45 मिनट में 4 किमी का सफर , साल के 500 घंटे ट्रैफिक में खर्च, पोस्ट वायरल – AajTak

नोएडा के एक स्टार्टअप के फाउंडर स्वप्निल श्रीवास्तव ने अपने रोज़ के सफर का अनुभव शेयर किया, जिसके बाद सोशल मीडिया पर ट्रैफिक और खराब बुनियादी ढांचे को लेकर बहस शुरू हो गई. उन्होंने बताया कि उनका ऑफिस उनके घर से सिर्फ 4 किलोमीटर दूर है, लेकिन कार से वहां पहुंचने में उन्हें 45 मिनट लग जाते हैं. उन्होंने मजाक में कहा कि वे पैदल चलकर और बीच में चाय पीकर भी शायद जल्दी पहुंच सकते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि यह समस्या सिर्फ उनकी नहीं है, बल्कि बड़े शहरों में आम बात है.
उनके अनुसार, बेंगलुरु और दिल्ली-एनसीआर जैसे शहरों में लोग रोजाना औसतन 60-70 मिनट सिर्फ आने-जाने में बिताते हैं. मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं. उनका कहना है कि इस वजह से लोगों का काफी समय और ऊर्जा बर्बाद होती है, जिससे काम की उत्पादकता पर भी असर पड़ता है.

हर दिन ट्रैफिक में निकलते हैं 2 घंटे
स्वप्निल ने कहा कि हर दिन करीब 2 घंटे ट्रैफिक में निकल जाते हैं, जो साल भर में लगभग 500 घंटे हो जाते हैं. उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए कुछ सुझाव भी दिए, जैसे- फ्लैक्सिबल ऑफिस टाइम, हाइब्रिड वर्क (घर और ऑफिस दोनों से काम), सैटेलाइट ऑफिस और बेहतर लास्ट-माइल कनेक्टिविटी. उनकी पोस्ट पर कई लोगों ने अपनी-अपनी परेशानी शेयर की. किसी ने कहा कि वह रोज 3-4 घंटे सफर में बिताता है, तो किसी ने कहा कि खराब ट्रैफिक के कारण काम करने की ऊर्जा ही खत्म हो जाती है. कुल मिलाकर, इस मुद्दे ने यह दिखा दिया कि बड़े शहरों में ट्रैफिक और बुनियादी ढांचे की समस्या अब लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है.
स्वप्निल ने कहा ने लिखा-ज्यादातर सड़कें फ्लाईओवर और अंडरपास बनाने के लिए खुदी हुई हैं, इसलिए सिर्फ़ ट्रैफिक ही नहीं, हर जगह धूल ही धूल है. दिल्ली एनसीआर में बाइक चलाना तो मुमकिन ही नहीं, ऑफिस पहुंचते-पहुंचते धूल से सन जाएंगी और नहाने की जरूरत पड़ेगी, जो कि ज्यादातर ऑफिस में नहीं होता. कार मतलब ट्रैफिक, बाइक मतलब धूल. आप फंस गए हैं. सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को देखकर कई लोगों ने अपनी-अपनी परेशानी बताई. एक यूजर ने कहा कि सैटेलाइट ऑफिस बनना जरूरी है, क्योंकि वह रोज़ 4 घंटे सिर्फ आने-जाने में ही खर्च कर देता है. उसने यह भी बताया कि नए नियमों की वजह से काम पर असर पड़ रहा है और अब उसे भीड़भाड़ वाली बसों और मेट्रो में खड़े होकर सफर करना पड़ता है, जिससे थकान बढ़ जाती है. 
सोशल मीडिया पर पोस्ट वायरल
भगवान रेड्डी नाम के यूजर ने कहा- पुराने जमाने के मंदिर-नगरों की तरह, हमें भी ऐसे नगर बनाने चाहिए जिनमें ऑफिस, आवासीय भवन, स्कूल, बैंक और डाकघर हों. जैसे मंदिर केंद्र में हो और बाकी सब कुछ उसके चारों ओर बना हो, ताकि स्कूल, बैंक, किराना स्टोर आदि के लिए समय बर्बाद न हो और कार्यालय परिसर केंद्र में रहे. निकेत अटार्डे ने लिखा-इन टैक्सियों की वजह से ट्रैफिक और भी बदतर हो गया है. अब आप पूछेंगे क्यों? क्या आपने पता लगाया कि इनमें से कितनी टैक्सियाँ सिंगल पर्सन थीं या शेयरिंग वाली थीं? सिंगल या कम शेयरिंग से ट्रैफिक का बोझ बढ़ जाता है. ऑफिस के पास आईटी पार्क के सामने वाली सड़क हमेशा इन टैक्सियों की वजह से जाम रहती है. बाकी समय ट्रैफिक नहीं रहता.
तावेरा48 ने कहा- इसका समाधान बहुत सरल है, कार का इस्तेमाल न करें, साइकिल का इस्तेमाल करें. 5 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों के लिए साइकिल का इस्तेमाल अनिवार्य कर देना चाहिए, जब तक कि उन्हें कोई स्वास्थ्य समस्या न हो. घनी आबादी वाले कार्यालय/आईटी क्षेत्रों में कारों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दें, केवल सार्वजनिक परिवहन का ही इस्तेमाल करें.

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