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दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप कानूनी रूप से विवाह न सही, लेकिन एक तरह से विवाह के समान है. कोर्ट ने दो सहमति वाले वयस्कों को महिला के पिता से मिल रही धमकियों के खिलाफ पुलिस सुरक्षा देने का निर्देश दिया. न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने कहा कि भारत में विवाह की पहचान तब होती है जब दो वयस्क अपनी सहमति से साथ रहने का फैसला करते हैं. इसमें जाति, धर्म, रंग या पंथ की कोई दीवार आड़े नहीं आनी चाहिए. लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले दो सहमति से साथ रहने वाले वयस्कों को परिवार या अन्य लोगों की धमकियों से पुलिस सुरक्षा मिलनी चाहिए.
अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए इस बात पर जोर दिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत हर नागरिक को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देते हैं. कोई भी व्यक्ति या परिवार इसमें दखल नहीं दे सकता. दोनों याचिकाकर्ता वयस्क हैं और अपनी मर्जी से 2024 से रिलेशनशिप में हैं. वे 17 फरवरी 2026 को एक लिव-इन रिलेशनशिप अनुबंध भी कर चुके हैं, जो उनके रिश्ते को मान्यता देता है. स्वजन, रिश्तेदार या दोस्तों को ऐसे रिश्ते में धमकी देने या दखल देने का कोई अधिकार नहीं. कोर्ट ने कहा कि वयस्कों को अपनी पसंद के पार्टनर के साथ रहने का पूरा हक है. यदि कोई खतरा हो तो कपल संबंधित पुलिस स्टेशन के SHO या बीट कांस्टेबल से संपर्क कर सकता है, और पुलिस को तुरंत सुरक्षा प्रदान करनी होगी.
याचिका में कपल ने बताया कि वे दोनों बालिग हैं, 2024 से सहमति से साथ रह रहे हैं. इसी साल 17 फरवरी को उन्होंने लिव-इन अनुबंध भी किया, लेकिन महिला के पिता इस रिश्ते से नाराज हैं और धमकियां दे रहे हैं, जिससे उनकी जान-माल को खतरा है. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वयस्कों को साथ रहने का असीमित अधिकार है, भले ही औपचारिक विवाह न हो. न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने यह आदेश दिया, जिसमें याचिकाकर्ता कपल को महिला के पिता से मिल रही धमकियों से सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया.
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप कानूनी रूप से विवाह न सही, लेकिन एक तरह से विवाह के समान है. कोर्ट ने दो सहमति वाले वयस्कों को महिला के पिता से मिल रही धमकियों के खिलाफ पुलिस सुरक्षा देने का निर्देश दिया. न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने कहा कि भारत में विवाह की पहचान तब होती है जब दो वयस्क अपनी सहमति से साथ रहने का फैसला करते हैं. इसमें जाति, धर्म, रंग या पंथ की कोई दीवार आड़े नहीं आनी चाहिए. लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले दो सहमति से साथ रहने वाले वयस्कों को परिवार या अन्य लोगों की धमकियों से पुलिस सुरक्षा मिलनी चाहिए.
अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए इस बात पर जोर दिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत हर नागरिक को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देते हैं. कोई भी व्यक्ति या परिवार इसमें दखल नहीं दे सकता. दोनों याचिकाकर्ता वयस्क हैं और अपनी मर्जी से 2024 से रिलेशनशिप में हैं. वे 17 फरवरी 2026 को एक लिव-इन रिलेशनशिप अनुबंध भी कर चुके हैं, जो उनके रिश्ते को मान्यता देता है. स्वजन, रिश्तेदार या दोस्तों को ऐसे रिश्ते में धमकी देने या दखल देने का कोई अधिकार नहीं. कोर्ट ने कहा कि वयस्कों को अपनी पसंद के पार्टनर के साथ रहने का पूरा हक है. यदि कोई खतरा हो तो कपल संबंधित पुलिस स्टेशन के SHO या बीट कांस्टेबल से संपर्क कर सकता है, और पुलिस को तुरंत सुरक्षा प्रदान करनी होगी.
याचिका में कपल ने बताया कि वे दोनों बालिग हैं, 2024 से सहमति से साथ रह रहे हैं. इसी साल 17 फरवरी को उन्होंने लिव-इन अनुबंध भी किया, लेकिन महिला के पिता इस रिश्ते से नाराज हैं और धमकियां दे रहे हैं, जिससे उनकी जान-माल को खतरा है. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वयस्कों को साथ रहने का असीमित अधिकार है, भले ही औपचारिक विवाह न हो. न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने यह आदेश दिया, जिसमें याचिकाकर्ता कपल को महिला के पिता से मिल रही धमकियों से सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया.
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