यहां आकर पता चला जिंदगी कैसी होती है… भारतीय ने बताया यूके का वर्क-लाइफ बैलेंस – AajTak

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विदेश में काम करने का ड्रीम भारत में ज्यादातर युवाओं का होता है. खासतौर पर पश्चिमी देश और यूरोप. भारत दुनिया का सबसे बड़ा इमिग्रेंट देश है, जहां से 1.7 करोड़ से ज्यादा लोग विदेश में रह रहे हैं. हर साल लाखों भारतीय पढ़ाई और नौकरी के लिए बाहर जाने की कोशिश करते हैं. ऐसे में सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो सामने आते हैं जो वहां की पढ़ाई और नौकरी और वर्क लाइफ बैलेंस की बात होची है.
यूके में काम कर रहे भारतीय टेकी कार्तिक मोदी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है. इस वीडियो में उन्होंने बताया कि आखिर वह भारत छोड़कर विदेश काम करने क्यों गए. उनका यह अनुभव अब वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर नई बहस छेड़ रहा है.
ऑफिस के बाद बीच का सुकून
कार्तिक मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें वह ऑफिस के बाद बीच पर नजर आते हैं. उन्होंने बताया कि शाम के 5 बजे हैं और वह अपने काम के बाद कुछ समय समुद्र किनारे बिताने आए हैं.वीडियो में वह कहते हैं कि वह कुछ मिनट यहां बिताकर कॉफी लेने जाएंगे. उन्होंने यह भी दिखाया कि उनके ऑफिस के एक सहयोगी भी वहां मौजूद हैं.
‘भारत में गधे की तरह काम करता था’
वीडियो में उनके सहयोगी ने अपने अनुभव साझा करते हुए भारत और यूके के कामकाज के माहौल की तुलना की. उन्होंने कहा कि भारत में वह लगातार काम करते रहते थे, जबकि यूके आने के बाद उन्हें असली वर्क-लाइफ बैलेंस का एहसास हुआ.उन्होंने इसे ‘अद्भुत’ और ‘सिनेमा जैसा अनुभव’ बताया. इस बयान ने वीडियो को और ज्यादा चर्चा में ला दिया.
देखें वायरल वीडियो
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सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया
हालांकि वीडियो पर बहुत ज्यादा कमेंट्स नहीं आए, लेकिन जितनी भी प्रतिक्रियाएं आईं, उन्होंने एक बड़े मुद्दे को सामने रखा.
कुछ यूजर्स ने कहा कि लोग सिर्फ पैसे के लिए नहीं, बल्कि बेहतर जीवन और मानसिक शांति के लिए विदेश जाते हैं. वहीं कुछ ने कहा कि भारत में वर्क कल्चर में सुधार की जरूरत है.एक यूजर ने लिखा कि ऑफिस के बाद बीच पर समय बिताना शहर के ट्रैफिक से कहीं बेहतर है.यह वीडियो एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि क्या बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस ही वह वजह है, जिसके चलते कई भारतीय पेशेवर विदेश का रुख करते हैं.

भारत वर्क-लाइफ बैलेंस के मामले में वैश्विक स्तर पर पीछे माना जाता है और आमतौर पर इसकी रैंकिंग 45 से 55 के बीच रहती है. इसकी मुख्य वजह लंबे काम के घंटे, ओवरटाइम, वीकेंड पर काम और छुट्टियां लेने में झिझक जैसी स्थितियां हैं. वहीं यूरोप के देश (जैसे डेनमार्क, नीदरलैंड, नॉर्वे) टॉप पर रहते हैं.वहां काम के घंटे तय होते हैं और पर्सनल लाइफ को ज्यादा महत्व दिया जाता है.
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