बजट 2026 से पहले शिक्षा में बड़े बदलाव की मांग, ‘एक देश–एक परीक्षा’ पर जोर – AajTak

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केंद्रीय बजट 2026 से पहले शिक्षा विशेषज्ञ बड़े बदलावों की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि अब पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं का तरीका बदलना जरूरी हो गया है. विशेषज्ञ चाहते हैं कि पढ़ाई में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बेहतर इस्तेमाल हो, प्रतियोगी परीक्षाओं की संख्या कम की जाए, करियर गाइडेंस मजबूत हो और रटने की बजाय कौशल पर ध्यान दिया जाए.
बजट 2026 से उम्मीद है कि सरकार एआई से जुड़ी पढ़ाई, डिजिटल सुविधाओं और स्किल-आधारित शिक्षा को बढ़ावा देगी. इसका मकसद यह है कि छात्र सिर्फ परीक्षा पास न करें, बल्कि उन्हें नौकरी के लायक भी बनाया जा सके. साथ ही छोटे शहरों और कस्बों के छात्रों के लिए पढ़ाई को सस्ता और आसान बनाने पर भी जोर दिया जा सकता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कदम काफी होंगे? चलिए जानते हैं.
JEE की बढ़ती भीड़ और कड़ी होती प्रतियोगिता
अगर जेईई परीक्षा के पुराने आंकड़ों को देखें तो एक बड़ी तस्वीर सामने आती है. 1978 के मुकाबले आज सीटें तो करीब 7 गुना बढ़ी हैं, लेकिन परीक्षा देने वाले छात्रों की संख्या करीब 48 गुना हो चुकी है. यानी प्रतियोगिता पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गई है. सरकार भले ही बेहतर कॉलेज और सुविधाएं दे रही हो, लेकिन छात्रों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है.
AI प्लेटफॉर्म: दीक्षा और स्वयं की भूमिका
बजट 2026 में दीक्षा और स्वयं जैसे AI-आधारित शिक्षा प्लेटफॉर्म को और मजबूत करने की उम्मीद है, ताकि पढ़ाई हर छात्र तक पहुंच सके. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बढ़ा देना काफी नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि IIT-JEE के टॉप 500 छात्रों में से 90 फीसदी से ज्यादा केवल IIT बॉम्बे को चुनते हैं. इसका मतलब है कि छात्र कॉलेज का चुनाव पढ़ाई से ज्यादा नौकरी के मौके देखकर कर रहे हैं.
कम और एक जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि देश में बहुत ज्यादा प्रतियोगी परीक्षाएं हैं. इन्हें कम किया जाना चाहिए और परीक्षाएं ऐसी हों, जो साल में एक बार की बजाय कई बार दी जा सकें. इससे छात्रों पर दबाव कम होगा. जैसे IIM अब 12वीं के बाद ही मैनेजमेंट कोर्स शुरू कर रहे हैं, वैसे ही ग्रेजुएशन लेवल पर भी ऐसे कोर्स लाए जाने चाहिए जो सीधे इंडस्ट्री से जुड़े हों.
स्कूल स्तर की पढ़ाई मजबूत करने की जरूरत
अगर बच्चों को बचपन से ही सही दिशा मिले, तो आगे जाकर प्रतियोगी परीक्षाओं का बोझ कम हो सकता है. इसके लिए प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को मजबूत करना जरूरी है. नई शिक्षा नीति 2020 सही दिशा में कदम थी, लेकिन जमीन पर इसका सही ढंग से लागू न हो पाना एक बड़ी समस्या है. कई कॉलेज सॉफ्ट स्किल्स के नाम पर ऐसे कोर्स चला रहे हैं, जिनमें सही ट्रेनर और अनुभव की कमी है.
करियर काउंसलिंग और ट्रेनिंग में बड़ी कमी
भारत में आज 10 हजार से भी कम सर्टिफाइड करियर काउंसलर हैं. नई शिक्षा नीति में यह साफ नहीं बताया गया है कि छात्रों को कौन-कौन से जरूरी स्किल्स सिखाए जाने चाहिए. जब तक सही ट्रेनिंग और मान्यता नहीं मिलेगी, तब तक सुधार अधूरा रहेगा.
स्कूल और कोचिंग को साथ लाने की जरूरत
सरकार ने नवंबर 2024 में कोचिंग संस्थानों के लिए नए नियम बनाए, जो एक अच्छा कदम है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कोचिंग को स्कूल से अलग नहीं, बल्कि उसके साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए. अगर स्कूल, कोचिंग और इंडस्ट्री मिलकर काम करें, तो छात्रों को सही उम्र में सही करियर की जानकारी मिल सकती है.
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