विदेशी मुद्रा भंडार दबाव में – Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar – nayaindia.com

दो खबरें लगातार न्यूज साइकल में बनी हुई हैं। पहली, डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में लगातार गिरावट हो रही है और अब एक डॉलर की कीमत 95 रुपए की मनोवैज्ञानिक सीमा को पार कर गई है। दूसरी खबर यह है कि विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं, जिससे तमाम प्रयासों के बावजूद शेयर बाजार में स्थिरता नहीं आ रही है। इन खबरों को अलग अलग देखने की जरुरत नहीं है। ये खबरें देश की अर्थव्यवस्था की तस्वीर बताने वाली हैं। जब से पश्चिम एशिया में जंग शुरू हुई है या अमेरिका और इजराइल ने ईरान के ऊपर हमला शुरू किया उसके बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था कई तरह के प्रत्यक्ष दबाव झेल रही है। भारत का तेल आयात का बिल बढ़ रहा है उसे पूरा करने के लिए डॉलर की जरुरत है। भारतीय मुद्रा रुपए की कीमत गिर रही है उसे नियंत्रित करने के लिए डॉलर की जरुरत है। भारत में बाहर से आने वाला पैसा कम हो गया है क्योंकि खाड़ी से लाखों लोग वापस लौट आए हैं तो उसकी वजह से विदेशी मुद्रा भंडार दबाव में और ऊपर से विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं। इससे भी विदेशी मुद्रा भंडार दबाव में है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 703 अरब डॉलर का था, जो फरवरी में 728 अरब डॉलर का था। यानी दो महीने में इसमें 25 अरब डॉलर की गिरावट आई है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि खाड़ी में युद्ध की वजह से तेल की कीमतें बढ़ी हैं। अमेरिका और इजराइल के हमले के जबाव में ईरान ने खाड़ी के सभी तेल उत्पादक देशों पर हमला किया। सऊदी अरब से लेकर संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन से लेकर इराक, कुवैत, कतर, ओमान सभी देशों पर हमला किया। बाद में तो उसने इन देशों को तेल व गैस संयंत्रों पर भी हमला किया। दूसरी ओर ईरान ने होर्मुज की खाड़ी बंद कर दी। इस तरह से तेल और गैस की आपूर्ति पर दो तरह से असर हुआ। होर्मुज से जहाजों का निकलना बंद हुआ तो दूसरी ओर खाड़ी देशों के तेल व गैस संयंत्रों को क्षतिग्रस्त होने से कीमतें बढ़ीं। 28 फरवरी को जंग शुरू होने से पहले जो कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल का था वह औसतन 110 डॉलर प्रति बैरल पर है। भारत का तेल आयात बिल 12 अरब डॉलर प्रति महीने के आसपास है। लेकिन रुपए की कीमत को थामने के लिए भी डॉलर निकालना पड़ा है। दूसरी ओर विदेशी निवेशकों ने डॉलर निकाल लिए हैं और बाहर से निवेश के रूप में या रेमिटेंसेज के रूप में डॉलर आना कम हुआ है। इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार घट रहा है।
मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति –
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