केदारनाथ का नाम कैसे पड़ा? पांडवों से नहीं इस देवता से जुड़ी है कहानी, स्कंदपुराण में है वर्णन – AajTak

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उत्तराखंड के चार धाम के कपाट खुल रहे हैं. यात्रा की शुरुआत हो रही है. अक्षय तृतीया से ये सिलसिला शुरू हो जाता है. इसलिए श्रद्धालुओं के जत्थे इन पवित्र तीर्थों की यात्रा के लिए निकल पड़े हैं. गंगोत्री-यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के बाद अब 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुलेंगे. प्रसिद्ध केदारनाथ धाम महादेव शिव को समर्पित है. यह उनका विशेष ज्योतिर्लिंग भी है. 
केदारनाथ धाम का इतिहास बताते हुए अक्सर पांडवों की कहानी का जिक्र आता है. जिसमें पांडव महाभारत युद्ध के बाद तीर्थयात्रा पर निकलते हैं और शिवजी का आशीर्वीद पाना चाहते हैं. लेकिन महादेव शिव उन्हें कहीं नहीं मिलते हैं.
तब पांडवों को शिवजी के दर्शन केदार घाटी में होते हैं, जहां वह बैल का रूप धारण किए हुए थे. इस तरह केदारनाथ मंदिर का इतिहास महाभारत कालीन बताया जाता है.
लेकिन ऐसा नहीं है. केदारनाथ की असली और सही कथा-इतिहास का जिक्र स्कंदपुराण में दर्ज है. इस कथा के मुताबिक, एक बार हिरण्याक्ष नाम का एक दैत्य हुआ. इस दैत्य ने त्रिलोक को अपने अधिकार में कर लिया और इंद्र आदि देवताओं को खदेड़ दिया. स्वर्ग से निकाले गए देवराज, हिमालय में मंदाकिनी नदी के किनारे-किनारे चलते हुए एकांत स्थान पर पहुंचे और दैत्य से हार के कारण क्षुब्ध होकर शिवजी की तपस्या करने लगे. 
Kedarnath Dham
इंद्रदेव ने की थी तपस्या
इंद्र की तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान शिव महिष (भैंसा) के रूप में प्रकट हुए. उन्होंने इस रूप में इंद्र को परखना भी चाहा, इसलिए भैंसे के रूप में शिवजी ने इंद्र से प्रश्न पूछा, “के दारयामि?” जिसका अर्थ है ‘किसे डुबा दूं या किसका विनाश कर दूं.’ इस प्रश्न के ही अक्षरों से इंद्र देव की तपस्थली केदार क्षेत्र कहलाई. 
स्कंदपुराण में इसी आधार पर इसे केदार खंड कहा गया है. इस प्रश्न को सुनकर इंद्र एक पल को ठहरे, फिर उन्होंने सोचा कि इस सुनसान जगह पर यह प्रश्न कौन करेगा? तब उन्होंने सोचा कि यह प्रश्न इस भैंसे का ही है और वह पहचान गए कि भैंसे के रूप में महादेव ही उनके सामने हैं. 
‘केदार’ शब्द का का क्या है अर्थ?
इंद्र ने उन्हें प्रणाम किया तो भैंसे ने फिर पूछा केदारयामी. (किसे डुबाऊं). इंद्र ने शिव को पांच राक्षसों के नाम बताए, जो उनके और देवताओं के लिए खतरा थे. उन्होंने हिरण्याक्ष, सुबाहु, वक्त्रकंधर, त्रिशृंग और लोहिताक्ष दैत्यों के नाम लेकर कहा कि इन पांचों का आप वध कर दीजिए, फिर अन्य दैत्य और दानव तो यूं ही कमजोर पड़ जाएंगे. तब शिवजी इसी भैंसे के स्वरूप में वहां पहुंचे जहां हिरण्याक्ष दैत्य था.
शिव ने इन पांचों दैत्यों का वध कर दिया. फिर वह देवराज इंद्र के पास पहुंचे. यहां महादेव ने एक कुंड का निर्माण किया. तब इंद्र ने एक और वरदान मांगा और महादेव शिव से कहा कि आप इसी स्वरूप के लिंगरूप में यहां निवास करें. मैं हर दिन स्वर्ग से आकर यहां आपकी पूजा करूंगा.
तब शिवजी ने कहा- तुम्हारी इच्छानुसार मैं यहां केदार शिव के नाम से निवास करूंगा. इस कुंड के जल को दोनों हाथों से तीन बार पीने से श्रद्धालुओं के माता-पिता दोनों पक्ष की तीन पीढ़ियों का उद्धार होगा. बाएं हाथ से जल पीने से मातृ-पक्ष का, दाएं हाथ से पितृ-पक्ष का, और दोनों हाथों से स्वयं का उद्धार होगा. यदि कोई भक्त यहां पिंडदान करता है और गया में भी पिंडदान करता है, तो उसे ब्रह्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है. 
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