आज का एक्सप्लेनर: इंडियन आर्मी चीफ के ऑफिस से पाकिस्तान के सरेंडर वाली तस्वीर हटी, अब वहां 'कर्म क्षेत्र' प… – Dainik Bhaskar

16 दिसंबर 1971 का किस्सा है। ढाका के रेसकोर्स में एक मेज और दो कुर्सियां लगाई गईं। पहली पर पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट ए.ए.के. नियाजी बैठे थे और दूसरी पर भारत के ईस्टर्न थिएटर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा।
नियाजी ने एक डॉक्यूमेंट पर दस्तखत किए। इसके बाद कमर पर लगी अपनी पिस्टल जगजीत सिंह को सौंप दी और 93 हजार पाक सैनिकों के साथ दुनिया का सबसे बड़ा सरेंडर किया।
सरेंडर की आइकॉनिक तस्वीर को इंडियन आर्मी चीफ के ऑफिस में लगाया गया। देश-दुनिया के तमाम अधिकारियों की विजिट में बैकग्राउंड में ये तस्वीर दिख जाती थी, लेकिन इस सरेंडर की 53वीं एनिवर्सरी पर खबर आ रही है कि आर्मी चीफ के ऑफिस से ये तस्वीर हटा दी गई है। अब वहां ‘कर्म क्षेत्र’ की एक पेंटिंग है। तस्वीर क्यों बदली गई, नई पेंटिंग के क्या मायने हैं; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: आर्मी चीफ के ऑफिस में तस्वीर बदलने की बात कैसे सामने आई?
जवाबः अमूमन जब भी आर्मी चीफ किसी सैन्य अधिकारी या विदेशी मेहमानों से मिला करते थे, तो 1971 की ऐतिहासिक पेंटिंग के सामने तस्वीर लेते थे, लेकिन 11 दिसंबर को जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर आर्मी के ऑफिशियल हैंडल ‘ADGPI’ से आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी के ऑफिस के लाउंज की कुछ तस्वीरें पोस्ट की गईं तो इन तस्वीरों के बैकग्राउंड से सरेंडर वाली तस्वीर नदारद थी। उसकी जगह एक नई पेंटिंग लगी थी।
तब खुलासा हुआ कि नई दिल्ली के रायसीना हिल्स के साउथ ब्लॉक में मौजूद आर्मी चीफ के ऑफिस से 1971 की तस्वीर को हटाकर नई पेंटिंग लगाई गई है।
सवाल-2: नई ‘कर्म क्षेत्र’ पेटिंग में क्या उकेरा गया है, इसे किसने बनाया?
जवाबः रिपोर्ट्स के मुताबिक ‘कर्म क्षेत्र’ पेंटिंग को 28वीं मद्रास रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल थॉमस जैकब ने बनाया है। इसमें दायीं ओर लद्दाख में भारत-चीन बॉर्डर की पैंगोंग झील दिखाई गई है, वहीं बायीं ओर गरुड़ और महाभारत के उस रथ को दिखाया गया है, जिस पर अर्जुन सवार हैं और उसके सारथी भगवान कृष्ण हैं।
पेंटिंग में बैकग्राउंड में बर्फ से ढंके पहाड़ और बीच में मौर्य काल के रणनीतिकार चाणक्य को उकेरा गया है। इसके अलावा सेना में इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों, ट्रक, टैंक, वाहन, नाव और हेलिकॉप्टर जैसी हाई-टेक चीजों को दिखाया गया। इस नई पेंटिंग का नाम ‘Field of Deeds – कर्म क्षेत्र’ रखा गया है।
इसको लेकर सेना और रक्षा मंत्रालय की ओर से कोई ऑफिशियल स्टेटमेंट जारी नहीं किया गया है।
सवाल-3: ‘कर्म क्षेत्र’ में दिखाई गई चीजों का क्या मतलब है?
जवाब: डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि ‘कर्म क्षेत्र’ पेंटिंग सेना के मिशन को भारतीय दार्शनिक परंपराओं के साथ जोड़ती है, जो न्याय और कर्तव्य के लिए उसके कमिटमेंट पर जोर देती है।
द हिंदू ने सेना के सूत्रों के हवाले से लिखा, ‘नई पेंटिंग ‘कर्म क्षेत्र’ में सेना को धर्म के संरक्षक के तौर पर चित्रित किया गया है, जो न केवल देश की रक्षा के लिए लड़ती है, बल्कि न्याय को बनाए रखने और देश की गरिमा की रक्षा के लिए लड़ती है। साथ ही सेना के तकनीकी तौर पर उन्नत और एकजुट होने के विकास को दिखाती है।’
सवाल-4: क्या नई पेंटिंग में पाकिस्तान से चीन पर फोकस शिफ्ट करने का संदेश छिपा है?
जवाबः डिफेंस एक्सपर्ट्स पेंटिंग्स की अदला-बदली के पीछे गहरा मैसेज छिपा होना मानते हैं। जैसे- 1971 की तस्वीर में पाकिस्तानी सेना के सरेंडर की झलक थी। दशकों तक ये तस्वीर आर्मी चीफ के ऑफिस में लगी रही। हर अहम मीटिंग के बैकग्राउंड में यह तस्वीर रही। इसके जरिए इंडियन आर्मी की मजबूती और दुश्मन को घुटने पर लाने की उसकी क्षमता को दिखाया गया था।
अब ‘कर्म क्षेत्र’ पेंटिंग के जरिए भारतीय सेना चीन को मैसेज दे रही है। दरअसल, चीन के प्राचीन मिलिट्री स्ट्रैटजिस्ट सुन त्जु की युद्ध कला को चीनी सेना ने अपनाया है। जबकि भारत के पास अपनी मिलिट्री फिलॉसफी है, जिसमें चाणक्य की स्ट्रैटजी और गीता की सीख है।
टाइम्स ऑफ इजराइल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी सेना ने कम कोशिश में ज्यादा फायदा, जंग से बचना और इनडायरेक्ट स्ट्रैटजी जैसी सुन त्जु की बातों को अपनाया है।
‘कर्म क्षेत्र’ पेंटिंग पिछली जीतों से आगे बढ़कर भविष्य की चुनौतियों की ओर देखने, भारत की संप्रभुता को सुरक्षित करने और वैश्विक स्तर पर अपनी ताकत को दिखाने का सिंबल है। ये भारत के मिलिट्री फोकस और प्रायोरिटी में एक बदलाव को दिखाता है, जो उभरते खतरों, खासकर चीन से निपटने के लिए मॉडर्न टेक्नीक, प्राचीन ज्ञान और एकजुट मिलिट्री कैपेबिलिटी के साथ भारतीय सेना की तैयारी को दिखाता है।
सवाल-5: क्या इसके पीछे कोई पॉलिटिकल वजह भी है, क्योंकि 1971 युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी पीएम थीं?
जवाबः पूर्व मेजर जनरल अशोक के. मेहता ने अपने आर्टिकल में लिखा, ‘कुछ लोग मानते हैं कि मोदी सरकार 1971 की जीत का बेमन से सम्मान करती है, क्योंकि यह कांग्रेस की सरकार के दौरान हासिल की गई थी। अब मिलिट्री अपनी ऑटोनॉमी का दावा करे, जो राजनीति से हटकर, सेक्युलर और प्रोफेशनल हो। मोदी की पसंदीदा लाइन है कि ‘भारत बुद्ध की भूमि है, युद्ध की नहीं’। इसे शाब्दिक तौर से नहीं अपनाया जाना चाहिए।’
टेलीग्राफ अखबार से बात करते हुए एक पूर्व ब्रिगेडियर ने कहा, ‘पेंटिंग बदलने की वजह केवल पॉलिटिकल हो सकती है। मौजूदा सरकार 1971 की जीत की यादों को मिटाने की कोशिश कर रही है, क्योंकि यह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय की घटना है, लेकिन मोदी सरकार के लिए ये आयरॉनिक है क्योंकि पाकिस्तान को हराने और उसका बंटवारा करने से इंदिरा गांधी RSS की पसंदीदा बन गई थीं।’
सवाल-6: इस पूरे मामले पर आर्मी वेटरन्स का क्या कहना है?
जवाबः 1971 की तस्वीर हटाकर नई पेंटिंग लगाने पर कई आर्मी वेटरन्स ने नाराजगी जाहिर की है। वे मानते हैं कि ऐसा करने से सेना की सबसे बड़ी जीत को पीछे किया जा रहा है।
नॉर्दर्न आर्मी कमांडर रहे रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग ने पेंटिंग हटाने को लेकर नाराजगी जाहिर की। 12 दिसंबर को उन्होंने सोशल मीडिया ‘X’ पर पोस्ट किया,
1000 सालों में और 1971 में एकजुट देश के तौर पर भारत की पहली बड़ी सैन्य जीत की पेंटिंग को एक हायरारकी ने हटा दिया, जो मानता है कि पौराणिक कथाएं, धर्म और बिखरा सामंती अतीत भविष्य की जीत को प्रेरित करेंगे।
रिटायर्ड एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर ने ‘X’ पर लिखा,
आश्चर्य की बात ये है कि 1971 के ढाका सरेंडर की ऐतिहासिक तस्वीर को हटाने के पीछे क्या मकसद है? अन्य देशों के गणमान्य लोग और सैन्य प्रमुख यहां आर्मी चीफ से मिलते हैं और भारत की सबसे बड़ी घटना का सिंबल देखते हैं।
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53 साल पहले 4 दिसंबर 1971 को भारत और पाकिस्तान के बीच तीसरी जंग शुरू हुई। पाकिस्तानी सेना ने महज 13 दिनों में ही घुटने टेक दिए। 16 दिसंबर को दुनिया का सबसे बड़ा सरेंडर हुआ। इसमें पाकिस्तानी जनरल नियाजी अपने 93 हजार सैनिकों के साथ भारत के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने सरेंडर किया। पूरी खबर पढ़ें…
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