Explained: द केरल स्टोरी 2 हो या द बंगाल फाइल्स, काठ की हांडी क्यों साबित हो रही हैं ऐसी फिल्में? – TV9 Bharatvarsh

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बॉक्स ऑफिस पर विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म द बंगाल फाइल्स के डिजास्टर साबित होने के बाद अब द केरल स्टोरी 2 का भी करिश्मा देखने को नहीं मिला. जबकि महज कुछ ही साल पहले की बात है. 2022 में विवेक अग्निहोत्री की द कश्मीर फाइल्स और 2023 में विपुल अमृतलाल शाह की द केरल स्टोरी ने कलेक्शन, लोकप्रियता का इतिहास रचा था. इन दोनों फिल्मों ने बहस का जो माहौल तैयार किया, वह ऐतिहासिक है. महज 15 करोड़ में बनी द कश्मीर फाइल्स ने 350 करोड़ से ज्यादा का कलेक्शन किया और करीब 20 करोड़ में बनी द केरल स्टोरी ने भी 300 करोड़ से ज्यादा की कमाई का आंकड़ा छुआ. भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसा कम ही बार हुआ कि जिस फिल्म ने कमाई का रिकॉर्ड बनाया, उसने सांस्कृतिक बहसें भी कायम की.
ऐसा कम ही बार देखने को मिला कि किसी फिल्म के प्रदर्शन पर संसद से सड़क तक आर-पार की राजनीति हुई और समाज में बड़े पैमाने उस पर बौद्धिक विमर्श भी हुआ हो. लेकिन द कश्मीर फाइल्स के बाद द केरल स्टोरी के कंटेंट और प्रस्तुति ने इसे संभव कर दिखाया. इसके लिए दोनों फिल्मों की टीमों को बहुत से लोगों ने खूब बधाइयां दीं तो बहुत से लोगों ने निशाने भी साधे. कोई हैरत नहीं कि समर्थन और विरोध के बीच दोनों फिल्मों को खूब फायदा हुआ. और इसने एक चलन बना दिया.
लेकिन कहावत पुरानी है- काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती. एक बार चढ़ी, जली और फिर फेंक दी गई. काठ की हांडी को आज के ज़माने की भाषा में यूज एंड थ्रो भी कह सकते हैं. पुराने ज़माने में लिखी और कही गई कहावतों का भी अपना समाजशास्त्र होता है. बोल वचनों का सृजन यूं ही नहीं होता. आज द केरल स्टोरी 2 और द बंगाल फाइल्स जैसी फिल्में भी काठ की हांडी ही साबित हो रही हैं. एकतरफा या नफरती विचारों का ओवरडोज हमेशा ही कारगर साबित हो जाए- इसकी गारंटी नहीं. करीब 50 करोड़ में बनी द बंगाल फाइ्ल्स बॉक्स ऑफिस पर आधी लागत भी नहीं निकाल सकी. वहीं करीब 25-30 करोड़ में बनी द केरल स्टोरी 2 रिलीज के तीन दिनों के भीतर करीब 11 करोड़ तक की कमाई की है.
द केरल स्टोरी 2 शुरुआत से ही विवादों में रही. इसी वजह से फिल्म के पहले निर्धारित निर्देशक सुदीप्तो सेन इस प्रोजेक्ट से अलग हो गए, जिन्होंने 2023 की द केरल स्टोरी का निर्देशन किया था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुदीप्तो सेन ने यह कहकर खुद को अलग कर लिया कि इसमें पर्याप्त रिसर्च नहीं है. सुदीप्तो सेन का द केरल स्टोरी पार्ट 2 से बाहर होना ही सबसे पहला झटका था. इसके बाद जैसे ही फिल्म का ट्रेलर सामने आया इसके कुछ संवाद और सीन पर आपत्तियां दर्ज की जाने लगीं. विवाद बढ़ा. सीबीएफसी की तरफ से 15 से अधिक कट्स और कुछ संवादों को म्यूट करने के आदेश जारी किए गए.
इतने पर भी यह मामला नहीं रुका. रिलीज से पहले फिल्म को केरल हाईकोर्ट में कानूनी उलझनों का सामना करना पड़ा. और जब फिल्म शनिवार को देखने को मिली तब तक बहुत देर हो चुकी थी. लोगों के जेहन और रुचि से फिल्म उतर चुकी थी. विवादों में ज्यादातर लोगों को पता चल चुका था कि फिल्म का नाम भले ही द केरल स्टोरी 2 हो लेकिन इसकी कहानी में दिखाई गईं तीनों युवतियां केरल से बाहर की हैं. फिल्म को लेकर दर्शकों में कोई जिज्ञासा नहीं रह गई. तथ्य सामने आते ही फिल्म के खिलाफ स्पष्ट प्रोपेगेंडा कह कर भी निशाने साधे जाने लगे. हालांकि 2023 की केरल स्टोरी से भी कुछ विवादित संवादों और सीन हटाए गए थे लेकिन मूल कहानी के प्रति लोगों में कौतूहल था.
बॉक्स ऑफिस पर यही हाल विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म द बंगाल फाइल्स का भी हुआ. उन्होंने इसे बहुत ही शिद्दत से बनाया था. फिल्म में बंगाल की संस्कृति, भाषा, कला, पोषाक, इतिहास सबके बारे में उन्होंने काफी रिसर्च किया. इसमें कोई दो राय नहीं कि फिल्म के कई सीन और संवाद दिलों को छूने वाले थे. इसके बावजूद विवेक की उस महत्वाकांक्षी फिल्म को वे दर्शक थिएटर में देखने के लिए नहीं उमड़े जिन्होंने द कश्मीर फाइल्स को ऐतिहासिक तौर पर ब्लॉकबस्टर बनाया था. बाद में जब फिल्म डिजास्टर साबित हुई तो विवेक को भावुक होकर कहना पड़ा कि उन्हें किसी का भी साथ नहीं मिल पा रहा है.
विवेक अग्निहोत्री के इसी बयान में फिल्म की सफलता और असफलता के राज छिपे थे. जिन दर्शकों ने द कश्मीर फाइल्स को ब्लॉकबस्टर बनाया वे दर्शक ही द बंगाल फाइ्ल्स देखने क्यों नहीं गए. जिन दर्शकों ने द कश्मीर फाइल्स की कहानी को राष्ट्रीय फिल्म का दर्जा दिया, देशभक्ति की धारा से जोड़कर तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उसके समर्थन में अभियान चलाया, वे लोग ही द बंगाल फाइल्स को लेकर उदासीन क्यों रहे.
विवेक अग्निहोत्री को उनके ही समर्थकों का साथ क्यों नहीं मिला. विवेक खुद नहीं समझ सके. आपको याद होगा कि जब कंगना रनोत की फिल्म इमरजेंसी आई थी तब भी उनके समर्थकों में कोई उत्साह नहीं देखा गया, बढ़-चढ़ कर लोग फिल्म देखने थिएटर नहीं गए. लिहाजा इमरजेंसी भी डिजास्टर साबित हुई.
हाल में तमाम ऐसी फिल्में आईं, जिनके ऊपर खास प्रोपेगेंडा फैलाने के आरोप लगे थे, वे सब से सब बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुह गिरी हैं. इंदु सरकार से लेकर द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर, द साबरमती रिपोर्ट, आर्टिकल 370, जेएनयू, हूर आदि तक कई ऐसी फिल्में हैं जिनको दर्शकों का प्यार नहीं मिला. आखिर क्यों? यह एक अहम सवाल है. क्या ये फिल्में अपने गठन में कमजोर साबित हुईं या दर्शकों को अब ऐसी फिल्मों में कोई रुचि ही नहीं रह गई? क्या ये फिल्में भी काठ की हांडी के तर्ज पर बनाई गई थी? दर्शक अब छावा, एनिमल या धुरंधर जैसी फिल्में देखना चाहते हैं, जिसके डायरेक्शन, स्टोरीलाइन, एक्टिंग, कास्टिंग आदि में मैसेज के साथ-साथ मनोरंजन का भी ख्याल रखा गया था. बिना मनोरंजन महज मैसेज के लिए शायद ही कोई फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफलता बटोर पाती है.
हालांकि यह जानना भी जरूरी है कि द कश्मीर फाइल्स और द केरल स्टोरी ने आखिर क्यों कामयाबी का इतिहास रचा. इसे समझना जरूरी है और अन्य डिजास्टर फिल्मों से इसकी तुलना भी जरूरी है. वास्तव में द कश्मीर फाइल्स की कहानी में कश्मीरी पंडितों का दर्द था, जो कि एक राष्ट्रीय मु्द्दा है. सारा देश कश्मीरी पंडितों की पीड़ा के साथ है. फिल्म में पाकिस्तान प्रायोजित कश्मीर के आतंकवाद को गहरे तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया है. लिहाजा फिल्म के साथ देश भर की संवेदना जुड़ गई. लेकिन द बंगाल फाइल्स में जिस तरह से वर्तमान मु्र्शिदाबाद को भारत-पाक विभाजन के समय की वारदातों और दंगों से जबरन फैंटेसीनुमा जोड़ा गया, उससे दर्शक जुड़ नहीं सके.
यही हाल 2023 की द केरल स्टोरी का भी था. इसमें भी आतंकवाद और आईएसआई की साजिश का मुद्दा उभारा गया था. लिहाजा भारी संख्या में दर्शक इसके भाव से जुड़े लेकिन द केरल स्टोरी 2 में घिसे-पिटे मुद्दे- मसलन लव जेहाद, धर्मांतरण या बीफ आदि मीडिया में पहले ही सुर्खियां पाकर शांत हो चुके हैं. अब लोग उस पर कहानी क्या देखना चाहेंगे. दर्शकों में अब इन मुद्दों पर बनी हल्की फिल्मों को लेकर कोई रुचि नहीं. वास्तव में छावा और धुरंधर ने जैसी बड़े कैनवस की फिल्मों ने इन जैसी फिल्मों का मार्केट डाउन कर दिया.
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