेजों की राजधानी थी, पहुंचकर लार्ड गवर्नर जनरल के यहां हिंदी में साप्ताहिक समाचार पत्र ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ के प्रकाशन के लिए अर्जी लगा दी. 19 फरवरी, 1826 को अनुमति मिलते ही 30 मई 1826 को प्रथम अंक प्रकाशित कर इस तिथि को भारतीय हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में अमिट और अमर कर दिया. यह पत्र हिंदी पत्रकारिता की यात्रा की मशाल बना. कलकत्ता के घने आबाद आमड़ातल्ला गल्लि (गली), कोल्हूटोला से प्रारंभ में प्रकाशित पत्र हिंदी पाठकों तक पहुंचने लगा और लोकप्रिय हुआ. साप्ताहिक पत्र का वार्षिक मूल्य दो रुपए रखा गया. फिर भी ज्यादा पाठक नहीं मिले.
प्रत्येक मंगलवार को प्रकाशित ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ में देश-विदेश के समाचार, घटना, दुर्घटना, आयोजन, सरकारी विज्ञप्ति, विज्ञापन, पानी के जहाज की समय सारणी, साहित्य, कलकत्ता के व्यापारिक समाचार, सामयिक मुद्दे, बाजार भाव, अधिकारियों-कर्मचारियों के स्थानांतरण, पोस्टिंग तथा धार्मिक-नैतिक समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किए जाते थे.
वस्तुतः ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ की द्विशताब्दी (200 वर्ष) के अवसर पर एक अभाव खटकना स्वाभाविक है. हिंदी पत्रकारिता के बीज – उदन्त मार्त्तण्ड की अंतर्वस्तु या प्रकाशित सामग्री का विस्तृत शोध अध्ययन नहीं हो सका है. हिंदी संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, प्रांतीय एवं केंद्रीय सरकार को हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी के इस अवसर पर इस पत्र पर व्यापक शोध अर्थात् वृहद शोध परियोजना के माध्यम से इस पत्र का ऐतिहासिक योगदान पत्रकारिता जगत और समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करना द्विशताब्दी की सार्थकता सिद्ध करेगा.
इस अल्पजीवी पत्र का अंतिम अंक प्रायः डेढ़ साल बाद 4 दिसंबर 1827 को प्रकाशित हुआ. नाम मात्र के विज्ञापन और डाक व्यय की सरकारी सुविधा के अभाव में पत्र ने दम तोड़ दिया. 18 महीने की अवधि में निकले कुल 79 अंक आज भी हिंदी पत्रकारिता की थाती हैं, जिसके कुछ अंक नेशनल लाइब्रेरी, कोलकाता में संरक्षित हैं.
सुकुल (शुक्ल) जी के अनुसार ‘नाना देश के ‘सत्य’ समाचार हिन्दुस्तानी लोग देखकर पढ़ें और समझ लें…. इसीलिए इसके कल्याण के विषय में गवर्नर जनरल की आज्ञा से ऐसे साहस में चित्त लगाया कि एक प्रकार से नया ठाठ ठाठा.’ उदन्त मार्त्तण्ड का प्रारंभ इस ध्येय वाक्य (मुखपृष्ठ- मास्टहेड पर प्रकाशित) से था – ‘हिन्दुस्तानियों के हित हेत….’ अर्थात् भारतीय समाज के हित या कल्याण के लिए. इस पत्र की आत्मा ‘सत्य’ थी. ‘सत्य और तथ्य’ की हिंदी पत्रकारिता में स्थापना करने और पत्रकारिता के सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक अभीष्ट या सिद्धांत को पत्रकारिता में स्थापित करने का ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का प्रयोग-प्रयास आज भी पत्रकारिता या मीडिया की आत्मा है.
आज 200 वर्ष बाद भी ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का स्मरण प्रेरणादायी है. ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का स्मरण हमें प्रेरित करता है कि तकनीक पुरानी या निष्प्रयोज्य हो सकती है किंतु ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ जैसे पत्रों द्वारा स्थापित निष्पक्षता, सरोकार, लोकहित, भाषा की शुद्धता जैसे पत्रकारिता के शाश्वत, सनातन मूल्य आज भी उपयोगी और प्रासंगिक हैं.
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