सुरक्षित ठिकाने की तलाश में तैरना: डुगोंग और संरक्षण – The Hindu

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October 1, 2025e-Paper
Published – October 01, 2025 10:20 am IST
एक दौर था जब मन्नार की खाड़ी, पाक की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में व्यापक रूप से पाए जाने वाले भारत के डुगोंग की तादाद घटकर कुछ सौ ही रह गई थी, क्योंकि अवैध शिकार, अवांछित पकड़, रहने की जगह के बिखरने और प्रदूषण ने इन प्राणियों की प्रजनन दर को धीमा कर दिया था। लेकिन पिछले दशक में की गई विभिन्न पहलों, अभी भी अधूरी ही सही, ने इस गिरावट को पलटने की दिशा में एक गंभीर प्रयास का संकेत दिया है। सबसे उल्लेखनीय कदम वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत 2022 में पाक की खाड़ी में डुगोंग संरक्षण रिजर्व की अधिसूचना थी। कुल 12,000 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्रफल वाले समुद्री घास के मैदानों की रक्षा करते हुए, यह कदम समन्वित समुद्री संरक्षण का आदर्श बन गया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से लैस तमिलनाडु की अगुवाई ने अवैध शिकार को कम किया है और मछुआरों को अवांछित पकड़ के रूप में पकड़े गए डुगोंग को छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया है। अब, अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने इसे एक आदर्श रिजर्व के रूप में मान्यता दी है और इसके पारिस्थितिक महत्व एवं पुनरुद्धार की नवीन तकनीकों की सराहना की है। डब्ल्यूआईआई के सर्वेक्षणों से पता चलता है कि यहां डुगोंग की तादाद 200 से ज़्यादा है, जोकि नाजुक लेकिन दो दशक पहले जताई गई विलुप्ति की आशंका के बनिस्बत एक उत्साहजनक प्रगति है। भारत ने संरक्षण के विकल्पों को व्यापक बनाने वाली तकनीकों के साथ भी प्रयोग किया है, जिनमें ड्रोन प्लेटफॉर्म और समुद्री घास की क्यारियों का ध्वनिक एवं उपग्रह-आधारित मानचित्रण शामिल है।
फिर भी, अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है। इस रिजर्व में भी, मशीन से मछली पकड़ना, बंदरगाह निर्माण, तलकर्षण (ड्रेजिंग) और कृषि व उद्योग से होने वाला प्रदूषण समुद्री घास के मैदानों के लिए खतरा है। डुगोंग मछली पकड़ने के जालों में फंसकर लगातार मर रहे हैं। समुद्र का बढ़ता तापमान, अम्लता और तूफान इनके पुनर्स्थापन की दिशा में हुई प्रगति को खतरे में डाल रहे हैं। गुजरात और अंडमान में इनकी तादाद तमिलनाडु के मुकाबले कम है और ये जीव वहां अपेक्षाकृत कम संरक्षित हैं। विशेषज्ञों ने सीमा पार, खासकर श्रीलंका के साथ, सहयोग के महत्व पर ज़ोर दिया है क्योंकि डुगोंग संकरी पाक जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं। साझा संरक्षण के बिना, इनका पुनर्स्थापन स्थानीय स्तर तक ही सीमित रहेगा। इस मामले में वित्तपोषण भी असंगत रहा है: हालांकि प्रतिपूरक वनीकरण निधि से किए गए आवंटन से मदद मिली है, लेकिन डुगोंग के गर्भाधान की लंबी अवधि के मद्देनजर दशकों तक निरंतर निवेश की जरूरत है। ये प्रयास और कमियां अन्य समुद्री प्रजातियों, जिन्हें मानव गतिविधियों से सीधे खतरा होने के बावजूद एक अक्षुण्ण पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता है, के संरक्षण के लिए व्यापक सबक हैं। पाक की खाड़ी में स्थित यह रिजर्व इस बात को दर्शाता है कि एक भागीदार के रूप में मछुआरों के सामुदायिक जुड़ाव से अवांछित पकड़ को कम किया जा सकता है और संरक्षण के लिए स्थानीय समूह बनाए जा सकते हैं। आईयूसीएन की मान्यता इस बात को रेखांकित करती है कि ज्ञान के आदान-प्रदान को वैधता और अवसर प्रदान करते हुए अंतरराष्ट्रीय समर्थन कैसे घरेलू प्रयासों को बढ़ावा दे सकता है। इसी तरह, पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को ड्रोन एवं इकोसाउंडर जैसी तकनीकों के साथ मिलाने का उपाय यह दर्शाता है कि संरक्षण की कवायद कैसे परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का काम कर सकती है।
Published – October 01, 2025 10:20 am IST
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