सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (28 अप्रैल, 2026) को कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि उसके संचालन के लिए कोई ढांचा न हो और प्रबंधन को लेकर अराजकता की स्थिति नहीं हो सकती. कोर्ट ने कहा कि ऐसी संस्थाओं के कामकाज के लिए एक व्यवस्था और नियम होने चाहिए.
नौ जजों की संविधान बेंच ने यह टिप्पणी केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की. बेंच में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस बी वी नागरत्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं.
हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़ी चिश्ती निजामी परंपरा के वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी की ओर से पेश अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि दरगाह वह स्थान होता है, जहां किसी संत को दफनाया गया हो. पाशा ने कहा, ‘इस्लाम में मृत्यु के बाद संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन सूफी आस्था प्रणाली में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है, जहां किसी संत को दफनाया जाता है.’
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उन्होंने कहा, ‘भारत में सूफी आस्था प्रणाली में चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदिया और सुहरावर्दिया सहित कई प्रमुख परंपराएं शामिल हैं. मौजूदा मामला चिश्तिया व्यवस्था से जुड़ा है. मेरा कहना है कि यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से एक धार्मिक संप्रदाय है. अगर हजरत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाओं को देखा जाए, तो उनमें रोजा, नमाज, हज, जकात और सबसे बढ़कर आस्था जैसी इस्लामी परंपराओं के पालन पर जोर है.’
पाशा ने दलील दी कि किसी धार्मिक संस्था में प्रवेश को विनियमित करने का अधिकार प्रबंधन का हिस्सा है. इस पर जस्टिस अमानुल्ला ने कहा कि प्रबंधन के अधिकार का मतलब ढांचे का अभाव नहीं हो सकता और हर चीज के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए.
जस्टिस अमानुल्ला ने कहा, ‘अराजकता नहीं हो सकती. चाहे दरगाह हो या मंदिर, संस्था से जुड़े तत्व होंगे, धार्मिक क्रियाओं का एक तरीका होगा और कार्यों के संपादन का क्रम होगा. किसी न किसी को इसे विनियमित करना होगा.’ उन्होंने कहा, ‘ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई कहे कि मैं जो चाहूंगा, वह करूंगा या द्वार हर समय बिना किसी नियंत्रण के खुले रहें इसलिए सवाल यह है कि प्रबंधन करने वाला निकाय कौन है. यहीं संरक्षण की बात आती है, क्योंकि विनियमन आवश्यक है. साथ ही, यह संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता. व्यापक संवैधानिक मानकों पर भेदभाव नहीं हो सकता.’
जस्टिस अमानुल्ला ने कहा कि हर संस्था के लिए नियम होने चाहिए और इसे प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने हिसाब से तय नहीं कर सकता. इस मामले की सुनवाई जारी है. सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले कहा था कि किसी धार्मिक संप्रदाय की किसी प्रथा को जरूरी या गैर-जरूरी घोषित करने के लिए मानदंड तय करना न्यायिक मंच के लिए, अगर असंभव नहीं, तो अत्यंत कठिन है.
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सितंबर 2018 में पांच जजों की संविधान बेंच ने एक के मुकाबले चार के बहुमत से दिए फैसले में सबरीमाला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 साल की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी और सदियों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा को अवैध और असंवैधानिक करार दिया था.
Source: IOCL
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