Tamil Nadu Political News: तमिलनाडु में थलापति विजय लगातार सरकार बनाने का दावा पेश कर रहे हैं लेकिन उनके हाथ असफलता लग रही है. राज्यपाल ने स्पष्ट किया है कि बिना बहुमत के सरकार बनाने का निमंत्रण नहीं दिया जाएगा, जिसके बाद राज्यपाल की भूमिका पर लोग सवाल खड़ा कर रहे हैं, ऐसे में हम बताने जा रहे हैं कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने क्या तर्क दिया था.
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Thalapathy Vijay: तमिलनाडु के चुनाव में थलापति विजय की पार्टी TVK सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. इसके बावजूद भी थलापति के सीएम बनने की राह में काफी ज्यादा अड़चने आ रही हैं. विजय को रोकने के लिए अब DMK और AIADMK अब आपस में गठबंधन करने पर चर्चा कर रहे हैं. विजय ने दो बार राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश किया लेकिन राज्यपाल ने स्पष्ट कर दिया कि बिना स्पष्ट बहुमत के सरकार सरकार बनाने का निमंत्रण नहीं दिया जाएगा. इस तरह की हलचल पहले भी सियासत में देखी गई है जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था, तब सुप्रीम ने तर्क देते हुए राज्यपाल की भूमिका से लोगों को रूबरू कराया था.
बहुमत की कमी
सबसे पहले हम जानते हैं कि राज्यपाल ने विजय से क्या कहा? तमिलनाडु असेंबली में कुल 234 सीटें हैं. जिसमें सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों की जरूरत होती है. इस बार हुए चुनाव में जोसेफ विजय की पार्टी ने 107 सीटें जीती हैं. बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के नाम पर कांग्रेस ने भी टीवीके को अपना समर्थन दे दिया है. असेंबली में उसके 5 विधायक जीतकर आए हैं. ऐसे में अब जोसेफ विजय के पास 113 विधायक हो गए हैं लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए अब भी 5 विधायकों की कमी है.
TVK ने कही ये बात
विजय 113 विधायकों के साथ दो दिनों से राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, राज्यपाल ने उन्हें मिलने के लिए लोकभवन भी बुलाया और फिर उन्हें बताया कि सरकार बनाने के लिए तमिलनाडु विधानसभा में जरूरी बहुमत का समर्थन नहीं बन पाया है, ऐसे में बिना बहुमत के सरकार बनाने का निमंत्रण नहीं दिया जा सकता है, जैसे ही राज्यपाल ने ये बात कही, तो चर्चा होने लगी कि DMK और AIADMK एक साथ आ सकती है, जब ये चर्चा हुई तो TVK ने कहा कि उसके सभी विधायक इस्तीफा दे देंगे.
1994 का ऐतिहासिक फैसला
देशभर में ये चर्चा हो रही है कि राज्यपाल को TVK को बुलाकर सरकार बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी देनी चाहिए, इसके अलावा भी तमाम तरह की बातें हो रही है, इसी बीच हम आपको बताने जा रहे हैं एसआर बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1994) के ऐतिहासिक फैसले के बारे में जो सुप्रीम कोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण फैसला था, जहां पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की भूमिका को बताते हुए कहा था कि बहुमत का असली परीक्षण विधानसभा के फ्लोर (सदन के अंदर वोटिंग) पर ही होना चाहिए, राज्यपाल राजभवन में बैठकर खुद बहुमत नहीं तय कर सकता.
सदन में ही होगा फैसला
इसके अलावा पहली नजर में जांच (Rameshwar Prasad केस – 2006) में सुप्रीम कोर्ट ने और साफ किया कि राज्यपाल की भूमिका पहली नजर में जांच तक ही सीमित है. राज्यपाल को यह देखना है कि दावेदार के पास बहुमत बनने की संभावना है या नहीं लेकिन राज्यपाल फैसला नहीं कर सकता कि बहुमत है या नहीं, पूरा फैसला सदन में ही होगा, राज्यपाल न तो पूरी तरह अनदेखा कर सकता है, और न ही खुद जज बन सकता है.
महाराष्ट्र केस में राज्यपाल की भूमिका
साल 2019 में जब महाराष्ट्र में दो अलग-अलग गुट सरकार बनाने का दावा कर रहे थे, तब राज्यपाल ने समर्थन पत्र को देखते हुए एक गुट को सरकार बनाने का न्योता दिया और तुरंत फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया, साथ ही कहा कि अंतिम फैसला फ्लोर टेस्ट (विधानसभा में वोटिंग) से ही होगा. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल का फैसला सही बताया था, क्योंकि राज्यपाल ने BJP के समर्थन पत्र के आधार पर शिंदे को बुलाया था.
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Zee News में नेशनल डेस्क पर देश–विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरें लिखते हैं. करियर का आगाज 2023 से (Zee Media) से हुआ. डिजिटल डेस्क पर खबरें लिखने के लिए अलावा साहित्य से भी गहरा नाता है. खबरों के अल…और पढ़ें
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