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पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों ने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया है. असम में सत्ता की हैट्रिक और बंगाल में बीजेपी की प्रचंड जीत से पार्टी के हौसले बुलंद है. बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता से बेदखल के बाद अब विपक्षी खेमा अपनी ‘सेल्फ-डिफेंस’ मोड से बाहर निकलकर जवाबी रणनीति तैयार करने में जुट गया है. इसी कड़ी में सपा प्रमुख अखिलेश यादव कल कोलकाता पहुंच रहे हैं.
2026 के बंगाल चुनाव का सीधा असर उत्तर प्रदेश के सियासी समीकरणों पर पड़ना तय है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के अभेद्य दुर्ग को ढहाने के बाद ‘भगवा’ खेमे में जो उत्साह है, उसकी गूंज अब लखनऊ के सियासी गलियारों तक भी सुनाई दे रही है. यही वजह है कि अखिलेश यादव आज कोलकाता पहुंचकर ममता बनर्जी से मुलाकात कर उन्हें अपना नैतिक समर्थन देंगे.
बंगाल में 15 सालों तक राज करने के बाद ममता बनर्जी को शिकस्त मिली है. ममता की चुनावी हार के तुरंत बाद ही अखिलेश यादव का कोलकाता दौरा महज नैतिक समर्थन और एक ‘सांत्वना मुलाकात’ नहीं है,बल्कि यह उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2027 के लिए एक बड़ी गोलबंदी की शुरुआत मानी जा रही है?
ममता बनर्जी से अखिलेश की होगी मुलाकात
अखिलेश यादव गुरुवार को पश्चिम बंगाल के दौरे पर जा रहे हैं. बंगाल के चुनाव नतीजे आने के बाद विपक्षी दल के किसी भी नेता का ये पहला दौरा होगा. अखिलेश का कोलकाता दौरा पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश की राजनीति को जोड़ने वाले सेतु के रूप में देखा जा रहा है. अखिलेश यादव का सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम ममता बनर्जी के आवास कालीघाट में जाकर मुलाकात करने का है.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव गुरुवार सुबह लखनऊ से पश्चिम बंगाल के लिए निकलेंगे. कोलकाता जाकर ममता बनर्जी को नैतिक समर्थन देंगे. इस दौरान अखिलेश और ममता के बीच लंबी बातचीत भी होगी, क्योंकि टीएमसी सत्ता से 15 साल बाद बाहर हो गई है. ममता भी भवानीपुर सीट से चुनाव हार गईं हैं. ऐसे में अखिलेश बीजेपी की बंगाल जीत को ‘मशीनी जीत’ या ‘लोकतंत्र पर प्रहार’ बताते हुए यूपी के मतदाताओं को आगाह करने की कोशिश करेंगे. ऐसे में अब चर्चा यह है कि आखिर अखिलेश यादव की पश्चिम बंगाल यात्रा के मायने क्या हैं?
बंगाल के चुनावी नतीजों का यूपी में सियासी असर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने तमाम सियासी समीकरणों को हिलाकर रख दिया है. बंगाल में बीजेपी ने इस बार वो करके दिखाया, जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी. ममता बनर्जी की 15 साल पुरानी तृणमूल कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंककर बीजेपी ने बंगाल की सत्ता पर कब्जा कर लिया. यह जीत सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी राजनीतिक लहरें उत्तर प्रदेश तक पहुंच चुकी हैं.
बंगाल के नतीजे को 2027 के उत्तर प्रदेश की सियासत से भी जोड़कर देखा जा रहा है. यूपी के लिए एक बड़े संकेत के रूप में देखे जा रहे हैं. बीजेपी की इस सफलता ने विपक्षी दलों में खासी चिंता पैदा कर दी है. विपक्षी खेमे में अब गठबंधन को मजबूत करने की कोशिशें तेज हो गई हैं. अखिलेश यादव की बंगाल यात्रा को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है.
अखिलेश की ममता से होने वाली मुलाकात सिर्फ सांत्वना और नैतिक समर्थन देने की नहीं बल्कि यूपी के लिए गोलबंदी के रूप में देखा जा रहा है. ऐसे में’INDIA’ ब्लॉक के भविष्य और 2027 के यूपी चुनावों में क्षेत्रीय दलों की सक्रियता पर होगी.
अखिलेश की कोलकाता यात्रा के सियासी मायने?
अखिलेश यादव की कोलकाता यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है. इस बहाने अखिलेश से संदेश देना चाहते हैं कि ममता के साथ हर हाल में खड़े हैं और दूसरी बात विपक्षी गठबंधन गोलबंदी की रणनीति.अखिलेश यादव के इस दौरे को भी बंगाल की हार के बाद विपक्षी दलों में एकजुटता बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
2027 के यूपी चुनाव को लेकर संभावित सीट बंटवारे और चुनावी रणनीति पर भी मंथन होगा. क्योंकि जिस तरह से बीजेपी एक के बाद एक क्षेत्रीय क्षत्रपों को निपटा रही है, वह विपक्ष की राजनीति के लिए अच्छा नहीं है. अखिलेश यादव की कोशिश यही है कि समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच बेहतर तालमेल बनाने का प्रयास हो, ताकि बीजेपी की बढ़ती लहर का मुकाबला किया जा सके. इसमें ममता बनर्जी के सियासी अनुभव को जानने का प्लान है.
ममता के सियासी अनुभव को जानने का प्लान
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी से मुलाकात का नतीजा यह भी हो सकता है कि विपक्षी पार्टियां 2027 से पहले ही अपनी कमजोरियों को दूर करने और नए गठजोड़ बनाने की दिशा में काम शुरू कर दें. पश्चिम बंगाल में ‘ममता मॉडल’ के फेल होने के कारणों पर चर्चा और यूपी में भाजपा के ‘ध्रुवीकरण’ को रोकने का फॉर्मूला तैयार करना.
अखिलेश यादव भी जानना चाहते हैं कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के ‘महिला कार्ड’ और ‘लाभार्थी कार्ड’ के बावजूद बीजेपी कैसे सेंधमारी करने में कामयाब रही. यूपी में 2027 का चुनाव अखिलेश यादव के लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई है. ममता के जरिए वे कुछ खास राजनीतिक लक्ष्यों को साधना चाहते हैं. ममता बनर्जी के सियासी अनुभव को जानकर यूपी में बीजेपी को काउंटर करने की रणनीति बना सकते हैं.
बंगाल में बीजेपी की जीत में धार्मिक ध्रुवीकरण और कुछ क्षेत्रों में अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे का भी योगदान रहा. यूपी में विपक्ष इसको लेकर पहले ही सतर्क है. सपा मुखिया ने खासतौर पर अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को इसके लिए ताकीद दी है कि कोई ऐसा बयान या आचरण न करे, जिससे भाजपा की मौका मिले.
अखिलेश के लिए 2027 का चुनाव करो या मरो वाला
अखिलेश यादव 2017 से सत्ता से बाहर हैं, लेकिन 2024 में बीजेपी से ज्यादा सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया था. सपा की रणनीति है कि 2024 की तरह ही 2027 में प्रदर्शन दोहरा सके, लेकिन बंगाल में भाजपा की सुनामी ने अखिलेश की चिंता बढ़ा दी है. बंगाल चुनाव नतीजे के बाद अखिलेश ने कहा था, ‘हर फरेबी फतह की एक मियाद होती है, ये बात ही ‘सच्चाई की बुनियाद होती है.’ इस तरह से चुाव नतीजों पर उठाया गया यह सवाल उन चुनौतियों का जवाब तलाशने की कोशिश है जिनका सामना विपक्ष को 2027 में यूपी में करना है.
उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव विपक्ष की लड़ाई अब समीकरण, जमीन के साथ ही बीजेपी के बढ़े मनोबल से भी है. ऐसे में सपा मुखिया अखिलेश यादव पहले से ही अपने कार्यकर्ताओं को ताकीद कर चुके हैं कि पश्चिम बंगाल के बाद भाजपा का पूरा अमला यूपी में ही जुटेगा, इसके लिए तैयार और सतर्क रहना है. अब बंगाल चुनाव के बाद बीजेपी का फोकस यूपी के चुनाव पर है, तो सपा की कोशिश 2024 में बने माहौल को बनाए रखने का है.
अखिलेश यादव नहीं देना चाहते बीजेपी को कोई मौका
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस गठबंधन को 43 सीटें मिली थे, जिसे अगर विधानसभा सीट के लिहाज से देखें तो करीब 225 सीटों पर सपा को बढ़त थी. अखिलेश ने पीडीए फॉर्मूले के जरिए बीजेपी के हिंदुत्व वाले गुब्बारे की हवा निकाल दी थी. समीकरणों के असर और जीत से मिले मोमेंटम के जरिए सपा 2027 में स्वयं को सत्ता का प्रबल दावेदार मान रही है
अखिलेश यादव कोई भी मौका बीजेपी को नहीं देना चाहते हैं, जिससे उनका बना माहौल बिगड़े. इसीलिएमंगलवार को सुबह अखिलेश के सोशल मीडिया अकाउंट पर बड़े मंगल के अवसर पर हनुमान चालीसा को पंक्तियां साझा कर अपने सियासी संदेश दे दिए हैं. इटावा में बने रहे केदारेश्वर मंदिर का सावन में भव्य लोकार्पण की तैयारी है ताकि बीजेपी धार्मिक ध्रुवीकरण न कर सके. इसीलिए अखिलेश अब कोलकाता में जाकर ममता बनर्जी से सियासी अनुभव समझना चाह रहे हैं?
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