हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए अहम क्यों है नेपाल – BBC

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नेपाल में कई प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक स्थल हैं. कैलाश मानसरोवर के तीर्थयात्री भी नेपाल से होकर गुज़रते हैं.
नेपाल प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर देश है, जहाँ नदियाँ, झीलें, घाटियाँ और विशाल पर्वत शिखर हैं.
हालाँकि, ये देश कभी-कभार होने वाली बारिश, बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित रहता है.
26 अगस्त की सुबह नेपाल के रसुवा ज़िले में भोटेकोशी नदी के किनारे अचानक बाढ़ आई, जिससे भारी तबाही हुई.
इस आपदा में कई भारतीय लापता हैं. भारतीय विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को एक बयान में कहा कि नेपाल में मौजूद 320 भारतीय नागरिकों से अभी संपर्क नहीं हो पाया है.
मंत्रालय ने बताया कि त्रिशूली-1 पावर प्रोजेक्ट में काम करने वाले 63 भारतीयों को सुरक्षित बचा लिया गया है.
इससे पहले विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया था कि कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान नेपाल की बाढ़ में फंसे 21 भारतीयों को सुरक्षित बचा लिया गया है.
ऐसे में सवाल है कि भारत के लोग नेपाल की यात्रा क्यों करते हैं? आध्यात्मिक विचार वाले लोग, ख़ासकर हिंदू नेपाल क्यों जाना चाहते हैं? वे वहाँ कैसे पहुँचते हैं? इसके लिए क्या कुछ करना पड़ता है?
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कैलाश मानसरोवर तिब्बत में स्थित है और यह हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है.
मानसरोवर पहुंचने के तीन रास्ते हैं, जिनमें से दो भारत से होकर और एक नेपाल से होकर जाता है.
भारत में कैलाश मानसरोवर यात्रा दो अलग-अलग मार्गों से की जा सकती है, जिनमें लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) और नाथू ला दर्रा (सिक्किम) शामिल हैं. इसी तरह, पश्चिमी नेपाल में हुमला के रास्ते भी कैलाश मानसरोवर की यात्रा की जाती है.
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नेपाल में हुमला के रास्ते मानसरोवर जाने का सबसे अच्छा समय अप्रैल से अक्तूबर के बीच माना जाता है. हालांकि, लोग अक्तूबर के अंत तक मानसरोवर घूमने आते हैं.
मानसरोवर जाने वाले अधिकांश तीर्थयात्री भारतीय होते हैं. वे सबसे पहले काठमांडू से नेपालगंज जाते हैं. वहां वे एक रात रुकते हैं. नेपालगंज से सिमिकोट तक 45 मिनट की ड्राइव में पहुंचा जा सकता है.
सिमिकोट से हिल्सा तक के लिए एक छोटे विमान से यात्रा की जा सकती है और वहां से तिब्बत के तकलाकोट तक मोटर व्हीकल से सफ़र कर सकते हैं, जहां से मानसरोवर की यात्रा शुरू होती है.
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भारतीय विदेश मंत्रालय हर साल जून से सितंबर तक कैलाश मानसरोवर यात्रा का आयोजन दो अलग-अलग मार्गों से करता है, लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) और नाथू ला दर्रा (सिक्किम).
एक ट्रैवल वेबसाइट के अनुसार, लिपुलेख दर्रे (उत्तराखंड) से यात्रा की अनुमानित लागत एक लाख 70 हज़ार रुपये है. इस मार्ग में लगभग 200 किलोमीटर की पहाड़ी यात्रा शामिल है. तीर्थयात्रियों को इस मार्ग पर पांच समूहों में भेजा जाता है और पूरी यात्रा में 22 दिन लग सकते हैं.
नाथू ला दर्रे से होकर यात्रा करने की अनुमानित लागत बढ़कर 2 लाख 83 हज़ार रुपये हो जाती है. इस मार्ग में लगभग 36 किलोमीटर की पहाड़ी सड़क पर यात्रा करनी होती है. तीर्थयात्री इस मार्ग से 10 समूहों में यात्रा कर सकते हैं. यात्रा पूरी करने में 21 दिन लग सकते हैं.
समुद्र तल से 6,638 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील का बौद्ध धर्म और जैन धर्म में विशेष महत्व है.
भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से 2025 में दी गई जानकारी के अनुसार, यात्रा शुरू होने से पहले यात्रियों की चिकित्सा जांच की जाती है. विदेश मंत्रालय के अनुसार, सभी यात्रियों के लिए एक साथ यात्रा करना और एक साथ लौटना अनिवार्य है. सभी यात्रियों को अपनी यात्रा दिल्ली से शुरू करनी होती है.
यात्रा शुरू करने से पहले, एक वैध पासपोर्ट, पासपोर्ट आकार की छह रंगीन तस्वीरें और 100 रुपये मूल्य का नोटरी किया हुआ इंडेम्निटी बॉन्ड मंत्रालय के अधिकारियों के पास जमा कराना होता है.
इनके साथ-साथ, इमरजेंसी में हेलीकॉप्टर से निकासी के लिए एक शपथ पत्र और चीन में मौत होने पर शव के अंतिम संस्कार के लिए सहमति पत्र भी देना ज़रूरी है. अगर इन दस्तावेज़ों में कोई कमी पाई जाती है, तो यात्रा की अनुमति नहीं मिलती है.
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भारतीय विदेश मंत्रालय ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए कुछ नियम बनाए हैं. पहली शर्त यह है कि तीर्थयात्री का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है.
तीर्थयात्री के पास कम से कम छह महीने की वैधता वाला भारतीय पासपोर्ट होना चाहिए. वर्तमान वर्ष की 1 जनवरी के मुताबिक़ यात्री की उम्र 18 से 70 साल के बीच होनी चाहिए.
तीर्थयात्रा के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ तीर्थयात्री का बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) है. यानी, केवल उन्हीं लोगों को यात्रा करने की अनुमति दी जाती है जिनका बीएमआई 25 या उससे कम होता है.
इस यात्रा पर जाने वाले व्यक्ति का फ़िज़िकली और मेडिकली स्वस्थ होना अनिवार्य है. विदेशी नागरिक इस यात्रा के लिए आवेदन नहीं कर सकते. इसी तरह प्रवासी भारतीय नागरिक (ओसीआई) कार्डधारक भी इस यात्रा के लिए आवेदन करने के पात्र नहीं हैं.
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तिरुवन्नामलाई के बोलूर निवासी गोकुलकृष्णन महाराज का कहना है कि नेपाल के आध्यात्मिक पर्यटन स्थल होने का कारण यह है कि इसे शिव का निवास स्थान माना जाता है, जिन्हें हिंदुओं का प्रथम देवता माना जाता है.
बीबीसी तमिल से बात करते हुए उन्होंने कहा, "नेपाल एक स्वर्ग जैसी भूमि है जिसमें प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिकता दोनों हैं. हिंदुओं का सपना होता है कि वे जीवन में कम से कम एक बार इस भूमि पर कदम रखें और कैलाश पर्वत के दर्शन करें. इसी के तहत मुझे दो साल पहले वहां जाने का मौक़ा मिला."
गोकुलकृष्णन ने बताया कि नेपाल की राजधानी काठमांडू में स्थित पशुपति नाथ मंदिर को काशी के समानांतर माना जाता है.
उन्होंने कहा, "जिस तरह काशी में यह मान्यता है कि दाह संस्कार करने पर आत्मा स्वर्ग जाती है, उसी तरह नेपाल में पशुपति नाथ मंदिर को लेकर यह मान्यता है. काशी में बहने वाली गंगा नदी की तरह ही बागमती नदी भी इस मंदिर के पास से बहती है."
वहां की पूजा पद्धति के बारे में बताते हुए वह कहते हैं, "यहां एक विशेष समुदाय की दो से पांच साल की उम्र की एक बच्ची को चुनकर उसे 'लिविंग गॉडेस' के रूप में पूजा जाता है, जो सिर्फ़ त्योहारों के दौरान प्रकट होती है और दुनियाभर से कई लोग उसे देखते हैं. दिव्य शक्तियों से संपन्न मानी जाने वाली यह देवी, जब तक बड़ी नहीं हो जाती, तब तक देवी के रूप में वहीं रहती है."
गोकुलकृष्णन के अनुसार, "जब लड़की यौवन अवस्था में पहुँच जाती है, तो दूसरी लड़की को देवी के रूप में चुना जाता है. यह अनुष्ठान आज भी नेपाल में प्रचलित है. इसे महिलाओं को देवी के रूप में पूजने का प्रतीक माना जाता है. इसके अलावा देवी भगवती का मंदिर मनकामना भी एक प्रसिद्ध पूजा स्थल है."
गोकुलकृष्णन ने यह भी बताया कि काठमांडू के पास नागरकोट, चंद्रगिरी हिल और सिसपानी जैसी कई जगहें हैं, लेकिन सबसे खूबसूरत सनराइज़ देखने के लिए नागरकोट सबसे अच्छी जगह है.
इसी तरह बुद्ध की पवित्र जन्मस्थली लुम्बिनी, विष्णु को समर्पित वैष्णव तीर्थस्थल मुक्तिनाथ मंदिर और जनकपुर सीता मंदिर, जहां देवी सीता का जन्म हुआ माना जाता है, नेपाल में हिंदुओं के लिए लोकप्रिय स्थल हैं.
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कैलाश पर्वत के बारे में गोकुलकृष्णन कहते हैं, "कैलाश एक ऐसा स्थान है जहाँ हर कोई, विशेषकर साधु और हिंदू, जाना चाहते हैं. ऐसा माना जाता है कि वहाँ जाकर पूजा-अर्चना करने से आध्यात्मिक परिवर्तन होता है. इतना ही नहीं, कैलाश की परिक्रमा और पूजा विश्व के सबसे लोकप्रिय तीर्थयात्राओं में से एक है. इस पर्वत को आंतरिक शांति और सामंजस्य के शक्तिशाली प्रतीक के रूप में पूजा जाता है."
हिंदू मान्यता के अनुसार, भगवान शिव अपने परिवार के साथ यहाँ निवास करते हैं. जैन धर्म में इस पर्वत को अष्टपद कहा जाता है. यहीं पर 24 तीर्थंकरों में से प्रथम ऋषभ को ज्ञान प्राप्त हुआ था.
तिब्बती बौद्ध धर्म और शमनवादी बोन धर्म के अनुयायी इस पर्वत को 'ताइसे' कहते हैं, जो देवी सिपामेन का निवास स्थान है. तिब्बती बौद्ध इस शिखर को डेमचोक और उनकी पत्नी तोर्जे बागमो का निवास स्थान मानते हैं.
गोकुलकृष्णन बताते हैं, "एशिया की चार महान नदियाँ और उनके उद्गम स्थल से जुड़े हिमनद मिलकर पर्वत की चोटी पर स्थित हिंदू प्रतीक स्वस्तिक का निर्माण करते हैं. उत्तर से बहने वाली सिंधु नदी, दक्षिण से बहने वाली कर्णबी (गंगा की एक सहायक नदी), पश्चिम से बहने वाली सतलुज नदी और पूर्व से बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी एशियाई महाद्वीप की जीवनरेखा हैं. वहीं, कैलाश पर्वत के पास स्थित मानसरोवर झील को पवित्र माना जाता है."
गोकुलकृष्णन कहते हैं, "हिंदू मान्यता के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि मानसरोवर झील की उत्पत्ति ब्रह्मा के मन में हुई थी. इसीलिए इसे मानसरोवर कहा जाता है. 'मानसरोवर' नाम दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना हुआ है. 'मानस' का अर्थ है 'मन' या 'ज्ञान' और 'सरोवर' का अर्थ है 'झील'."
उन्होंने बताया कि ऐसी मान्यता है कि कैलाश-मानसरोवर में देवता निवास करते हैं और ध्यान करते हैं.
उन्होंने आगे कहा कि न सिर्फ़ हिंदू बल्कि कई धर्मों के आध्यात्मिक रूप से झुकाव वाले लोग भी वहां दर्शन करने आते हैं.
तिरुवन्नामलाई के गोकुलकृष्णन महाराज ने नेपाल घूमने के लिए अक्तूबर और नवंबर के महीनों को सबसे अच्छा समय बताया.
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कुंभकोणम में सुपर यात्रा एजेंसी 50 से ज़्यादा सालों से चल रही है. इसके मालिक सैयद सादिक ने बीबीसी तमिल को बताया कि हिंदू, ख़ासकर तमिलनाडु से हर साल नेपाल की आध्यात्मिक भूमि की यात्रा करने के लिए उत्सुक रहते हैं.
सैयद सादिक बताते हैं, "हम अपनी एजेंसी के ज़रिए हर साल एक समूह आध्यात्मिक पर्यटन के लिए नेपाल भेजते हैं. कभी-कभी मैं भी उनके साथ जाता हूँ."
वह बताते हैं, "हमारी एजेंसी के ज़रिए यात्रा कर चुके लोगों की प्राथमिकताओं को हम तय करते हैं. हम उनके स्वास्थ्य की भी जांच करते हैं और उन्हें तभी ले जाते हैं जब वे शारीरिक रूप से स्वस्थ हों."
सैयद सादिक ने कहा कि यात्रा से पहले वे यात्रियों को यात्रा के दौरान क्या चीज़ें करनी चाहिए और क्या नहीं, इसकी वे ट्रेनिंग देते हैं.
नेपाल जाने के मार्ग के बारे में बताते हुए सैयद सादिक कहते हैं, "हम ज़्यादातर लोगों को यहाँ से काठमांडू तक विमान से ले जाएंगे. वहाँ से, हम उन्हें अलग-अलग मिनी बसों में 25 लोगों के समूह में मानसरोवर कैलाश क्षेत्र तक ले जाते हैं."
वह बताते हैं, "हम काठमांडू से चार दिन बस से यात्रा करने के बाद कैलाश क्षेत्र पहुंचते हैं. वहाँ जाते समय हम बहुत धैर्य से बस यात्रा करते हैं. हम सुनिश्चित करते हैं कि बस यात्रा लोगों के लिए सही हो. रास्ते में किसी भी स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में उनके लिए डॉक्टरों से इलाज की सुविधा भी उपलब्ध है. अगर कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या होती है, तो हम उन्हें वैकल्पिक वाहन से शेल्टर तक पहुंचा देते हैं."
सैयद सादिक कहते हैं, "चार दिन की यात्रा के बाद कैलाश पहुँचने पर वहाँ दर्शन करने के बाद कुछ लोग पर्वत की परिक्रमा करते हैं. इसमें दो दिन लगते हैं और कार्यक्रम समय-समय पर बदलता रहता है. साथ ही, क्योंकि यह एक ठंडा क्षेत्र है. हम उन्हें सही कपड़े पहनाकर अपने साथ ले जाते हैं और अगर ज़रूरी हुआ तो हम उनके लिए कपड़े खरीदते हैं."
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