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चुनाव आयोग ने दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है. राजधानी दिल्ली में 5 फरवरी को मतदान होगा और 8 फरवरी को नतीजे घोषित किए जाएंगे. एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी (आप) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है, वहीं तीसरी बड़ी खिलाड़ी- कांग्रेस- मुकाबले से नदारद नजर आ रही है.
दिल्ली में चुनावी माहौल जैसे-जैसे गर्म होता जा रहा है, बीजेपी और AAP के बड़े नेता अपने-अपने प्रचार अभियान में जुटे हुए हैं. हालांकि, कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अब तक न तो मैदान में दिखाई दिया है और न ही उसकी सक्रियता महसूस की जा रही है.
मुकाबले से गायब दिख रही कांग्रेस
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां बीजेपी के कैंपेन की अगुवाई कर रहे हैं और योजनाओं का उद्घाटन कर नए प्रोजेक्ट्स का ऐलान कर रहे हैं, तो वहीं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बीजेपी के हर हमले का जवाब देने के लिए मैदान में पूरी तरह से डटे हुए हैं.
कांग्रेस, जिसने एक समय पर शीला दीक्षित के नेतृत्व में दिल्ली पर 15 साल तक शासन किया था, आज अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में संघर्ष करती नजर आ रही है. खासकर इसलिए क्योंकि उसके बड़े नेता इस चुनावी लड़ाई से गायब हैं.
दूसरे स्तर के नेताओं पर निर्भर कांग्रेस
कांग्रेस सूत्रों ने आजतक को बताया कि पार्टी की ओर से गारंटी योजनाओं का ऐलान कांग्रेस के बड़े नेताओं द्वारा किया जाना था. लेकिन सोमवार को कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने ‘प्यारी दीदी योजना’ लॉन्च की, जिसमें महिलाओं को 2,500 रुपये प्रति माह देने का वादा किया गया है. इसे AAP की ‘महिला सम्मान योजना’ का जवाब माना जा रहा है, जिसमें 2,100 रुपये प्रति माह देने की बात कही गई है.
सवाल यह है कि क्या कांग्रेस खुद को कमजोर दिखाने की कोशिश कर रही है? अगर ऐसा नहीं है तो महिलाओं के लिए गारंटी योजना का ऐलान पार्टी की स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी वाड्रा से क्यों नहीं कराया गया, जो महिलाओं के मुद्दों को प्रमुखता से उठाती रही हैं? इससे भी बड़ी बात यह है कि हाल ही में बीजेपी नेता रमेश बिधूड़ी की विवादास्पद टिप्पणी में उनका नाम घसीटा गया था. कांग्रेस के प्रचार अभियान में सिर्फ दूसरे स्तर के नेता, सांसद और कांग्रेस-शासित राज्यों के मंत्री सक्रिय नजर आ रहे हैं. वहीं बीजेपी और AAP के प्रमुख नेता प्रचार की कमान संभाले हुए हैं.
कहां हैं राहुल, प्रियंका और खड़गे?
सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी विदेश यात्रा पर हैं और एक-दो दिन में लौट सकते हैं, जिसके बाद उन्हें चुनाव प्रचार में देखा जा सकता है. प्रियंका गांधी हिमाचल प्रदेश में थीं और हाल ही में वापस आई हैं. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी अब तक कोई बयान नहीं दिया है.
कांग्रेस असमंजस की स्थिति में नजर आ रही है- वह AAP के प्रमुख चेहरे अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी पर जोरदार हमला करे या उन पर नर्म रहे. अगर कांग्रेस AAP पर खुलकर हमला करती है, तो इससे ‘इंडिया’ गठबंधन में खटास आ सकती है. AAP और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियां कांग्रेस नेतृत्व (खासतौर पर राहुल गांधी) पर सहयोगियों को साथ लेकर न चलने का आरोप लगा सकती हैं.
‘इंडिया’ ब्लॉक पर मंडरा सकता है खतरा
चुनाव प्रचार का मुद्दा कांग्रेस के लिए दोधारी तलवार जैसा बन गया है. उसे या तो ‘इंडिया’ ब्लॉक के अपने सहयोगी AAP के खिलाफ प्रचार करना होगा, जिससे गठबंधन टूट सकता है, या फिर AAP द्वारा छीने गए अपने वोट बैंक को वापस पाने की कोशिश करनी होगी.
वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजय माकन ने खुलकर कहा है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी गलती 2013 में AAP को समर्थन देना और 2019 लोकसभा चुनाव में उससे गठबंधन करना था. उनका मानना है कि AAP ने कांग्रेस को कमजोर करने और उसके वोट बैंक पर कब्जा करने में अहम भूमिका निभाई है.
स्थानीय स्तर पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच गहरा अविश्वास है. कांग्रेस ने जहां अरविंद केजरीवाल के खिलाफ संदीप दीक्षित और सीएम पद की उम्मीदवार आतिशी के खिलाफ अलका लांबा को उतारा है, इससे दोनों दलों के रिश्ते और खराब हुए हैं. AAP को यह चिंता सता रही है कि कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ उसके अभियान में बाधा डाल सकती है और उसे अपने शीर्ष नेताओं के खिलाफ कांग्रेस के बड़े चेहरे उतारने से बचना चाहिए था.
कड़े मुकाबले में देर से एंट्री
आने वाले दिनों में राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के प्रचार अभियान में शामिल होने की संभावना है. लेकिन तब तक यह माना जा सकता है कि कांग्रेस का यह कदम एक अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और प्रतिष्ठा की लड़ाई में देर से एंट्री के तौर पर देखा जाएगा.
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